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Saturday, July 2, 2016

2 अंत (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन

एक निजी कंपनी के 2 सहकर्मी दोपहर का भोजन साथ कर रहे थे। 

अनिरुद्ध - "मुझे पता चला कि आप हवाई यात्रा नहीं करते। अफवाह है या विमान में बैठने से डर लगता है?"

रोनित - "सही सुना है आपने। हवाई यात्रा से डर नहीं लगता, पहले कई बार बैठ चुका हूँ।"

अनिरुद्ध - "अरे...आपको कंपनी के काम से देश में कहाँ-कहाँ जाना पड़ता है। ऐसे तो बहुत समय बर्बाद होता होगा...आखिर विमान यात्रा से बचने का क्या कारण है?"

रोनित - "हमारे घर के एक पुराने पंडित जी हैं, आज तक उनकी बताई हर बात सच हुई है। उन्होंने बताया कि मेरी मृत्यु एक विमान दुर्घटना में होगी तो मैंने सोचा जब तक सिर पे कोई आपात स्थिति न पड़े तब तक तो विमान यात्रा से बचने का प्रयास करूं।"

अनिरुद्ध - "हम्म...जैसा आप अपने पंडित जी के बारे में बता रहे हैं फिर तो इतनी सावधानी सही है।"

उसी रात रोनित को अनिरुद्ध का फोन आया। 

अनिरुद्ध - "माफ कीजिए अब कॉल कर रहा हूँ, रोनित जी। एक विचार मन में आया सोचा आपसे साझा करूं। यह भी तो हो सकता है कि विमान दुर्घटना में विमान जिस जगह पर क्रैश हो वहाँ आप मौजूद हों।"

अंत 1) - रोनित को उस रात के बाद से कभी चैन की नींद नहीं आई। 

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अंत 2) - अनिरुद्ध की बात सुनकर रोनित कुछ बोल पाता उस से पहले ही कॉल कट गई और कुछ देर बाद ही अनिरुद्ध को पता चला कि रोनित के घर पर एक यात्री विमान गिरा है जिसमे सभी यात्रियों समेत रोनित की मृत्यु हो गई है। 

समाप्त!

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