अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Tuesday, July 18, 2017

Collaborative painting with Artist Jyoti Singh


Painting details - Oil on canvas, size-24"24" inch, inspired by a pic... 
Concept description - प्रकृति से ऊपर कुछ नहीं! प्रकृति (मदर नेचर) स्वयं में एक सच है, प्रकृति पूरक है, पालक है और संहारक भी है। आज जो घटक इतना बड़ा दिख रहा है, कल प्रकृति उसे स्वयं में समा लेगी और घटक का अपना अस्तित्व लोप हो जाएगा।

Sunday, June 26, 2016

अन-बेवकूफ (संवाद कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


Mr. A - एक बात काफी सुनता हूँ मैं...."आज का यूथ जागरूक है, बेवकूफ नहीं है!"
मतलब कल या पहले के यूथ - तुम्हारे माँ-बाप-दादे बेवकूफ थे? जितने साधन उनके पास थे उस हिसाब से बहुत सही थे। शायद गूगल-इंटरनेट के सहारे टिके "यूथ" से कहीं बेहतर...

Miss B - ...लेकिन गलतियां तो हुई हैं पहले लोगो से?

Mr. A - किसी पीढ़ी का आंकलन उस समय की परिस्थितियों को संज्ञान में लिए बिना नहीं करना चाहिए। एक जार में किसी तरह की अशुद्धियां डालिए और उस जार को हिलाइए, ऐसा होने पर बड़ी मात्रा में अशुद्धियां वापस तल पर जमने में समय लेंगी, जैसे आज़ादी और विभाजन के बाद भारतीय लोगो को नई स्थिति में जमने में सालों लग गए। साथ ही उस वक़्त अकाल, सूखा और अनाज की कमी के कारण लोग जीने के लिए आवश्यक मूलभूत बातों के लिए जूझ रहे थे। इसी दौरान भारत को तीन बड़े युद्धों को झेलना पड़ा, इन सबके बीच आम लोगो को आधारभूत (रोटी-कपड़ा-सर पर छत) सीढ़ी को चढ़ने में कुछ दशक लगे, जिसके चलते लोग अन्य मुद्दों तक जा नहीं पाए। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अविकसित क्षेत्र में अगर कोई शक्ति पा जाए तो उसे हटाने में समय लगता ही है, जो लोग पहले गलत बातों का विरोध करते थे उनके पास आर्थिक, सामाजिक और जन-जन तक अपनी बात ले जाने का कोई सहारा नहीं होता था। वैसी स्थिति अगर आज के दौर में होती तो मुझे नहीं लगता आज की पीढ़ी कुछ बेहतर कर पाती।

Miss B - एक बात मैं भी जोड़ना चाहती हूँ, यह सुपिरियोरीटी कॉम्प्लेक्स भावना लगभग हर पीढ़ी में होती है...तो माफ की जा सकती है। धीरे-धीरे कई सामान्य लोगों में अपने आप दूसरों और उनकी स्थिति समझने की और तुलना ना करने की अक्ल आ जाती है। 

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents #freelancetalents

Sunday, January 3, 2016

A Dream Unrealized....Gamunda (Gamraj)



Just found photocopy of something special! ....sharing few panels from 60-page manuscript "Gamunda" (written for Raj Comics character Gamraj)....Back in 2008, RC approved this idea of merging Yamunda-Gamraj into one superhero with humorous powers but unfortunately due to pressure from other best selling series and characters, management discontinued Gamraj series later that year and this project never saw the light of day. :(  



आज 2008 में लिखी स्क्रिप्ट गमुण्डा की फोटोकॉपी मिली, 55 पेज है लगभग। आईडिया सर को पसंद आया था पर जब तक स्क्रिप्ट हुयी तब तक गमराज सीरीज ही बंद हो गयी। एक चालाक अपराधी गैंग की हरकतों से परेशान गमराज यमुण्डा की मदद पर निर्भर रहने के बजाये उसका विलय अपने शरीर मे करवाता है और लॉजिक देता है जब नागराज में इतने सांप आ सकते है तो मुझमे एक भैंसा नहीं फिट किया जा सकता। इस विलय से बने बलशाली भैंसा-सुपरहीरो की पावर्स थी गोबर-पात (दुश्मन को गोबर की विशालकाय वृष्टि से दबा देना), उपला फायर, गोबर गैस फुंकार, भैंस की पूँछ रस्सी और यमुण्डा की पुरानी शक्ति किसी भी वाहन में बदल जाना। अब यह पढ़ रहा हूँ तो लग रहा है पहले ही बेहतर लिखता था। :) एक और मज़े की बात यह है कि ये स्क्रिप्ट ज़बरदस्ती विवेक गोयल जी (Artist, Holy Cow Entertainment Founder) को पढ़वाई थी जब वो लखनऊ के मेरे पुराने घर आये थे.....ही ही....

