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Friday, August 28, 2015

किस्मत से कुश्ती - लेखक मोहित शर्मा ज़हन

छोटे द्वीप समूहों से बने एक गरीब देश के आधा दर्जन खिलाडियों और दर्जन भर स्टाफ के दल में पदक की उम्मीद किसी खिलाडी से नहीं थी, ओलम्पिक में क्वालीफाई करना ही उनके सबके लिए बड़ी बात थी। उनमे एक महिला कुश्ती पहलवान जोएन का लक्ष्य था बेहतर से बेहतर करते हुए स्पर्धा में दूर तक जाना। उसके साथी देशवासी शुरुआती चरणो में ही बाहर हो गए और 4 राउंड्स जीत कर जोएन अपने भार वर्ग के सेमी फाइनल्स में पहुँच गयी। यहाँ उसका सामना पूर्व चैंपियन अमेरिकी पहलवान मार्था से था। मुक़ाबला तगड़ा और बराबरी का चला जिसमे मार्था ने बातों और चीप दावों से जोएन को विचलित करने की भरसक कोशिश की, मैच में बीच-बीच में अपनी संभावित हार देख रही परेशान मार्था की विवशता और गुस्सा साफ़ दिख रहे थे। अंततः परिणाम निर्णायक मंडल में मतभेद के साथ लगभग बराबरी का रहा जिसमे एक पॉइंट के मार्जिन से मार्था को विजय प्रदान की गयी।
जीत के नशे में चूर मार्था निराश जोएन का मज़ाक बनाती और अपशब्दों की बौछार करती निकल गयी। कांस्य पदक के मुकाबले से पहले केवल एक मैच के लिए जोएन को एक प्रायोजक मिल गया। पर 2 सपोर्ट स्टाफ सदस्यों को छोड़ कर देश के कैंप के बाकी लोग पहले ही स्वदेश लौट गए थे। सीमित साधनो और बदले कड़े माहौल में इतने दिन रहने के कारण जोएन की तबियत मैच से पहले बिगड़ गयी। पैसो के लालच में वह मैच में उतरी और तगड़ी प्रतिद्वंदी ने आसानी से उसे हरा दिया। इसके बाद मार्था ने इस वर्ग का स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
कुछ वर्षो बाद कई अन्य उपलब्धियाँ बटोर चुकी मार्था का नाम विश्व के महानतम और अमीर एथलीट्स में लिया जाता है और जोएन ने अपने देश लौटकर प्रायोजक से मिले पैसों से वो फल-सब्ज़ी की दुकान खरीद ली जो वह पहले किराये पर लेकर चलाती थी। उस ओलम्पिक के बाद जोएन फिर कभी किसी कुश्ती प्रतियोगिता में नहीं दिखी।  
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Monday, August 24, 2015

मोहल्ले का (कु)तर्क गुम हो गया - मोहित शर्मा ज़हन

लघुकथा 
"माना राजनीती में कुछ ऊँच-नीच हो जाती है, पर नेता जी हमारे लिए तो अच्छे है। हम लोगो से तो व्यवहार अच्छा है, छोटे-मोटे काम करवा देते है मोहल्ले के और क्या चाहिए? अब समाज का ठेका थोड़े ही ले रखा है हम लोगो ने!"

ऐसे तर्क होते थे वर्धा ब्लॉक मोहल्ले वालो के जब उन्हें शहर और उसके आस-पास के गाँव-देहात में उनके मोहल्ले की भव्य महलनुमा कोठी मे निवास कर रहे नेता जी एवम उनके गुर्गो की गुंडई, मनमानी के किस्से सुनने को मिलते थे। एक दिन नेता जी द्वारा दर्जनो व्यापारियों से की गयी मारपीट, वसूली के बाद शहर के हज़ारो उपद्रवी व्यापारियों और ऐसा कोई मौका ढूँढ रहे नेता जी के विरोधियों  ने मोहल्ले पर धावा बोल, भीड़ का फायदा उठाकर वहाँ के स्थानीय निवासियों से मारपीट, कई गाड़ियों एवम संपत्ति में आगजनी करते हुए  नेता जी के घर पर धावा बोल दिया जिसमे उनके कुछ समर्थको, परिवार समेत बर्बर हत्या कर दी गयी। 

इस घटना में गंभीर रूप से घायल नेता जी के शुभचिंतक पडोसी सिंह साहब ठीक होने के बाद दिवंगत नेता जी के लिए कोई तर्क नहीं रखते। उनके दिमाग के उस हिस्से पर गहरी चोट आई जो तर्क समझता और प्रेषित करता है, इस कारण अब वो किसी भी तरह का तर्क नहीं रख पाते....बाकी मोहल्ले वालो के सर में चोटें नहीं आयीं....पर वो भी अब तर्कों को दूर से नमस्ते करते है!

