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Tuesday, May 19, 2015

जासूसी जंग (Story Ad) #fanfic


जासूसी जंग (Teaser)
तिरंगा - यह सोचना बेकार है साबू कि तुम मुझे अपने आकार या हुंकार से डरा लोगे। मेरा रास्ता छोड़कर बड़ी समस्या पर ध्यान दो।
साबू - बड़ी समस्या के लिए चाचा जी मुस्तैद है, यहाँ जो तुम समस्याएँ खड़ी कर रहे हो उनका बंद होना भी आवश्यक है।
तिरंगा - ऐसा पहली बार नहीं है जो मुझे अच्छाई के बचाव के लिए अच्छाई से ही लड़ना पड़ेगा। यह भी पहली बार नहीं होगा जो मैं एक अमानवीय ताकत के धनि से दो-दो हाथ कर उसे चित करूँगा।
तभी एक फनफनाता अस्त्र हवा में लहरा और तिरंगा के कुछ समझने से पहले ही।

*टन्ननन*
तिरंगा - आईइइइइ.....

बिन्नी चाची - पर ऐसा पहली बार होगा कि एक बेलन से तेरे खोपडे में गुम्मड़ पड़ेगा, हट मेरे बच्चे से दूर।

एक तरफ है देशभक्त डिटेक्टिव तिरंगा और एक ओर है सबके चहेते (तिरंगा के भी) चाचा चौधरी !! कौन करेगा एक गहरे राज़ का पर्दाफाश और जीतेगा यह.....जासूसी जंग !!!

Saturday, May 9, 2015

सफेदबाज़ारी - मोहित शर्मा (ज़हन)

(Picture - Bidholi, Dehradun)
नोट - इस कहानी का निरंतर कॉमिक्स की कालाबाज़ारी करने वाले और फिर भी कॉन्फिडेंस-अकड़ में रहने वाले जैसे इतिहास में प्राण कुमार शर्मा जी के बाद उन्ही का नाम आयेगा ऐसे बंधुओं से कोई संबंध नहीं है।
बहुत समय पहले की बात है कुछ राज्यों में कला से जुडी वस्तुओं का संग्रह का विशेष चलन था। महान कलाकारों की रची वस्तुओं को सभी पाना चाहते थे पर उनकी संख्या सीमित रह जाती जिसके चलते जगह-जगह अनैतिक कालाबाज़ारी शुरू हुयी। फिर राज्यों ने ऐसी तकनीक अपनायी जिसमें एक कला की अनेको नक़ल जनता के लिए उतारी जाती पर जनसँख्या अधिक होने के कारण थोड़े समय बाद कम मूल्य की वस्तुऍ उनसे कई गुने दामो पर बेचीं जाती।
प्रशासको ने जनता को धैर्य से वस्तुएँ संग्रह करने की सलाह दी और यह भी बताया की नए समय में असंख्य नए प्रतिभावान कलाकार कृतियों को बेचने के लिए आतुर है पर जनता को जैसे पुराने काल का मोह हो गया है, आवश्यक नहीं कि एक ख़ास तरह का संग्रह बाकी तरह के संग्रह से अच्छा या ख़राब हो। नयी-पुरानी कलाकृतियों का मिश्रित संग्रह भी एक अच्छी और सम्मानजनक बात है क्योकि आज जो नया है वह थोड़े वर्षो उपरांत पुराना होगा। वैसे भी धैर्य के साथ कुछ वर्षो में मनचाहा संग्रह बनाया जा सकता है पर कई प्रजाजन दूसरो से स्वयं को बेहतर दिखाने, रौब जमाने वर्षो के काम को कुछ महीनो में करने की ठाने थे इसलिए कालाबाज़ारी अब भी फल-फूल रही थी। अंततः सभी राज्यों ने बिचौलियों को चिन्हित कर उनपर 3 वर्षो का प्रतिबंध लगा, सभी को अपनी संयुक्त परिधि से बाहर निकाल दिया।
जो व्यक्ति अब तक पूरी तरह निर्भर होकर इसको एक व्यवसाय कि तरह चला रहे थे उनका गुज़र बसर कुछ अरसे तक अपनी बचत पर चला फिर उन्हें जीवन-यापन के लिए कुछ "असल" काम ढूँढना पड़ा। प्रतिबंध की अवधि उपरांत उनमे से अधिकतर अपने नए काम में लीन हो चुके थे। इस बीच कुछ ऐसे समूहों को बढ़ावा मिला जो बिना किसी लालच के एक-दूसरे का संग्रह बढ़ाने पर ज़ोर देते थे। तत्कालीन विचारको ने कहा कि आगे समय में प्रजा को ही प्रशासको का काम करना होगा और धैर्य रखते हुए ऐसे कालाबाजारियों को अनदेखा कर उन्हें कोई "असल" काम करने के लिए प्रेरित करना होगा।
- मोहित शर्मा (ज़हन) 

Monday, May 4, 2015

Yesteryear Writer Parshuram Sharma ji


जीवन में कई बार छोटी-छोटी बातें आपको चौकाने का दम रखती है, बशर्ते आपकी आदत या किस्मत ऐसी बातों को देख सकने कि हो। भाग्य से कुछ सामान खरीदने बाजार गया और बाइक स्टैंड पर लगाते समय क्रिएटिव कोर्सेज का एक पोस्टर दिखा जिसपर एक नाम को पढ़कर लगा कि यह तो कहीं अच्छी तरह सुना लग रहा है पर उस समय भाग-दौड़ में याद नहीं आ रहा था कि कहाँ। पोस्टर पर एक संजीदा बुज़ुर्ग गिटार पकडे  खड़े थे। खैर, सामान खरीदते समय याद आया की पोस्टर पर लिखा नाम परशुराम शर्मा तो बीते ज़माने के प्रख्यात उपन्यास एवम कॉमिक्स लेखक का भी था। साथ में यह भी याद था कि परशुराम जी का पता मेरठ का बताया जाता था। इतना काफी था इस निष्कर्ष पर आने के लिए कि सामने लेखक-विचारक परशुराम शर्मा जी का ही ऑफिस है। पहले तो मैंने भगवान जी को धन्यवाद दिया कि उन्होंने बाइक जिस एंगल पर स्टैंड करवाई वहां से मुंडी टिल्ट करके थैला उठाने में मुझे सर का पोस्टर दिख गया। थोड़ी झिझक थी पर मैंने सोचा कि अब इतनी पास खड़ा हूँ तो बिना मिले तो नहीं जाऊँगा। उनसे बड़ी सुखद और यादगार भेंट हुई और काफी देर तक बातों का सिलसिला चलता रहा, इस बीच उन्होंने अपने सुन्दर 2 गीत मुझे सुनाये और बातों-बातों में मेरे कुछ आइडियाज पर चर्चा की।

270 से अधिक नोवेल्स और कई कॉमिक्स प्रकाशनों के लिए सौइयों कॉमिक्स लिख चुके 68 वर्षीय परशुराम जी अब मेरठ में अपना क्रिएटिव इंस्टिट्यूट चलाने के साथ-साथ स्थानीय म्यूजिक एलबम्स,  वीडिओज़ बनाते है। बहुमुखी प्रतिभा के धनि परशु जी लेखन के अलावा गायन, निर्देशन, अभिनय में भी हाथ आज़मा चुके है और अब तक उनकी लगन किसी किशोर जैसी है। आगे उनका संक्षिप्त साक्षात्कार और वो दोनों गाने आप सबके साथ बाँटूंगा। 

- मोहित शर्मा (ज़हन) 
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