Monday, November 30, 2015

Micro Fiction Experiment # 2 (Mohit Trendster)



Micro Fiction Experiment, Theme: Science

*) - कृतिम रूप से लैब में निर्मित चींटी, दल में घुसपैठ करने के बाद समझ नहीं पा रही थी कि उसकी प्राकृतिक बेवकूफ बहनो में मेहनत और अनुशासन की इतनी सनक क्यों सवार है। 
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*) - रोज़ाना ज़िन्दगी से छोटे-बड़े समझौते करते हुए जिस प्रयोग में उसने अपना जीवन समर्पित कर दिया, जब वह लगभग पूर्णता पर था...तब खबर आयी कि वैसा ही प्रयोग दुनिया के किसी साधन-संपन्न वैज्ञानिक ने कर दिया है। 
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*) - जो प्रजातियां प्रयोग के लिए चाहिए थी, असिस्टेंट उनके बजाये दिहाड़ी मज़दूर ले आया। 
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*) - जेनेटिकली मॉडिफाइड क्रॉप्स (जनुकीय परावर्तित अन्न) फ़ल-सब्जी के सेवन पर व्रत में मनाही थी। सूखा ग्रस्त क्षेत्र में भी उस भोजन का आधार जीवाणु की कोशिका का मांसाहार अंश धर्म-भ्रष्ट करने को काफी थी। 
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*) - जिस हथियार के आविष्कार से उसे विश्व में नाम, मान-सम्मान मिला.....बाद में उसे बनाने की ग्लानि में ही उसने अपनी जान ली। 
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*) - आज को जिन युगों ने इतनी रफ़्तार दी, खैरात में मिली उन रफ्तारों के योग पर सवार यह पीढ़ी पुराने युगों की धीमी रफ्तारों का कितनी आसानी से मज़ाक बना लेती है!
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#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents

Friday, October 30, 2015

मित्रता की परीक्षा (बालकथा) - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


मोहन बाज़ और चंचल हिरण राजन वन्य क्षेत्र की शान थे क्योकि अपनी बुद्धिमता और कौशल से वो दोनों लंबे समय से अलग-अलग और संयुक्त रूप से राजन जंगल के लिए कई सामान्य ज्ञान, विज्ञानं, लेखन, क्विज आदि प्रतियोगितायें जीतते आ रहे थे। उम्र और कक्षा बढ़ने के साथ उनकी प्रतियोगिताओं का स्तर बड़ा हो रहा था पर दोनों घनिष्ट मित्र अब भी पहले की भाँती विजयी हो रहे थे। 

राजन जंगल का नन्हू गिद्ध ऐसी प्रतियोगिताओं के लिए आवेदन करता पर मोहन और चंचल के कारण कभी उसके चयन नहीं हो पाता। नन्हू ने स्थिति बदलने के लिए दोनों में फूट डालने की सोची। उसने मोहन बाज़ से कहा कि चंचल पीठ पीछे उसकी निंदा करती है और चंचल को समझाया कि संयुक्त टीम प्रतियोगिताओं में मेहनत तुम करती हो पर श्रेय मोहन को मिलता है, इसके अलावा निंदा और अफवाह से नन्हू ने दोनों के कान भर दिए। धीरे-धीरे मोहन बाज़ और चंचल हिरण में द्वेष, ईर्ष्या की वजह से मतभेद होने लगे, जब भी स्थिति सामान्य होने को या सुलझने को होती तो नन्हू फिर से उनके मतभेद बढ़ा देता और एक दिन बात इतनी बढ़ गयी तीखी बहस के बाद दोनों ने मित्रता तोड़ ली। उन्होंने अपने टीम तोड़ दी और इस बात का असर उनके एकल प्रदर्शन पर पड़ा और दोनों एक के बाद एक प्रतियोगिता हारने लगे। जबकि नन्हू ने अपनी टोली के साथ राजन जंगल के प्रतिनिधित्व में उन दोनों की जगह ले ली। एक बार शेखी में नन्हू गिद्धने यह बात अपनी मंडली को सुनाई कि कैसे उसने दो मित्रों को अलग कर दिया। यह बात पास ही विश्राम कर रही नटखट गिलहरी ने सुनी और मोहन बाज़, चंचल हिरण को कह सुनाई। 

तब चंचल और मोहन में सुलह हुयी और उन्हें पता चला कि ईर्ष्या और संवाद की कमी के कारण कितना नुक्सान होता है। दोनों फिर साथ आये और उन्होंने नन्हू की टीम को हराकर राष्ट्रीय विज्ञानं ओलम्पियाड में क्वालीफाई किया। इस से मोहन, चंचल और हम सबको यह शिक्षा मिलती है कि बिना विचार किये और जाँच-पड़ताल किये दूसरों की बातों पर पूर्ण विश्वास नहीं करना चाहिए, साथ ही मित्रों में संवाद की कमी मित्रता तोड़ सकती है। 

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents

Monday, September 14, 2015

इंसानी गिद्ध (कहानी) - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


"क्या अम्मा, कैसे हुआ यह?" सहानुभूति भरे स्वर में इलाके के नेता ने पूछा।"

"बस भईया भगवान की मर्ज़ी थी, उन्हें अपने पास बुला लिया।" बुढ़िया ने सुबकते हुए बताया।  

गाँव में एक वृद्ध की प्राकृतिक मौत के बाद यह नेता और इसके गुर्गे वैसी ही तेज़ी से वृद्धा के पास पहुंचे जैसे किसी ख़ुशी के अवसर पर जाने कहाँ से किन्नर आ जाते है। यह पहला मौका नहीं था, इस से पहले इस गाँव और आस-पास के गाँवो में अनेकों जगह नेता जी ऐसी शोक की घड़ियों का हिस्सा बने थे। 

नेता ने बात बनती देख काम जल्दी निपटाने का फैसला किया। "ओये सुदामा! अम्मा जी को पैसे दे और बॉडी को रखवा गाडी में तरीके से।"

अम्मा को ढाई हज़ार रुपये पकड़ा कर सुदामा एक खरीददार के जैसे हक़ से मृत शरीर की तरफ बढ़ा। 

 अम्मा संकोच से बोली - "बेटा ज़रा..."

