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Monday, November 30, 2015

Micro Fiction Experiment # 2 (Mohit Trendster)



Micro Fiction Experiment, Theme: Science

*) - कृतिम रूप से लैब में निर्मित चींटी, दल में घुसपैठ करने के बाद समझ नहीं पा रही थी कि उसकी प्राकृतिक बेवकूफ बहनो में मेहनत और अनुशासन की इतनी सनक क्यों सवार है। 
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*) - रोज़ाना ज़िन्दगी से छोटे-बड़े समझौते करते हुए जिस प्रयोग में उसने अपना जीवन समर्पित कर दिया, जब वह लगभग पूर्णता पर था...तब खबर आयी कि वैसा ही प्रयोग दुनिया के किसी साधन-संपन्न वैज्ञानिक ने कर दिया है। 
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*) - जो प्रजातियां प्रयोग के लिए चाहिए थी, असिस्टेंट उनके बजाये दिहाड़ी मज़दूर ले आया। 
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*) - जेनेटिकली मॉडिफाइड क्रॉप्स (जनुकीय परावर्तित अन्न) फ़ल-सब्जी के सेवन पर व्रत में मनाही थी। सूखा ग्रस्त क्षेत्र में भी उस भोजन का आधार जीवाणु की कोशिका का मांसाहार अंश धर्म-भ्रष्ट करने को काफी थी। 
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*) - जिस हथियार के आविष्कार से उसे विश्व में नाम, मान-सम्मान मिला.....बाद में उसे बनाने की ग्लानि में ही उसने अपनी जान ली। 
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*) - आज को जिन युगों ने इतनी रफ़्तार दी, खैरात में मिली उन रफ्तारों के योग पर सवार यह पीढ़ी पुराने युगों की धीमी रफ्तारों का कितनी आसानी से मज़ाक बना लेती है!
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Wednesday, November 11, 2015

पैरानॉयड मीडिया - मोहित ट्रेंडस्टर

Y - "आखिर हम मीडिया वालो से समस्या क्या है आपको? जो हो रहा है देश में वही तो दिखाया जाता है।"

Z - "तो भाई साधारण लेंस इस्तेमाल क्यों नहीं होता? मैग्नीफाइंग ग्लास क्यों उपयोग करते है आप मीडिया वाले?"

Y - "मैं समझा नहीं!"

Z - "एक उदाहरण, हिंसक अपराधो में भारत का स्थान दुनिया में कहीं बीच में 70-80 रहता है, तो दुनिया को और देशवासियों को ऐसा क्यों लगता है कि ऐसे अपराधों में भारत नंबर एक है? आपकी पैरानॉयड या सेलेक्टिव रिपोर्टिंग के कारण! जैसे एक 800 जनसँख्या वाले इलाके में 50 अपराध होते है और किसी दूसरे 20000 जनसँख्या के इलाके में 500 अपराध होते है। इसका आशय यह नहीं कि 20 हज़ार वाला इलाका ज़्यादा बेकार है बल्कि यह है की 800 लोगो के इलाके में अपराध दर (6.25%) दूसरे इलाके (2.50%) से कहीं अधिक है, ऐसे ही भारत की 130 करोड़ जनता में कम अपराध दर भी दूसरे देशो की तुलना में एक बड़ी संख्या लगती है। पर जब पत्रकारिता नहीं आई तो गणित, अनुपात और तुलनात्मक समझ की क्या उम्मीद करें। आपकी वजह से देश वासियों में बेवजह हीनभावना, गुस्सा और भ्रम की स्थिति रहती है, साथ ही दुनिया भर में भारत से जुड़े सिर्फ नकारात्मक पहलुओं की तस्वीर बनती है। शायद इसी कारण हमसे कहीं छोटे राष्ट्रों में पर्यटन और विदेशी निवेश-व्यापार की स्थिति हमसे बेहतर है। फॉर अ चेंज, औरों पर ज़िम्मेदारी लादने के बजाये खुदपर लादो और सही दिशा में बदलाव लाओ।"

- मोहित शर्मा (ज़हन)

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Tuesday, November 10, 2015

अवचेतन क्रोध (कहानी) - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

विदित अपने दोस्त नकुल को कुछ दिनों के लिए अपने घर रहने ले आया। नकुल एक मनोचिकित्सक था पर विदित के कहने पर उसे अपना परिचय एक  बेरोज़गार इंजीनियर के रूप में देना पड़ा जो कुछ साक्षात्कार देने के लिए एक हफ्ता विदित के घर रहने आया था। वजह थे विदित के पिता जो पुलिस निरीक्षक पद से कुछ महीनो पहले रिटायर हुए थे। विदित चाहता था कि नकुल उसके पिता के व्यवहार को ओब्ज़र्व करके उनके गुस्सैल, रूखी प्रवित्ति की वजह खोजे। 

हफ्ते भर बाद नकुल ने अपना निष्कर्ष अपने मित्र को बताया। 

"रिटायरमेंट के बाद अक्सर जीवन के इस चरण में ऐसा व्यवहार देखने को मिलता है। पर अंकल का केस अलग है। जीवनभर गावों, देहात में थानेदारी करने के कारण ये दिन के चौबीसों घंटे मुंशी-दीवान, सिपाही, मुखबिर, मुजरिम या आम जनता से घिरे रहते जो या तो इनसे डरते थे या उनका इनसे कोई मतलब रहता था। तो ना कभी इनकी बात काटी जाती, ना इन्हे कोई समझाने की कोशिश करता। कभी-कबार का ऊपर से अधिकारीयों का निरिक्षण इनकी दिनचर्या के आगे ना के बराबर होता होगा। इतने दशको तक ये रूटीन चलता रहा इसलिए अब अपने से अलग कोई और राय या इनकी बात काटता कोई भी इन्हे बर्दाश्त नहीं होता और अक्सर इनके गुस्से का इंस्टेंट नूडल लावा फ़ूट पड़ता है।"

विदित - "हम्म...ऐसा कुछ मुझे लग भी रहा था....फिर इस समस्या का क्या हल है?"

नकुल - "व्यक्ति को 100 प्रतिशत बदलने के बजाये धीरे-धीरे दशमलव में एक सामंजस्य बनाने लायक बीच की स्थिति तक लाने की कोशिश करो। छोटी बातों की टेंशन को उन तक आने से पहले निपटा दो। उनकी दिनचर्या में ध्यान बंटाने के लिए कुछ एक्टिविटीज़ जोड़ो। बस....और कभी-कभी डांट-फटकार, शिकायत सुन भी लो, हमेशा तुम या आंटी भी सही नहीं होते। "

समाप्त!

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Sunday, November 1, 2015

Update #magazine


Namastey! :) New story published, Bageshwari Magazine (November - December)
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