अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Wednesday, July 13, 2016

राष्ट्र-प्रकृति (कहानी) #mohitness


दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक सीन की राजधानी चीबिंग में 5 दिवसीय विश्व सम्मलेन होने वाला था जिसमे लाखों की संख्या में लोग आने की सम्भावना थी। लगभग उसी समय चीबिंग और आस-पास के क्षेत्रों में लगातार कुछ दिन भारी बारिश होने के आसार बन रहे थे। सीन के तानाशाह राष्ट्रपति ने वैज्ञानिकों से एक मौसमी प्रयोग करने को कहा जिस से इन 5 दिनों के सम्मलेन में मौसम का कोई व्यवधान ना पड़े। बड़े कार्गो हवाई जहाज़ों की मदद से लगातार हवा की ऊपरी परतों में रसायन छोड़े गए और तरह-तरह के वैज्ञानिक चोचले हुए। आखिरकार दबाव का क्षेत्र बदला और बादल-बरखा चीबिंग से छितर गए। 

सम्मेलन अच्छी तरह निपटा और अहम मौके पर मौसम को मात देने की ख़ुशी में राष्ट्रपति छुट्टी मनाने देश के तटीय छोर पर आ गए। दबाव के क्षेत्र में बदलाव से देश का वातावरण उलट-पुलट हो गया। विश्व सम्मलेन में मौसम से की गयी छेड़छाड के कारण अचानक एक ऐसा तूफ़ान तेज़ी से सीन के तटीय क्षेत्रों की तरफ खिंचा चला आया जो सामान्य स्थिति में समुद्र तक सीमित रहता। ग्लाइडर पर प्रकृति का आनंद ले रहे राष्ट्रपति का प्रकृति ने आनंद ले लिया और उन्हें एक क्षतिग्रस्त न्यूक्लियर संयंत्र के कोर में ला पटका। सीन में भारी जान-माल का नुक्सान हुआ और बचाव कर्मियों ने विकिरण स्नान किये राष्ट्रपति को कोमा की हालत में पाया। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Friday, September 4, 2015

मुदित चोर नहीं है! - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


"गलती आपकी है जो 150 की जगह 1500 का रिचार्ज कर दिया।" मन ही मन खुश होते मुदित ने दुकानदार से कहा। 

दुकानदार - "कभी-कबार जीरो की गलती हो जाती है, आँखें कमज़ोर हो गयी है। अभी सब देने को नहीं कह रहा बाद में जब इस्तेमाल कर लो तब दे देना, या धीरे-धीरे लौटा देना। अब बुढ़ापे में ऐसा तो...."

मुदित - "बूढ़े हो गए है तो घर पर बैठिये। मैंने डेढ़ सौ बोला था उतने ही दूंगा, बाकी आपने क्या देखा, किया उस से मुझे मतलब नहीं। इतनी चलती है आपकी शॉप, अभी दो-चार घंटो में सब वसूल हो जायेगा।" इतना कहकर वृद्ध दुकानदार की बातें अनसुनी करता हुआ मुदित वहाँ से निकल गया। उसने यह भी सोचा कि अब से वह इस जगह टॉपअप-रिचार्ज करवाने नहीं आएगा। 
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कुछ दिन बाद व्यथित मुदित फ़ोन पर एक डिश कंपनी के कॉलसेंटर कर्मी पर अपना गुस्सा निकाल रहा था। 

मुदित - "अरे ऐसे कैसे काट लिए 75 रुपये मेरे टीवी पैक से?"

कालसेंटर कर्मी - "सर एक महीने के लिए हमारा स्पेशल "महालोलू पैक" फ्री था तब आपने उसका सब्सक्रिप्शन लिया था। समय पूरा होने के बाद भी आपने पैक हटवाया नहीं इसलिए ऑटोमैटिक डिडक्ट हो गए पैसे।"

मुदित - "अच्छा मुझे मत पढ़ा बे! बस लोगो को लूटने के लिए ऑफर्स बना रखें है। हुँह! चोर है सब @#$&% "

समाप्त! 