नेता ने आदतानुसार बात काटी - "अम्मा, काका जी, मेरे भी पिता सामान थे। पूरी रीति से करेंगे उनका अंतिम संस्कार, अब कहाँ भागती फिरोगी इंतज़ाम के लिए बुढ़ापे में और यह पैसा सरकार दे रही है आपको, रख लो। यह तो आपका हक़ है।"

यह कहकर वृद्धा का आशीर्वाद लेते हुए टोली वहां से निकली। 

नेता - "वाह! आज काम कितनी जल्दी हो गया, इस अम्मा की तरह बाकी सब नहीं मिलते घंटो झिक-झिक करते है। चल अब संभावली को मोड़ गाडी।"

एक जूनियर गुर्गा बोला - "नेता जी वहां लगातार पाँच किये है, किसी और गाँव चलते है।"

फिर इस टोली ने एक अलग गाँव में जगह छाँट कर मृत वृद्ध के गले में फंदा डाल के पेड़ से लटका दिया। अगले दिन तहसीलदार एवम बाकी अधिकारीयों को बताया गया कि एक और कर्ज़े में डूबे किसान ने फसल बर्बाद होने की वजह से आत्महत्या कर ली। वृद्धा के नाम पर मिले एक लाख रुपये का मुआवज़ा कुछ सरकारी अफसरों के साथ बाँट कर नेता एंड पार्टी ने बचे 50 हज़ार गटके और किसी दूर दराज़ इलाके में अगली मौत का इंतज़ार करने लगे। पर नेता अनुसार वो शरीफ था क्योकि कम से कम वो मुआवज़े के लिए लोगो के मरने का इंतज़ार तो करता था, नहीं तो कुछ जगहों पर ऐसे नेता बूढ़े, लाचार और बेसहारा लोगो की हत्या तक कर रहे थे सरकार से राहत राशि पाने के लिए। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा (ज़हन)

Thursday, September 10, 2015

A Minus vs. B Plus - (#mohitness)


A Minus - "जब-तब लोगो को कहते सुनता हूँ कि फलाना 25 वर्षों से हमारी समिति के सदस्य है, यह वरिष्ठ सदस्या ढिमकानी बहन जी दशको से इस संस्था की सेवा करती आ रही है। इन उदाहरणों में थोड़े वेरिएशंस और जोड़ लो।"

B Plus - "हाँ तो दिक्कत क्या है, कोई वर्षो तक कहीं अपना योगदान दे तो उसका सम्मान होना चाहिए। यह तो लग रहा है तुम जलनवश कह रहे हो प्रादेशिक समिति पुरूस्कार समाहरोह में ऐसे वरिष्ठ लोगो कि धूम देख कर।"

A Minus - "जलन से नहीं अपने विश्लेषण से कह रहा हूँ। अब देखो जैसे तुम समिति से लगभग 4-5 सालों से जुड़े हो जिसमे तुम हर सप्ताह 1-2 बार समिति के कार्यक्रमों, कैंप्स और यहाँ तक कि अवकाश के दिनों में ग्रामीण टूर्स पर भी जाते हो। यानी लगभग सवा 300 सश्रम हाज़िरीयां, अब कई "वरिष्ठ" सदस्य ऐसे होते है जो खानापूर्ति के लिए समिति के वार्षिक समारोह और इक्का-दुक्का ख़ास मौकों पर दिख जाते है और फिर कहते है हम 20 साल से समिति की सेवा में लगे है, यानी 50-60 हाज़िरियां। अब बताओ किस कोण से वो तुमसे अधिक वरिष्ठ हुए?"

B Plus - "पर उनके घर-परिवार भी होंगे, अन्य ज़िम्मेदारियाँ होंगी, क्या पता उनमे कोई-कोई पांच-सात समितियों का भी सदस्य हो। ऐसे कुछ निर्णय सुना देना ठीक नहीं!"

