अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
Showing posts with label Writeup. Show all posts
Showing posts with label Writeup. Show all posts

Sunday, September 13, 2026

A Little Mystery, A Lot of Heart: A Moving Statue

 

As a child, I was always drawn to stories. Any book I could get my hands on was enough to spark my curiosity, and that simple love for reading is something I still carry with me.

Recently, I got the opportunity to edit A Moving Statue, a collection of eight stories by Samir Ghoshal, published by Flydreams Publications. Working on the book was a pleasant experience because its stories bring together mystery, adventure, friendship, emotions, and simple life lessons in a way that can appeal to young readers. From the suspense surrounding a mysterious statue in the title story to tales of courage, friendship, animals, teachers, honesty, and loyalty, the collection offers plenty of variety. The simple language and illustrations also make it accessible to children and suitable for readers who are beginning to develop an interest in books.


With Author Samir Ghoshal (Oct 2025)

While a few stories could have benefited from sharper sentence construction and some additional humour in the dialogues, the collection's warmth and sensitivity remain its biggest strengths. I was happy to be associated with A Moving Statue as its editor, and I hope these stories bring young readers the same sense of curiosity and joy that books brought to me as a child. Wishing Samir Ghoshal and Flydreams Publications the very best for the book.

Friday, September 11, 2026

The Professor Sahab...

पुस्तक - The प्रोफेसर साहब
लेखिका - श्रीयांशी चौबे
संपादक - मोहित शर्मा ज़हन
प्रकाशक - FlyDreams Publications

 कहानी कॉलेज लाइफ, दोस्ती, पसंद और रिश्तों के बीच आगे बढ़ती है। कहानी की शुरुआत सृष्टि के कॉलेज में आने और प्रोफेसर राघव से मिलने से होती है। धीरे-धीरे राघव का असर सृष्टि पर पड़ने लगता है और कहानी उनके रिश्ते के साथ कई नए पहलुओं को सामने लाती है।


किताब को पाठकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। मेरे लिए भी अच्छा लगता है कि जिस किताब के संपादन का हिस्सा रहा, उसे पढ़कर लोग अपनी राय साझा कर रहे हैं। उम्मीद है The Professor Sahab आगे भी और पाठकों तक पहुँचेगी।



Friday, August 14, 2026

मासूम आवाज़ों में आज़ादी का जश्न...स्वतंत्रता दिवस!

 

पता नहीं कौन सिरफिरे आपकी शहादत के किस्से पढ़ा करते हैं, 100 साल बाद भी आप भारत के बच्चे-बच्चे में जिया करते हैं.... जय हिंद! इंक़लाब ज़िंदाबाद!

=================

जब स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों को स्कूल से किसी स्वतंत्रता सेनानी का रूप बनकर आने को कहा जाता है, तो सच कहूँ, बच्चों से ज़्यादा मैं खुद उत्साहित हो जाता हूँ। उनकी मासूम आँखों में देश के लिए गर्व और उनकी टूटी-फूटी ज़ुबान में स्वतंत्रता सेनानियों के नारे सुनकर मन खुश हो जाता है। विभव आज शहीद भगत सिंह जी बने हैं। शायद यही वो छोटी-छोटी चीज़ें हैं, जो हमारी अगली पीढ़ी को हमारे इतिहास और हमारे संघर्षों से जोड़ती हैं। हमारे देश ने आज़ादी के बाद कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन हमारे सामने आज भी कई चुनौतियाँ हैं। बेहतर भारत की ओर बढ़ने का यह सफ़र और संघर्ष यूँ ही आगे बढ़ता रहे।

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जय हिंद!

#ज़हन

Wednesday, January 29, 2025

Proud to Be Among the 76: WAVES Comics Creator Championship Semi-Finalist

 I’m truly excited and humbled to share that I have been selected as one of the 76 semi-finalists in the WAVES Comics Creator Championship, powered by the Indian Comics Association and supported by the Ministry of Information and Broadcasting, Government of India. It feels special to be listed among such talented creators on the occasion of India’s 76th Republic Day. I’m participating in the Professional Creators category, alongside my creative partner Ayush Kumar.

Official Press Release

A big thank you to the jury and organizers for this recognition. Heartfelt congratulations to all my fellow finalists — let’s keep pushing the boundaries of storytelling through comics! 

#WAVESComicsCreatorChampionship #IndianComicsAssociation #Grateful #RepublicDay #ComicsCreator #SemiFinalist

Friday, May 3, 2024

काव्य पंक्तियां

लेखक श्री परशुराम शर्मा के साथ एक पुरानी तस्वीर (मेरठ)

चाणक्य सीरीज के लिए कुछ काव्य लिखा था, यहां साझा कर रहा हूं। बाकी कुछ यहां भी मिल जाएगा - (अलविदा, मेरे दोस्त बन चुके प्रोजेक्ट...)

