बगल के घर से आती आवाज़ों को सुन सुमेर सोच रहा था कि लोगो को उसके पडोसी मनसुख लाल की तरह नहीं होना चाहिए जो अपने परिवार की खातिर और कानून के डर से अपनी हिंसक बीवी सुशीला के हाथो पिटता रहे और कानो मे काँच सा घोलते तानो को ताउम्र सहता चला जाये। इधर शाम को आसमान को एकटक निहारते अपने पडोसी को देख कर मनसुख लाल सोचने लगा कि लोगो को सुमेर कुमार जैसा नहीं होना चाहिए जो पत्नी राधा के 2-4 तानो को अपनी मर्दानगी पर ले उसे दोमंज़िल से नीचे फ़ेंक दें और फिर हादसे का बहाना बना कर जीवन भर कोमा में पड़ी बीवी का बिल भरता रहे, ससुराल वालो से केस लड़ता रहे। तीसरे-चौथे पडोसी आपस में बातें कर रहे थे कि सुमेर की शादी सुशीला से होनी चाहिए थी और मनसुख का बंधन राधा से बंधना चाहिए था, तब कम से कम एक जोड़ा सुखी रहता और सुमेर -सुशीला के भी दिमाग ठिकाने रहते।
समाप्त!
टिप्पणी - जीवन में संतुलन हमेशा पूरा व्यक्तित्व बदल कर नहीं बल्कि अक्सर व्यक्ति में कुछ गुण, व्यवहार बदल कर भी लाया जा सकता है।
- मोहित शर्मा (ज़हन)
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