A Minus - "यहीं छिपी है असल बात, जिसने जहाँ जितना योगदान दिया उसको वहां उस अनुपात में फायदा हो, नाम-मान्यता मिले। जो यहाँ नियमित आ रहे है निश्चित ही वो अपनी दूसरी ज़िम्मेदारियों से समय और योगदान बचा कर यहाँ लगा रहे है। अब यह थोड़े ही कि सचिन भी बन जाओ और न्यूटन भी हो लो हवा में। संख्याओं और तुलनात्मक बातों को समझने, उनके पीछे जाने की आदत नहीं है हम सबकी इसलिए आलस में बिना जाँचे फैसले लेते है, इस कारण कई सहायक किरदार भी सुपर हीरो-हीरोइन बना दिए जाते है। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा (ज़हन) 

#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelancetalents #freelance_talents

Wednesday, September 9, 2015

छद्म मुफ्तखोरी - लेखक मोहित शर्मा ट्रेंडस्टर


"जीवन में कुछ भी मुफ्त का खाने वाले मुझे बिलकुल नहीं पसंद ! अरे मेहनत करो, संघर्ष करो दुनिया में, अपनी पहचान बनाओ।" नीतू ने पिकनिक में लंच करते हुए, यूँ ही डिस्कशन कर रही मित्रमण्डली के सामने अपने विचार रखे। 

माहौल हल्का करने के लिए उसकी पुरानी बेस्टी सरिता ने कहा - "देखो मैडम को मुफ्त का खाने वाले नहीं पसंद और बातों-बातों में परांठे के एक कौर में ढक कर मेरा आचार ही गायब कर दिया।"

सबके चेहरों पर मुस्कराहट आ गयी पर बातों को समझने में समय लगाने के कारण ग्रुप की ट्यूबलाइट कही जाने वाली लड़की रीमा अब भी नीतू की बात का विश्लेषण करते हुए बोली - "पर नीतू तुम खुद भी तो कितना मुफ्त का खाती हो! तो दूसरो से शिकायत क्यों?"

सरिता - "लो बहनजी ने सिग्नल लेट तो पकड़ा ही आज गलत भी पकड़ा। तेरा बॉयफ्रेंड निगल लिया क्या नीतू ने फ्री में?"

रीमा ने सरिता को नज़रअंदाज़ करके नीतू से कहा - "देखो नीतू मैं हमेशा तुम्हे किसी समूह की ओट लिये देखती हूँ, उनकी सामूहिक साख या उनके इतिहास का सहारा लिए देखती हूँ। जैसे "मुझे गढ़वाली होने पर गर्व है", "प्राउड टू बी ए गर्ल", "ब्राउन पीपल आर द बेस्ट", "पक्की ठाकुर लड़की हूँ" और भी बहुत कुछ। ऐसा अकेली तुम नहीं करती, ये आम आदत है लोगो में। यह सब क्या है? जिन बातों पर हमारा बस नहीं, केवल हमारे जन्म से हमसे जुड़ गयी...उनपर गर्व या शर्म करने का क्या मतलब? कुछ गिनाना है तो अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियाँ, प्रतिभा, मेहनत से मिली चीज़ें गिनाओ, ऐसे समूह की आड़ लेकर खुद को महान घोषित करना भी अव्वल दर्ज़े की मुफ्तखोरी है। 

कुछ देर के लिए बगले झांकती सहेलियाँ आज "ट्यूबलाइट" की चमक में फ़ीकी पड़ गयीं। 

समाप्त!

मोहित शर्मा (ज़हन)
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Sunday, September 6, 2015

नशीले शेड्स - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


"क्या हुआ चौबे साहब, कुछ चिंतित लग रहे है?" तहसीलदार ने शहर के दानी उद्योगपति श्री लोमेश चौबे से पूछा। 

चौबे जी ने गंभीर स्वर में कहा, "कुछ लोगो को शहर के रैनबसेरे, धार्मिक स्थलों आदि कहीं पर भी ठोर ठिकाना नहीं दिया जाता था उनके चाल-चलन की वजह से, ऐसे बेसहारा लोगो के लिए शहर में कुछ जगह शेड्स लगवाये थे।"

तहसीलदार उनके सामने अपने पॉइंट्स बनाते हुए बोला, "वाह! धर्मात्मा हो तो आपसा, जिनको सबने दुत्कार दिया उनके लिए आपने सोचा। वैसे कौन अभागे लोग हैं वो?"

लोमेश चौबे - "स्मैकिया-नशेड़ी-चरसी लोग, जो शेड्स लगवाये थे वहां लगे बाकी सामान के साथ बेच कर उन गधो ने उसका भी नशा कर लिया।"

 यह बात सुनकर सहमे खड़े तहसीलदार की हँसी नहीं छूटी बल्कि पूरा ठहाका निकल गया। जो पॉइंट्स उसने चौबे जी की तारीफ़ करके बनाये थे उनसे ज़्यादा कट कर उसका अकाउंट माइनस मे चला गया। इधर चौबे जी की ज़मीन पर खुले आकाश के नीचे नशेड़ी लोट लगा रहे थे, ऐसी लोट लोग अपने बाप के यहाँ भी नहीं लगाते। 

समाप्त!

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Wednesday, September 2, 2015

जुग-जुग मरो बेटा! (कटाक्ष) - कवि मोहित शर्मा (ज़हन)


जून 2015 में एक बार फिर महाराष्ट्र में ज़हरीली शराब पीने के बाद कई लोग मारे गए और कई अन्य अंधे हो गए व कुछ की आंतें फट गयी। परिजनों के विरोध के बाद राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को 1 लाख रुपये देने की घोषणा की। पर जो अंधे हुए या जिसकी आँत फटी उनकी सहायता या पुनर्वास के लिए सरकार द्वारा कुछ नहीं किया गया। मृतकों के परिवारों से मेरी सहानुभूति है कि कुछ नियम, कानून और जागरूकता बढ़ा कर ये मौतें कम की जा सकती थी। इस विषय पर ये कटाक्ष काव्य। शब्द जानबूझ कर तीखें किये है, इनका बुरा मानें, इसको दिल पर ज़रूर लें - आवाज़ उठायें.....पर सही जगह!