 “दूर कहीं छाये युद्ध के बादल,

आँखों ने नम किया प्रियम्वदा का आँचल।

प्रसव की घड़ी है पास,

कैसे छोड़े चंद्र नंदिनी का साथ?

कर्तव्यनिष्ठा का अतुल प्रमाण,

शशांक ने थामी सेना की कमान!”

============

“दक्षिण की रणभूमि में था रक्तरंजित मंज़र,

शशांक की पीठ पर अपनों ने ही घोंपा खंजर। 

तूफ़ान से पहले आई ये एक शांत घटा है,

बरसो बाद चंद्र के क्रोध का ज्वालामुखी फटा है!

अपनों के आंसुओं से छलनी चंद्र ने शपथ खाई!

अश्वपुर के बहाने देखो दक्षिण की शामत आई।”

=============

कलाकार श्री फ़ैसल मोहम्मद के साथ तस्वीर (लखनऊ, 2018)

प्रतिशोध निराधार, गरल का वार।

तिल-तिल चन्द्रगुप्त को निगल रही युद्ध की दलदल,

सोने से ज़्यादा अनमोल चाणक्य के लिए पल-पल!

भीषण द्वन्द छिड़ा है दोनों ओर,

बताएगा आने वाले पहर…

जीवन जीतेगा या ज़हर!

===========

महल में बिन्दुसार की किलकारी गूंज उठी,

नंदिनी अपना जीवन हार कर भी जीत गई।

योद्धा चंद्र जब तक प्रेमी के रूप में आया,

राह तकती नंदिनी से अंतिम बार भी नहीं मिल पाया।

शोक में डूबा मगध और विमुख हुआ चंद्र,

अपनी ही संतान से हुआ मोहभंग!

===========

#ज़हन

Thursday, February 15, 2024

कलाकार अभिषेक सिंह से छोटी सी मुलाक़ात

पुस्तक मेले 2024 में एक किताब के विमोचन में जाना था कि तभी एक बड़े कैनवास पर व्यस्त एक कलाकार को देखा। वह आर्ट स्टाइल और कद-काठी जान पहचानी लगी और मैं कार्यक्रम का मोह छोड़ कर तुरंत उस तरफ बढ़ गया। यहां Abhishek Singh जी तल्लीनता से अपनी कला में किरदार निभा रहे कछुए की आँखों में जादू भर रहे थे। सबसे पहले तो मैंने भीड़ में से ही उनकी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल खोलकर यह दिखाया कि मैं आपकी फ़्रेंडलिस्ट में हूं। अभिषेक भाई मुस्कुराए, फिर कुछ देर बातें हुई और समय का पता ही नहीं चला। वापस लौटने की बात कहकर कार्यक्रम की ओर बढ़ गया, वो और बात है कि फिर लौट नहीं पाया... 

#phirkabhisahi #art #AbhishekSingh #worldbookfair2024

Wednesday, September 22, 2021

मेरे देश की टीम बनाम निजी संस्था की टीम! (भारतीय क्रिकेट)

Japan (Women) cricket team - 2010 Asian Games Bronze Medalists

 जो बीत गया, उसे बदला नहीं जा सकता - लेकिन उससे सीख ज़रूर लेनी चाहिए। जहां पदक तालिका में जापान, अफ़गानिस्तान जैसे उभरते देशों को देखना अच्छा रहा, लेकिन फिर याद आया कि किसी द्विपक्षीय सीरीज़ की वजह से भारत ने एशियाई खेलों में जैसे थाली में सजा के रखे गए चार पदकों को नहीं लिया। पुरुष टीम का कैलेंडर आईपीएल आदि की वजह से समझ में आता है (वैसे यह वजह भी सही नहीं), पर महिलाओं को 2010 और 2014 के दो स्वर्ण पदक जीतने के लिए क्यों नहीं भेजा गया, मेरी समझ से परे है। अगर भारत अपनी रिज़र्व टीमें भी भेजे, तो स्वर्ण न सही पर पदक ज़रूर आ सकते हैं। 