- मोहित शर्मा (ज़हन)
#mohitness #mohit_trendster #laghukatha #message

Saturday, July 18, 2015

क्रॉस कनेक्शन (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन


बगल के घर से आती आवाज़ों को सुन सुमेर सोच रहा था कि लोगो को उसके पडोसी मनसुख लाल की तरह नहीं होना चाहिए जो अपने परिवार की खातिर और कानून के डर से अपनी हिंसक बीवी सुशीला के हाथो पिटता रहे और कानो मे काँच सा घोलते तानो को ताउम्र सहता चला जाये। इधर शाम को आसमान को एकटक निहारते अपने पडोसी को देख कर मनसुख लाल सोचने लगा कि लोगो को सुमेर कुमार जैसा नहीं होना चाहिए जो पत्नी राधा के 2-4 तानो को अपनी मर्दानगी पर ले उसे दोमंज़िल से नीचे फ़ेंक दें और फिर हादसे का बहाना बना कर जीवन भर कोमा में पड़ी बीवी का बिल भरता रहे, ससुराल वालो से केस लड़ता रहे। तीसरे-चौथे पडोसी आपस में बातें कर रहे थे कि सुमेर की शादी सुशीला से होनी चाहिए थी और मनसुख का बंधन राधा से बंधना चाहिए था, तब कम से कम एक जोड़ा सुखी रहता और सुमेर -सुशीला के भी दिमाग ठिकाने रहते। 

समाप्त!

टिप्पणी - जीवन में संतुलन हमेशा पूरा व्यक्तित्व बदल कर नहीं बल्कि अक्सर व्यक्ति में कुछ गुण, व्यवहार बदल कर भी लाया जा सकता है। 

- मोहित शर्मा (ज़हन) 
#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents

Friday, May 24, 2013

आप और खाप (Bonsai Kathayen)

 Another informative story on the sensitive issue of Khap Panchayats from my book Bonsai Kathayen.



दोस्तों आमिर खान द्वारा होस्ट किया गया कार्यक्रम "सत्यमेव जयते" एक अच्छी पहल थी सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डालने की पर इस कार्यक्रम की कमी यह थी की एक पहलू दिखाने के चक्कर में मुद्दे से जुड़ीं बाकी साइड्स यह कार्यक्रम सिरे से नकार देता था। जैसे खाप पंचायतों का मुद्दा। मुझे कभी-कभी बुरा लगता है जब लाखों-करोड़ो लोग अधूरी जानकारी लेकर आंदोलन करते है या अपने स्तर से व्यवस्था को अपने नज़रिये के हिसाब से बदलने पर जोर डालते है।

हिंसा कर चुकी कुछ दिशाहीन खाप पंचायतो की मै निंदा करता हूँ और उन्हें भारत के संविधान विरुद्ध मानता हूँ पर फिर वही सवाल कुछ की सज़ा सबको क्यों? सरकारी महकमे और कई लालची समाज सेवी संगठन अपने धंधे और टारगेट पूरे करने के लिये अक्सर खुद से ही पीड़ित बनाकर बाहर से खबर पा रही देश-दुनिया की जनता का गुस्सा बढ़ाते है ....कानून बदलते है और निर्दोषों को अपराधियों की तरह देखा जाता है। जागरूकता की कमी की वजह से वो अपनी बात ठीक से नहीं रख पाते या उन्हें मामला पता चलने तक देर हो जाती है इसका हिसाब कौनसा सीरियल देगा? कोई नहीं! क्योकि ये दिखाना तो छोटी सोच कहलायेगा ना?

इस विषय पर यह खाप की जानकारी सहित कहानी लिखी है।

** आप और खाप **

नये सेशन मे एक बड़े कॉलेज के परास्नातक कोर्सेज मे दाखिला लेकर वहाँ के हॉस्टल मे एक रूम मे आयीं 2 अजनबी लडकियाँ मिली।

"हेल्लो! आई ऍम श्रुति ....फ्रॉम अहमदाबाद, गुजरात, आप कहाँ से हो?"