जुग-जुग मरो बेटा!

रसमलाई क्या जलेबी भी लगे अब फीकी ,
जो शराब लखपति बनायें....  
वो ज़हर नहीं अमृत सरीखी। 

मलाल है क़ि पूरी क़ि पूरी क्रिकेट टीम को खड़ा क्यों ना किया,
फालतू में "हम दो, हमारे दो" स्लोगन को इतना seriously ले लिया। 
जबसे ट्रेजेडी का मुआवजा बँट गया,
तबसे साला हर शराबी चलती फिरती FD बन गया। 

अजीब देश है, शहीदो की विधवाएं पैसो के लिए कितनी दौड़ लगातीं है,
जबकि शराबियों के घर सरकार खुद चेक लेकर आती है। 

जब लोगो को लाख का चेक मिलते देखा,
चौल का हर बूढा आशीर्वाद देता फिरता - जुग-जुग मरो बेटा!
जनता में अचानक समाजसेवा की जगने लगी है इच्छा,
गोद लेना चाहते है लोग पियक्कड़ यतीम बच्चा। 

दहेज़ में कितना सामान मांग रहा है तेरा जीजा,
बिन आँखों के, फटी आँतों से Installment मे मत जी,
बाउजी कुछ पव्वे ब्लैक में लाएं है गटागट पीजा। 

किसी करमजले का पेट फटा,
तो कोई धरती का बोझ सूरदास बना, 
असली सपूत सिर्फ वो,
जो पिके सीधा शहीद हुआ!

- मोहित शर्मा (ज़हन)

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Friday, August 28, 2015

किस्मत से कुश्ती - लेखक मोहित शर्मा ज़हन

छोटे द्वीप समूहों से बने एक गरीब देश के आधा दर्जन खिलाडियों और दर्जन भर स्टाफ के दल में पदक की उम्मीद किसी खिलाडी से नहीं थी, ओलम्पिक में क्वालीफाई करना ही उनके सबके लिए बड़ी बात थी। उनमे एक महिला कुश्ती पहलवान जोएन का लक्ष्य था बेहतर से बेहतर करते हुए स्पर्धा में दूर तक जाना। उसके साथी देशवासी शुरुआती चरणो में ही बाहर हो गए और 4 राउंड्स जीत कर जोएन अपने भार वर्ग के सेमी फाइनल्स में पहुँच गयी। यहाँ उसका सामना पूर्व चैंपियन अमेरिकी पहलवान मार्था से था। मुक़ाबला तगड़ा और बराबरी का चला जिसमे मार्था ने बातों और चीप दावों से जोएन को विचलित करने की भरसक कोशिश की, मैच में बीच-बीच में अपनी संभावित हार देख रही परेशान मार्था की विवशता और गुस्सा साफ़ दिख रहे थे। अंततः परिणाम निर्णायक मंडल में मतभेद के साथ लगभग बराबरी का रहा जिसमे एक पॉइंट के मार्जिन से मार्था को विजय प्रदान की गयी।
जीत के नशे में चूर मार्था निराश जोएन का मज़ाक बनाती और अपशब्दों की बौछार करती निकल गयी। कांस्य पदक के मुकाबले से पहले केवल एक मैच के लिए जोएन को एक प्रायोजक मिल गया। पर 2 सपोर्ट स्टाफ सदस्यों को छोड़ कर देश के कैंप के बाकी लोग पहले ही स्वदेश लौट गए थे। सीमित साधनो और बदले कड़े माहौल में इतने दिन रहने के कारण जोएन की तबियत मैच से पहले बिगड़ गयी। पैसो के लालच में वह मैच में उतरी और तगड़ी प्रतिद्वंदी ने आसानी से उसे हरा दिया। इसके बाद मार्था ने इस वर्ग का स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
कुछ वर्षो बाद कई अन्य उपलब्धियाँ बटोर चुकी मार्था का नाम विश्व के महानतम और अमीर एथलीट्स में लिया जाता है और जोएन ने अपने देश लौटकर प्रायोजक से मिले पैसों से वो फल-सब्ज़ी की दुकान खरीद ली जो वह पहले किराये पर लेकर चलाती थी। उस ओलम्पिक के बाद जोएन फिर कभी किसी कुश्ती प्रतियोगिता में नहीं दिखी।  
#mohitness #mohit_trendster #freelancetalents #trendybaba 

Monday, August 24, 2015

मोहल्ले का (कु)तर्क गुम हो गया - मोहित शर्मा ज़हन

लघुकथा 
"माना राजनीती में कुछ ऊँच-नीच हो जाती है, पर नेता जी हमारे लिए तो अच्छे है। हम लोगो से तो व्यवहार अच्छा है, छोटे-मोटे काम करवा देते है मोहल्ले के और क्या चाहिए? अब समाज का ठेका थोड़े ही ले रखा है हम लोगो ने!"