- मोहित शर्मा ज़हन

Wednesday, August 19, 2015

मोहित ट्रेंडी बाबा - "अब पछताय क्या होत है जब...ऊपर वाले की बेआवाज़ लाठी पड़ी"

मैंने लोगो को मलाल करते देखा है कि वो किन्ही कारणवश औरों के सामने अपना पक्ष ठीक से नहीं रख पाये, या अपनी बात नहीं समझा पाये और सामने वाला अपनी गलत सोच, बात, कुतर्क, उदाहरण आदि पर खुश होते हुए, यह सोचता हुआ आगे निकल गया कि वह सही था  और उसे समझाने वाले या उसके विरोध में खड़े लोग गलत। अगर ऐसा कुछ दफ़े हो जाये तो अपने अभिमान में लोग यह तक मान बैठते है कि वो हमेशा सही होते है जिस कारण अक्सर वो विषय को पूरा समझना ही नहीं चाहते। ऑनलाइन जगत का जैसे-जैसे प्रभाव मानवीय जीवन पर बढ़ा है उसमे ऐसी बातें रोज़मर्रा की सी हो गयी है। बात यहाँ ख़त्म नहीं होती, वह व्यक्ति जो किसी विषय/विषयों पर अपनी सोच अनेक वर्षो से सही मानता और अमल में लाता आ रहा है उसको अगर कोई समझा नहीं पाता, या वह किसी की नहीं सुनता तो भी उसे समय द्वारा गहरा सबक मिलता है। अगर बात बड़ी है जिस से उसका लाभ या मतलब जुड़ा है तो सबक और बुरी चोट करके जाता है। 

जैसे मेरे एक रिश्तेदार को लगता था कि संयुक्त परिवार में स्वर्ग है बिलकुल हम साथ-साथ है, हम आपके है कौन वाली छवि, साथ ही आजकल कि न्युक्लीअर फैमिलीज़ (एकल परिवार) कलियुग! लोगो ने समझाया कि जल्दबाज़ी ना करें थोड़ा और देख-समझ कर रिश्ता करें पर आँखें चकाचौंध तो लगी रही गौंद, और जल्दबाज़ी में उनकी लड़की का रिश्ता एक संयुक्त परिवार में हुआ। अब उस परिवार में भाइयों-उनकी पत्नियों और माता-पिता में छोटी-छोटी बातों में क्लेश, पैसो-संपत्ति पर विवाद, घर की मरम्मत से लेकर राशन की खरीद तक कोई पैसे नहीं खर्चना चाहता क्योकि वो तो "पब्लिक प्रॉपर्टी" हो जायेगी जो सब इस्तेमाल करेंगे। जिस स्तर पर उनकी पुत्री उनके साथ रह रही थी वह अब उस से काफी दयनीय हालत में किसी तरह समझौता करके रह रही है। इस दौर में सपनो के (या टेलीविजन, फिल्मो वाले) संयुक्त परिवार तब होते है जब आपकी आय और संपत्ति अच्छी-खासी हो ताकि ऐसी छोटी बातों पर रोज़ की झिक-झिक ना हो इसका मतलब यह नहीं कि बाकी संयुक्त परिवार सब बेकार और एकल परिवार बेहतर, यहाँ तात्पर्य यह है कि एक बँधे दायरे कि सोच में बड़े फैसले ना लें। चाहे मेरे रिश्तेदार अपने अहं के चलते खुद को अब भी सही कहें पर अंदर ही अंदर वो सच जानते है, उन्हें गहरी चोट के साथ सबक  मिला जो अब उनके किसी काम का नहीं। 

यह सिर्फ एक उदाहरण था जीवन में ऐसे छोटे-बड़े सबक लोगो को मिलते रहते है, कोशिश यह रहनी चाहिए कि हम ऐसी सीख मिलने से पहले संभल जाएँ। किसी के हित में उसे समझाने कि कोशिश करें अगर वह अड़ा रहे तो वक़्त और ईश्वर पर छोड़ दें और बाद में उसे चिढ़ाएं... :p :) (kidding)