"हाय! आई ऍम अदिति। मै हरियाणा से हूँ।"

2-3 दिनों मे बातों-बातों मे ही दोनों की अच्छी दोस्ती हो गयी। दोनों खुश थी की चलो अपने मन की ठीक-ठाक रूममेट मिल गयी।
एक दिन बातों ही बातों ही बातों मे .....

श्रुति - "वैसे सुना है हरियाणा साइड लड़कियों के लिए नरक है ...खाप पंचायतो का बड़ा टेरर है वहाँ ...सेक्स रेशो घट रहा है ..."

श्रुति ने खाप के और हरियाणा के कुछ दर्दनाक वाकये सुनाये, फिर अदिति से रहा नहीं गया।

अदिति - "देखो श्रुति, जो घटनाएँ तुमने सुनी सब सच है पर मेरी बात ध्यान से सुनना। खाप एक बहुत बड़े समुदाय और सामाजिक प्रणाली का नाम है जो सिर्फ हरियाणा ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब मे फैली हुई है, जिसकी जड़ें प्राचीन काल मे मिलती है। सब खाप मिलाओगी तो उनमे हजारो गाँव-कसबे तक आते है, अब तुम किस खाप की बात कर रही चौहान खाप की जिसमे 84 गाँव है या भाटी खाप की जिसमे 360 गाँव है। ऐसे ही अहलावत, राठी, तोमर, कसाना, कलसियां, पंवार, बल्यान, नागर, छोकर, रावल, करहाना, बेन्सला, बाटर, पोनिया और ऐसी बहुत सी खाप है और हर खाप मे कम से कम 84 गाँव होते है। जब भी इतने बड़े क्षेत्र से कोई घटना निकलती है और विशाल "खाप" समुदाय को इसका ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं। जेंडर रेशो घट नहीं रहा है ढाई करोड़ की जनसँख्या वाले हरयाणा मे 2001 जनगढ़ना मे 861/1000 था और 2011 मे ये बढ़कर 877/1000 हो गया, इतनी जनसँख्या वाले राज्य मे 10 सालो मे 16/1000 की वृद्धि हुई है क्या ये एक पॉजिटिव बात नहीं? बदलाव आ रहे है बशर्ते आप अपना भेदभाव करने वाला चश्मा हटाकर देखो। अब 10-15 सालो मे सब ठीक हो जाए ऐसा कैसे हो सकता है। ये कुछ वैसा ही है जैसे बिना जाने विदेशो मे कई लोग आज भी यह समझते है की भारत हाथियों और ज़हरीले सांपो से भरा हुआ है हाँ, पुराने रुढ़िवादी तरीकों मे कुछ कमियाँ है पर जैसा मैंने कहा सदियों कि इस व्यवस्था मे सुधार मे कुछ दशक तो लगेंगे ....वो भी तब जब आप उस प्रणाली मे रह रहे लोगो को समझो और उन्हें साथ लेकर चलो। उन्हें एक विलेन फिगर बनाकर और उन्हें कोसने से आप बाहरी कानून बदल सकते हो और दूसरो के सामने अपने आप को संवेदनशील, ब्रोड-माइंडेड कहलवा सकते हो पर अंदर की व्यवस्था को नहीं बदल सकते।

इन क्षेत्रो से भारी मात्रा मे खाद्य सामग्री, धान, फसलें, दुग्ध उत्पाद आते है जो अधिक घनत्व वाले दूसरे राज्यों मे जाते है, वो राज्य जो अधिक जनसँख्या की वजह से अपनी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाते। यहाँ हजारो सरकारी और प्राइवेट योजनायें बहुत अच्छे ढंग से चल रही है, जैसे हाल की मनरेगा योजनाओ मे इन गाँवों का अच्छा योगदान रहा है। यहाँ की भी अपनी स्थानीय परंपरा, रीतियाँ, बातें, हथकरघा, खाद्य उत्पाद है जिनका सम्मान होना चाहिए कुछ बातों की आड़ मे पूरे समुदाय को ढकना और वहाँ से जुड़े हर व्यक्ति को एक तराजू पर तोलना कहाँ तक सही है? अपनी राय बनाओ पर मसालेदार न्यूज़ रिपोर्टस पर नहीं बल्कि सभी तथ्यों पर वो भी सभी पहलू जानने के बाद। हर जगह की तरह वहाँ भी सुधारों की ज़रुरत है पर वो दानवों कि प्रजाति नहीं है जैसी छवि वहाँ से दूर अपने स्टूडियोज मे बहस जीतने वाले बुद्धिजीवी ....आम जनता पर थोपते है।"

श्रुति - "ओह . .मा-मा ...तुम्हे ये सब कैसे पता?"