ऐसे तर्क होते थे वर्धा ब्लॉक मोहल्ले वालो के जब उन्हें शहर और उसके आस-पास के गाँव-देहात में उनके मोहल्ले की भव्य महलनुमा कोठी मे निवास कर रहे नेता जी एवम उनके गुर्गो की गुंडई, मनमानी के किस्से सुनने को मिलते थे। एक दिन नेता जी द्वारा दर्जनो व्यापारियों से की गयी मारपीट, वसूली के बाद शहर के हज़ारो उपद्रवी व्यापारियों और ऐसा कोई मौका ढूँढ रहे नेता जी के विरोधियों  ने मोहल्ले पर धावा बोल, भीड़ का फायदा उठाकर वहाँ के स्थानीय निवासियों से मारपीट, कई गाड़ियों एवम संपत्ति में आगजनी करते हुए  नेता जी के घर पर धावा बोल दिया जिसमे उनके कुछ समर्थको, परिवार समेत बर्बर हत्या कर दी गयी। 

इस घटना में गंभीर रूप से घायल नेता जी के शुभचिंतक पडोसी सिंह साहब ठीक होने के बाद दिवंगत नेता जी के लिए कोई तर्क नहीं रखते। उनके दिमाग के उस हिस्से पर गहरी चोट आई जो तर्क समझता और प्रेषित करता है, इस कारण अब वो किसी भी तरह का तर्क नहीं रख पाते....बाकी मोहल्ले वालो के सर में चोटें नहीं आयीं....पर वो भी अब तर्कों को दूर से नमस्ते करते है!

- मोहित शर्मा ज़हन

Wednesday, August 19, 2015

मोहित ट्रेंडी बाबा - "अब पछताय क्या होत है जब...ऊपर वाले की बेआवाज़ लाठी पड़ी"

मैंने लोगो को मलाल करते देखा है कि वो किन्ही कारणवश औरों के सामने अपना पक्ष ठीक से नहीं रख पाये, या अपनी बात नहीं समझा पाये और सामने वाला अपनी गलत सोच, बात, कुतर्क, उदाहरण आदि पर खुश होते हुए, यह सोचता हुआ आगे निकल गया कि वह सही था  और उसे समझाने वाले या उसके विरोध में खड़े लोग गलत। अगर ऐसा कुछ दफ़े हो जाये तो अपने अभिमान में लोग यह तक मान बैठते है कि वो हमेशा सही होते है जिस कारण अक्सर वो विषय को पूरा समझना ही नहीं चाहते। ऑनलाइन जगत का जैसे-जैसे प्रभाव मानवीय जीवन पर बढ़ा है उसमे ऐसी बातें रोज़मर्रा की सी हो गयी है। बात यहाँ ख़त्म नहीं होती, वह व्यक्ति जो किसी विषय/विषयों पर अपनी सोच अनेक वर्षो से सही मानता और अमल में लाता आ रहा है उसको अगर कोई समझा नहीं पाता, या वह किसी की नहीं सुनता तो भी उसे समय द्वारा गहरा सबक मिलता है। अगर बात बड़ी है जिस से उसका लाभ या मतलब जुड़ा है तो सबक और बुरी चोट करके जाता है। 

जैसे मेरे एक रिश्तेदार को लगता था कि संयुक्त परिवार में स्वर्ग है बिलकुल हम साथ-साथ है, हम आपके है कौन वाली छवि, साथ ही आजकल कि न्युक्लीअर फैमिलीज़ (एकल परिवार) कलियुग! लोगो ने समझाया कि जल्दबाज़ी ना करें थोड़ा और देख-समझ कर रिश्ता करें पर आँखें चकाचौंध तो लगी रही गौंद, और जल्दबाज़ी में उनकी लड़की का रिश्ता एक संयुक्त परिवार में हुआ। अब उस परिवार में भाइयों-उनकी पत्नियों और माता-पिता में छोटी-छोटी बातों में क्लेश, पैसो-संपत्ति पर विवाद, घर की मरम्मत से लेकर राशन की खरीद तक कोई पैसे नहीं खर्चना चाहता क्योकि वो तो "पब्लिक प्रॉपर्टी" हो जायेगी जो सब इस्तेमाल करेंगे। जिस स्तर पर उनकी पुत्री उनके साथ रह रही थी वह अब उस से काफी दयनीय हालत में किसी तरह समझौता करके रह रही है। इस दौर में सपनो के (या टेलीविजन, फिल्मो वाले) संयुक्त परिवार तब होते है जब आपकी आय और संपत्ति अच्छी-खासी हो ताकि ऐसी छोटी बातों पर रोज़ की झिक-झिक ना हो इसका मतलब यह नहीं कि बाकी संयुक्त परिवार सब बेकार और एकल परिवार बेहतर, यहाँ तात्पर्य यह है कि एक बँधे दायरे कि सोच में बड़े फैसले ना लें। चाहे मेरे रिश्तेदार अपने अहं के चलते खुद को अब भी सही कहें पर अंदर ही अंदर वो सच जानते है, उन्हें गहरी चोट के साथ सबक  मिला जो अब उनके किसी काम का नहीं। 