- मोहित ट्रेंडी बाबा 

Monday, August 17, 2015

महत्वपूर्ण मैत्री - मोहित ट्रेंडस्टर


अपनी आँखों से थोड़ा दूर अपनी हथेली ऐसे लाएं की वो आपकी दृष्टि का बड़ा हिस्सा बाधित कर दे, कुछ क्षणों में आप पायेंगे कि आपकी आँखों ने उस बाधा के होते हुए भी आस-पास और आगे देखने की आदत बना ली है। जीवन में मित्रता का महत्व हम देखते-सुनते ही रहते है पर कुछ बातें इतनी प्रत्यक्ष होती है हमारे सामने कि व्यस्त दिनचर्या के चलते उनकी भूमिका हम सभी अनदेखी कर दिया करते है। संगती के प्रभाव पर यह तक कहा गया है कि मनुष्य का व्यक्तित्व मुख्यतः अपने करीबी 5-7 लोगो का मिश्रण होता है जिनके साथ वह सबसे अधिक समय व्यतीत करता है। ऑनलाइन मैत्री ने ऐसी परिभाषाओं और समीकरणों को बदला ज़रूर है पर बात की महत्ता अब भी कम नहीं हुयी है। हाँ, अब उन करीबी लोगो में यांत्रिक उपकरण और उनकी दुनिया भी शामिल हो गयी है। 

मानव अपने पूर्वज बंदर कि भांति किसी की सीधी नक़ल तो नहीं करता पर अवचेतन मस्तिष्क में किसको देखा, किस से सीखा, क्या अनुभव हुए की खिचड़ी बन जाती है और हम अनजाने में अपने मित्रों, परिवार जन और सहकर्मियों के अच्छे-बुरे गुण, हाव-भाव, बोली पकड़ते चलते है जिससे अपने व्यक्तित्व में कई बदलाव आते है। एक बड़ा और करीबी दोस्तों का दल अत्यंत आवश्यक है बच्चो एवम किशोरों के लिए, क्योकि बड़े दल की विविधता हर तरह से एक बच्चे का दायरा बढ़ाती है और जीवन को देखने के नज़रिये में संतुलन प्रदान करती है। मैंने अपने स्कूल, कॉलेज, लेखन तथा कार्यक्षेत्र के मित्रों से अनेको बातें, सबक सीखें है। किसी की दशमलव प्रतिशत में किसी की दहाई प्रतिशत में मेरे जीवन पर पड़ी छाप अब मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है। अलग-अलग कारकों से किन्ही दो व्यक्तियों के जीवन पर उनके निकट दोस्तों का असर समान नहीं होता पर यह निश्चित है की ऑनलाइन या आमने-सामने आपकी दिनचर्या में अच्छे मित्र आपके जीवन पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव छोड़ेंगे और बुरे मित्रों से कई अनचाही बातें आपको तब तक घेरें रहेंगी जब तक आप उनके साथ रहने के आदि होकर जीवन में कई समझौते नहीं कर लेते। "अच्छे" से मतलब आपके लक्ष्य, जीवन की दिशा में प्रेरणा देने वाले। अगर आप टाइप ए या टाइप बी केटेगरी में फसें हों तो सही मित्र आपको दोनों पर्सनालिटी वर्गीकरण का बढ़िया मिश्रण प्रदान कर सकता/सकते है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि आप कितने लोगो के जीवन को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से किन दिशाओं में प्रभावित कर रहे है, कितने लोग आपको अपना अच्छा मित्र मानते है। यहाँ परोक्ष अधिक महत्व लिए है क्योकि कम समय में आपको अपने जीवन पर ध्यान देना है इसलिए कइयों के करीबी होने में आपका समय बहुत व्यय होगा। 

- मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents

Friday, August 14, 2015

Aazadi Poetry - #‎मोहित_ज़हन‬

बिना शिकन वो पूछ रहे "देश बर्बाद है! किस बात की आज़ादी? कैसी आज़ादी?"
कि कॉन्फिडेंस से पूरी क्रिकेट टीम पैदा कर लो.... 
कि सालों-दशको-सदियों पुराने "बदलो" के हिसाब में लड़-मरलो.... 
कि कुतिया में परिवर्तित होकर औरों का हक़ मारने में उसेन बोल्ट का रिकॉर्ड हरलो... 
और ज़िम्मेदारी निभाने में 'पहले आप - पहले आप' करलो...

कि न्यूज़ रिपोर्ट्स से देश को कोसते हुए AC में दूध ठंडा करलो....
अपने गिरेबां में झाँको तो पाओगे तुम हिन्द नहीं सोमालिया डिज़र्व करते हो सालो!

और अजब है अपना भारत भी...
जो इतने कमीनों के होते हुए भी 200 मुल्कों में डेढ़ सौ से बेहतर है अपनी "आज़ादी"
अनगिनत पाप की आज़ादी, आस्तीन के सांप की आज़ादी! 
जय हिन्द! First deserve, then desire...

P.S. Artwork from latest Kavya Comic "Desh Maange Mujhe"
— celebrating Indian Independence

Sunday, August 2, 2015