अदिति - "शायद मैंने अपना पूरा नाम नहीं बताया ....अदिति राठी, मै एक खाप कसबे से ही आयी हूँ।"

The End!

- Mohit Trendster

स्वयंसेवी श्रीमती IAS (Bonsai Kathayen)

Story from my book "Bonsai Kathayen" published earlier this year in January. 



स्वयंसेवी श्रीमती IAS

भारत मे 2012 तक 50 लाख से अधिक रजिस्टर्ड स्वयंसेवी संस्थाएं है यानी भारत के लगभग 250 नागरिको पर एक संस्था पर इनमे से बहुत कम ही समाज के सुधार के लिए कार्यरत है। सोचिये अगर हर संस्था ठीक से काम करने लगे तो भारतवर्ष का कितना भला होगा। दुर्भाग्यवश सरकारी, कोर्पोरेट और विदेशी मदद लेने के लिए, टैक्स मे छूट, फ्री या कम दर से रेलवे-आदि यात्रा, समाज मे बिना काम किये अपने नाम की साख और लोगो को ये दर्शाना की हम कितना भला काम कर रहे है ...ऐसे छोटे मकसदो के लिए अधिकतर स्वयंसेवी संस्थाएं अस्तित्व मे आती है। मदद तो वो भूल कर भी नहीं करते। इस विषय पर रोशनी डालने की कोशिश कर रहा हूँ।


मैडम - "देखो तो जी, कितनी चालाक औरत है अपने और परिवार वालो के नाम से पहले ही तीन N.G.O. रजिस्टर करवा रखी है। किट्टी पार्टीज मे बस अपने ही फंक्शन्स और इवेंट्स गाती रहती है। बाकी लेडीज़ की भी 1 या 2 N.G.O. तो है ही, बड़ा लो फील करती हूँ मै इन सबके सामने, मेरे सोशल सर्किल मे मेरा थोडा नाम होना चाहिए ना, अब चैरिटी तो एक बार की और लोग भूल गए कोई नाम की ही सही पर आर्गेनाइजेशन हो तो बताने मे अच्छा सा लगता है। आप काम मे ही लगे रहते हो देखो मै कहे देती हूँ मुझे भी कम से कम दो N.G.O. की संस्थापक तो बनवाओ।"

सर - "हाँ, मै देखता हूँ।"

मैडम - "आप फिर भूल जाओगे और यह साल भी निकल जायेगा।"

सर - "सिविल का एग्जाम क्या घाँस छीलने को निकाला था? देखो अभी एक स्वयंसेवी संस्था तो तुम्हारी पिछले साल की तारीख से रजिस्टर करा दूँगा और एक इस साल की ....इतनी तो पहचान और रुतबा है मेरा शहर मे, और जब दूसरो के इतने बड़े काम करवाता हूँ तो अपनी बीवी का ये छोटा सा काम भी सही। अब तो खुश? अरे! ड्राईवर गाडी सचिवालय की तरफ मोड़ लो, दोपहर हो रही है, जल्दी करो रजिस्ट्रेशन मुझे आज ही करवाना है फिर 2 हफ्तों के टूर पर निकलना पड़ेगा।"

मैडम - "हाँ बहुत खुश! ए जी, ये स्वयंसेवी संस्था क्या होता है? यह रजिस्ट्रेशन ऑफिस की हिंदी है क्या?"

तभी एम्बेस्डर कार एक झटके से रुकी।

सर - "बदतमीज़! देख कर चलाया कर। क्या हुआ? उतर क्यों रहा है?"