यह सिर्फ एक उदाहरण था जीवन में ऐसे छोटे-बड़े सबक लोगो को मिलते रहते है, कोशिश यह रहनी चाहिए कि हम ऐसी सीख मिलने से पहले संभल जाएँ। किसी के हित में उसे समझाने कि कोशिश करें अगर वह अड़ा रहे तो वक़्त और ईश्वर पर छोड़ दें और बाद में उसे चिढ़ाएं... :p :) (kidding)

- मोहित ट्रेंडी बाबा 

Friday, August 14, 2015

Aazadi Poetry - #‎मोहित_ज़हन‬

बिना शिकन वो पूछ रहे "देश बर्बाद है! किस बात की आज़ादी? कैसी आज़ादी?"
कि कॉन्फिडेंस से पूरी क्रिकेट टीम पैदा कर लो.... 
कि सालों-दशको-सदियों पुराने "बदलो" के हिसाब में लड़-मरलो.... 
कि कुतिया में परिवर्तित होकर औरों का हक़ मारने में उसेन बोल्ट का रिकॉर्ड हरलो... 
और ज़िम्मेदारी निभाने में 'पहले आप - पहले आप' करलो...

कि न्यूज़ रिपोर्ट्स से देश को कोसते हुए AC में दूध ठंडा करलो....
अपने गिरेबां में झाँको तो पाओगे तुम हिन्द नहीं सोमालिया डिज़र्व करते हो सालो!

और अजब है अपना भारत भी...
जो इतने कमीनों के होते हुए भी 200 मुल्कों में डेढ़ सौ से बेहतर है अपनी "आज़ादी"
अनगिनत पाप की आज़ादी, आस्तीन के सांप की आज़ादी! 
जय हिन्द! First deserve, then desire...

P.S. Artwork from latest Kavya Comic "Desh Maange Mujhe"
— celebrating Indian Independence

Saturday, July 18, 2015

क्रॉस कनेक्शन (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन


बगल के घर से आती आवाज़ों को सुन सुमेर सोच रहा था कि लोगो को उसके पडोसी मनसुख लाल की तरह नहीं होना चाहिए जो अपने परिवार की खातिर और कानून के डर से अपनी हिंसक बीवी सुशीला के हाथो पिटता रहे और कानो मे काँच सा घोलते तानो को ताउम्र सहता चला जाये। इधर शाम को आसमान को एकटक निहारते अपने पडोसी को देख कर मनसुख लाल सोचने लगा कि लोगो को सुमेर कुमार जैसा नहीं होना चाहिए जो पत्नी राधा के 2-4 तानो को अपनी मर्दानगी पर ले उसे दोमंज़िल से नीचे फ़ेंक दें और फिर हादसे का बहाना बना कर जीवन भर कोमा में पड़ी बीवी का बिल भरता रहे, ससुराल वालो से केस लड़ता रहे। तीसरे-चौथे पडोसी आपस में बातें कर रहे थे कि सुमेर की शादी सुशीला से होनी चाहिए थी और मनसुख का बंधन राधा से बंधना चाहिए था, तब कम से कम एक जोड़ा सुखी रहता और सुमेर -सुशीला के भी दिमाग ठिकाने रहते। 

समाप्त!

टिप्पणी - जीवन में संतुलन हमेशा पूरा व्यक्तित्व बदल कर नहीं बल्कि अक्सर व्यक्ति में कुछ गुण, व्यवहार बदल कर भी लाया जा सकता है। 

- मोहित शर्मा (ज़हन) 
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Thursday, July 9, 2015

Comics Theory Anthology Contest

मेरा सौभाग्य है कि अनुसंधानकर्ता, कलाकार-लेखक श्री शंभूनाथ महतो के "कॉमिक्स थ्योरी" संकलन प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में मुझे श्री अनुराग सिंह के साथ शामिल किया गया है। अधिक जानकारी के लिए Comics Theory पेज, ब्लॉग विजिट करें। 

Saturday, May 9, 2015

सफेदबाज़ारी - मोहित शर्मा (ज़हन)

