शुभानन्द कृत राजन-इक़बाल रिबोर्न सिरीज़ # 6 - "कब्र का रहस्य" कि
पहली काव्य प्रस्तावना हाज़िर हूँ। जहाँ एक देशभक्त पिता का साया अपने बेटे
से मुखातिब है।
अधूरी रस्म
फ़ासलों कि ज़बानी कह गयी ....
रास्तों कि कहानी कह गयी ...
अरसो वाली ईद कि तैयारी ....चंद पलो मे वीरानी रह गयी ...
मौसम को सजदा करती फसल .....तेरे इंतज़ार मे खड़ी रह गयी।
खुशियाँ साथ बांटने की बात से बरगलाया,
फितरत में झूठ बोलकर उसका दिल बहलाया ....
रह गया ये मलाल बाद तक ....
दीवाना मेरी कब्र पर गुलाल ले आया।
कुछ फकीरों के एहसान रहे मुझपर ...
वतन कि उन गलियों का मेरा क़र्ज़ चुका देना ....
काश बुज़दिली और मजबूरी का फर्क समझाने का वक़्त होता ....
ज़मीन पर पड़े पुराने ख़त उनके पतों पर पहुँचा देना।
अधूरी रहीं वो पुरानी रस्म निभा देना ...
न वो दिखता, ना वो छुपता ...बरसता जब आसमां से पाक रहम ....
भरोसा रख तू ऐ बंदे जल्द साथ देंगे मौसम ...
गिले-शिकवे, दगा-धोखे ....गला देगी हवा वो नम।
सियासतदान तुमसे मेरा अक्स मिलाते होंगे ...
बस मेरे अंजाम से अपना अंजाम मत मिला लेना।
शाम को हाथ मे पिघलने न देना ...
अगर लफ़्ज़ों पर पाबंदी लगे उनकी ....तो मन में दुआ पढना ...
अधूरी रहीं वो पुरानी रस्म निभा देना ...
न जाने कितनी गोलियों पर नाम है तेरे वालिद का ...
अदब से उन सब को अपनी मयान मे सजा लेना।
अधूरी रहीं वो पुरानी रस्म निभा देना ...
मंजिलों के इश्क मे ज़ालिम रास्तों के हाथो,
हजारों शिकार यूँ जो मरते .....
रेगिस्तान मे नादानी से उगे पौधे,
सावन के आने का इशारा नहीं करते .....
अधूरी रहीं वो पुरानी रस्म निभा देना ...
चुड़ैल सी मुझपर चढ़ी वतन की मोहब्बत ...अपनों के प्यार पर इस कदर पड़ी भारी,
मै तो फिर कभी गाँव आ ना सका ....तुम घर वापस ज़रूर लौट जाना।
- Mohit
फ़ासलों कि ज़बानी कह गयी ....
रास्तों कि कहानी कह गयी ...
अरसो वाली ईद कि तैयारी ....चंद पलो मे वीरानी रह गयी ...
मौसम को सजदा करती फसल .....तेरे इंतज़ार मे खड़ी रह गयी।
खुशियाँ साथ बांटने की बात से बरगलाया,
फितरत में झूठ बोलकर उसका दिल बहलाया ....
रह गया ये मलाल बाद तक ....
दीवाना मेरी कब्र पर गुलाल ले आया।
कुछ फकीरों के एहसान रहे मुझपर ...
वतन कि उन गलियों का मेरा क़र्ज़ चुका देना ....
काश बुज़दिली और मजबूरी का फर्क समझाने का वक़्त होता ....
ज़मीन पर पड़े पुराने ख़त उनके पतों पर पहुँचा देना।
अधूरी रहीं वो पुरानी रस्म निभा देना ...
न वो दिखता, ना वो छुपता ...बरसता जब आसमां से पाक रहम ....
भरोसा रख तू ऐ बंदे जल्द साथ देंगे मौसम ...
गिले-शिकवे, दगा-धोखे ....गला देगी हवा वो नम।
सियासतदान तुमसे मेरा अक्स मिलाते होंगे ...
बस मेरे अंजाम से अपना अंजाम मत मिला लेना।
शाम को हाथ मे पिघलने न देना ...
अगर लफ़्ज़ों पर पाबंदी लगे उनकी ....तो मन में दुआ पढना ...
अधूरी रहीं वो पुरानी रस्म निभा देना ...
न जाने कितनी गोलियों पर नाम है तेरे वालिद का ...
अदब से उन सब को अपनी मयान मे सजा लेना।
अधूरी रहीं वो पुरानी रस्म निभा देना ...
मंजिलों के इश्क मे ज़ालिम रास्तों के हाथो,
हजारों शिकार यूँ जो मरते .....
रेगिस्तान मे नादानी से उगे पौधे,
सावन के आने का इशारा नहीं करते .....
अधूरी रहीं वो पुरानी रस्म निभा देना ...
चुड़ैल सी मुझपर चढ़ी वतन की मोहब्बत ...अपनों के प्यार पर इस कदर पड़ी भारी,
मै तो फिर कभी गाँव आ ना सका ....तुम घर वापस ज़रूर लौट जाना।
- Mohit