ड्राईवर - "सर! कार के नीचे कुत्ते का पैर आ गया ....उसको ..."

सर - "तो तू कुत्ते के पिल्ले की तरह क्यों रुआंसा हो गया है? वापस आकर बैठ यहीं शाम कर देगा निकम्मा ....हरामखोर! ऑफिस बंद हो जायेगा। फिर इस कुत्ते के साथ ही सो जाइयो। कुतियाचो*$%^ कहीं का।"

कुछ देर बाद रजिस्ट्रेशन ऑफिस में।

क्लर्क - "प्रणाम सर! जय हिन्द! आप खुद क्यों आये? वैसे ही बता देते मै रजिस्टर कर देता, अब हुजूर से बड़ा थोड़े ना हो गया यह ऑफिस। मैडम के नाम से 2 स्वयंसेवी संस्था करनी है। मैडम एक महिला उत्थान पर कर देता हूँ आपकी लास्ट इयर की डेट से और जी एक अभी की आवारा जानवरों पर कर देता हूँ क्यों जी ठीक है?"

मैडम - "हाँ! ठीक है। वैसे मैक्सिमम एक नाम पर कितने रजिस्ट्रेशन हो सकते है?"

कुछ देर बाद उसी ऑफिस मे।

"मै हफ्तों से अपनी अनाथ बच्चो के लिए एक संस्था के रजिस्ट्रेशन के लिए यहाँ के चक्कर काट रहा हूँ और यह आपने कुछ मिनटों मे 2 रजिस्ट्रेशन कर दिए। क्या आप मेरे साथ ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते?"

क्लर्क - "हाँ जी! कर सकते है बशर्ते आप किसी नेता, सेठ, सेलिब्रिटी या बड़े अफसर की बीवी बनकर आओ ..."

समाप्त!

- मोहित ट्रेंडी बाबा

Tuesday, March 26, 2013

Procrastination vs. भोले शंकर (Bonsai Kathayen)




मेरी जनवरी 2013 मे प्रकाशित हुई किताब  Bonsai Kathayen से एक और पेशकश।

कक्षा 9 का छात्र शुभम कल होने वाले मैथ्स के एग्जाम को लेकर चिंतित था।

ये थ्योरम  समझ नहीं आ रही नेट पर देखता हूँ। आदतन उसकी उँगलियों चली और उसने पहले,

*) - कुछ स्पोर्ट्स स्टार्स और रस्लर्स की प्रोफाइल्स चेक की।

*) - यूट्यूब पर कुछ आगामी फिल्मो के प्रोमोज़ देखे।

*) - सोशल साइंस जिसका पेपर हो चुका  था के रैंडम फैक्ट्स, हालाँकि सोशल साइंस के पेपर से पहले इन्होने सतपुड़ा के जंगल और रेसलरस चार्ली हास और रैंडी ओर्टन की जानकारी लेते हुए घंटो बिताये थे पर आज इन्हें सोशल साइंस भी बड़ी रोचक लग रही थी।

इतना सब करने मे 3:30 बज गए और जब पढाई याद आई तब तक शुभम थक चुका  था, उसने सुबह 6 बजे का अलार्म लगाया और सुबह सब जल्दी से देख लूँगा सोचकर सो गया। सुबह 9 बजे उसके भाई ने उसको उठाया जिसको लगा की ये रात भर पढ़ा है। 10 बजे से परीक्षा थी। शुभम ने घड़ी  देखी  तो वो डिप्रेस हो गया, इतनी जल्दी वो नहाये-धोये, खाए, स्कूल पहुंचे ... का जो सोचा था सब  रह गया।

उसको गुस्सा भी आ रहा था की वैसे गलती से सेट हो जाए तो बिना बात के अजीब टाइम पर बज जाएगा पर जब ज़रुरत थी तो मोबाइल वाला अलार्म आखिर बजा क्यों नहीं? तब उसने ध्यान दिया की मोबाइल घड़ी मे AM की जगह PM सेट था।

"अब तो भोले शंकर का नाम लेकर ही एग्जाम देना पड़ेगा।"

- Mohit Sharma (Trendy Baba / Trendster)