(Picture - Bidholi, Dehradun)
नोट - इस कहानी का निरंतर कॉमिक्स की कालाबाज़ारी करने वाले और फिर भी कॉन्फिडेंस-अकड़ में रहने वाले जैसे इतिहास में प्राण कुमार शर्मा जी के बाद उन्ही का नाम आयेगा ऐसे बंधुओं से कोई संबंध नहीं है।
बहुत समय पहले की बात है कुछ राज्यों में कला से जुडी वस्तुओं का संग्रह का विशेष चलन था। महान कलाकारों की रची वस्तुओं को सभी पाना चाहते थे पर उनकी संख्या सीमित रह जाती जिसके चलते जगह-जगह अनैतिक कालाबाज़ारी शुरू हुयी। फिर राज्यों ने ऐसी तकनीक अपनायी जिसमें एक कला की अनेको नक़ल जनता के लिए उतारी जाती पर जनसँख्या अधिक होने के कारण थोड़े समय बाद कम मूल्य की वस्तुऍ उनसे कई गुने दामो पर बेचीं जाती।
प्रशासको ने जनता को धैर्य से वस्तुएँ संग्रह करने की सलाह दी और यह भी बताया की नए समय में असंख्य नए प्रतिभावान कलाकार कृतियों को बेचने के लिए आतुर है पर जनता को जैसे पुराने काल का मोह हो गया है, आवश्यक नहीं कि एक ख़ास तरह का संग्रह बाकी तरह के संग्रह से अच्छा या ख़राब हो। नयी-पुरानी कलाकृतियों का मिश्रित संग्रह भी एक अच्छी और सम्मानजनक बात है क्योकि आज जो नया है वह थोड़े वर्षो उपरांत पुराना होगा। वैसे भी धैर्य के साथ कुछ वर्षो में मनचाहा संग्रह बनाया जा सकता है पर कई प्रजाजन दूसरो से स्वयं को बेहतर दिखाने, रौब जमाने वर्षो के काम को कुछ महीनो में करने की ठाने थे इसलिए कालाबाज़ारी अब भी फल-फूल रही थी। अंततः सभी राज्यों ने बिचौलियों को चिन्हित कर उनपर 3 वर्षो का प्रतिबंध लगा, सभी को अपनी संयुक्त परिधि से बाहर निकाल दिया।
जो व्यक्ति अब तक पूरी तरह निर्भर होकर इसको एक व्यवसाय कि तरह चला रहे थे उनका गुज़र बसर कुछ अरसे तक अपनी बचत पर चला फिर उन्हें जीवन-यापन के लिए कुछ "असल" काम ढूँढना पड़ा। प्रतिबंध की अवधि उपरांत उनमे से अधिकतर अपने नए काम में लीन हो चुके थे। इस बीच कुछ ऐसे समूहों को बढ़ावा मिला जो बिना किसी लालच के एक-दूसरे का संग्रह बढ़ाने पर ज़ोर देते थे। तत्कालीन विचारको ने कहा कि आगे समय में प्रजा को ही प्रशासको का काम करना होगा और धैर्य रखते हुए ऐसे कालाबाजारियों को अनदेखा कर उन्हें कोई "असल" काम करने के लिए प्रेरित करना होगा।
- मोहित शर्मा (ज़हन) 

Thursday, April 30, 2015

Bageshwari # 03 (May 2015)


Sunehri jo Meera (Poem) and Dhongi Filmkaaro ki jamaat (Article) published in May 2015 edition of Bageshwari Magazine.

Google Playstore Link - http://books.google.co.in/books/about?id=wTCzCAAAQBAJ&redir_esc=y

- Mohit Sharma (Trendster) #mohitness #mohit_trendster #trendy_baba #bageshwari #rajasthan #india

Tuesday, April 28, 2015

झोलाछाप टैलेंट - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


मेरा नाम है रवि यादव....प्यार से लोग मुझे झोलाछाप लेखक बुलाते है। 

कभी अपने सपनो का पीछा करते-करते मैं मुंबई आया था। रहने के लिए कमरा ढूँढ़ते हुए डीलर ने लोकेश गौतम से मिलवाया, मेरी तरह वह भी मुंबई एक बड़ा राइटर बनने आया था। बड़ा सभ्य और सभी से प्यार से मिलने वाला बंदा था। मैं जैसे तैसे एक अखबार में लगा पर उसका कुछ नहीं हो पाया। उसमे लेखक वाली बात जो नहीं थी, इधर-उधर जोड़कर बनायीं कहानियाँ, आइडियाज कहाँ चलते है? पर उसके मुँह पर यह बात बोलने की हिम्मत नहीं थी मुझमे। शायद इसलिए क्योकि कहीं ना कहीं लोकेश में मुझे अपने बड़े भईया दिखते थे। 

कुछ समय बाद मुझे बेहतर तनख़्वाह पर एक मैगज़ीन में काम मिला तो अपनी जगह मैंने उसको काम पर लगवाया। एक दिन जब घर लौटा तो देखा मेरी कुछ अधूरी स्क्रिप्ट्स गायब थी और साथ ही लोकेश का भी कोई अता-पता नहीं था। लालच में उसने मेरी कहानियां अपने नाम से एक प्रोडक्शन हाउस को बेच दी। मेरी कहानियाँ राइटर्स एसोसिएशन में रजिस्टर्ड थी पर थोड़ा बहुत हेर-फेर कर नक़ल को असल बनाने में उसे महारथ थी इसलिए केस करने पर भी कुछ साबित नहीं होने वाला था। मैंने सोचा चार-पांच स्क्रिप्टस से कितने महीने जी लेगा? मेरा दिमाग तो नहीं चुराया उसने। आखिर टैलेंट के आगे तो नक़ल को हमेशा झुकना पड़ता है। 

तबसे आज 12 बरस हो चुके है। आखिरकार मेरा संघर्ष रंग लाया, मुझे एक महान हस्ती के ऊपर बन रही बड़े बजट की बायोग्राफिकल फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने का काम मिला है। वह महान शख्स जिसके ऊपर यह फिल्म बन रही है....लोकेश गौतम। 
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- मोहित शर्मा (ज़हन)

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