उस समय इस बात पर काफ़ी हंगामा और कोर्ट केस भी हुआ था। अंत में लचीले कानूनों पर अमीर बीसीसीआई बोर्ड की जीत हुई और फ़ैसला दिया गया कि तकनीकी रूप से भारतीय क्रिकेट टीम - भारत की टीम न होकर, बीसीसीआई संस्था की टीम है। यह खबर जानकार बड़ी निराशा हुई। इस बाबत मैंने लल्लनटॉप मीडिया के एक कार्यक्रम में नामी भारतीय महिला क्रिकेटर शिखा पांडे से सवाल किया (और उन्हें जापान जैसे देशों के क्रिकेट में पदक जीतने का उदाहरण भी दिया), तो उन्होंने डिप्लोमेटिक से जवाब में बताया कि एक क्रिकेटर होने के नाते उनका मुख्य काम क्रिकेट खेलना है और बोर्ड की नीतियों या प्रबंधन के फ़ैसलों की उन्हें खास जानकारी नहीं है...सार्वजनिक मंच पर मुझे ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी।

अब देखना है कि 2022 के खेलों में बीसीसीआई का क्या रुख रहता हैं।

Tuesday, June 2, 2020

Kuch Meter par Zindagi | Mohit Sharma 'Zahan' | Motion Poster | BOOK BABU


Team Book BaBu - "[ कुछ मीटर पर ज़िंदगी ]
पहले कुछ बातें लेखक के बारे में,
मोहित शर्मा जी, जो की मोहित शर्मा 'जहन' नाम से बेहतर जाने जाते हैं , तथा दोस्तों और अपने फैंस के बीच ' ट्रेंडी बाबा ' के उपनाम से भी प्रसिद्ध हैं , वर्ष 1999 से लेखन में कार्यरत हैं। जब उन्होंने कक्षा 6 में अध्ययनरत ही कारगिल युद्ध के वीरों को समर्पित एक कविता लिखी थी, जो उस समय ' राष्ट्रीय सहारा ' में प्रकाशित हुई थी, मौजूदा समय की बात करें तो कॉमिक्स फैन्स की दुनिया में शायद ही कोई ऐसा फैन होगा जो मोहित जी के नाम और काम से परिचित नहीं होगा , क्योंकि तबसे लेकर अब तक मोहित जी के कई साझा संकलन , कॉमिक्स, ईबुक्स एवम प्रिंटेड किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, इन सब से गुजरते हुए आपने " फ्रीलांस टैलेंट्स " और " इंडियन कॉमिक फैंडम " नामक उपक्रमो की भी शुरुआत की।
प्रस्तुत क़िताब के बारे में आपको बता दें कि इसमें 90+ लघु-कहानियों का संकलन मौजूद है। जिसमें आपको हर स्वाद का ' मोहितपन '
मिलेगा, ये कहानियां आपको हंसाएगी, रुलायेंगी , और जरूरत के हिसाब से धिक्कारेंगी भी, चूंकि मोहित जी लेखन में अपने प्रयोगों के लिए भी प्रसिद्ध हैं तो ऐसे में आपके लिए ये संकलन एक खज़ाने से कम नहीं साबित होगा।
-------------


बकौल मोहित जी ,
" इस संकलन की कहानियों में इन छोटी-छोटी बातों को पिरोने की कोशिश की है। मुझे पता नहीं कि आपकी ज़िन्दगी में कौनसा दौर चल रहा है पर मैं उम्मीद करता हूं कि इन कहानियों को पढ़ने के बाद आप ऐसी बातों की डोर पकड़े हर दौर में अपने दिल को दिलासा देंगे। हास्य, निराशा, हार-जीत, डार्क, उम्मीद, उम्र, सबक के फ्लेवर हैं। अगर कोई फ्लेवर जुबां को पसंद न आए तो परेशान न हों, शायद एक-दो पन्नों बाद आपकी पसंद का स्वाद आ जाये "
लेखक : Mohit Sharma
पब्लिशर : FlyDreams Publications
Motion poster : BookBabu

Monday, December 25, 2017

विचारों पर विचार...


कहानी लिखते समय कभी-कभी एक दुविधा का सामना करना पड़ता है। एक विचार को आधार बनाकर एक कहानी (या लेख) गढ़ी गयी। उस विचार से बहुत से अन्य बातें, विचार, उदाहरण और निष्कर्ष जुड़े होते हैं। अब लेखक के पास दो विकल्प हैं या तो केवल उस मूल विचार को उभार कर कहानी लिख दे या फिर उस विचार के साथ बढ़ती बातों को उस कहानी में शामिल करे। विचार को मुख्य आकर्षण की तरह प्रस्तुत करने में ये संशय नहीं रहता कि पाठक का ध्यान उस विचार पर नहीं जाएगा। साथ ही पाठक को कुछ नयेपन का अनुभव होता है। इसका मतलब ये नहीं कि मूल विचार से अलग कुछ लिखा ही ना जाए। ये कुछ वैसा ही है जैसे दवाओं या रसायनों को जलमिश्रित (डायल्यूट) कर उनका सही अनुपात बनाया जाता है। विचार को घटनाओं एवम किरदारों से इतना डायल्यूट किया जाए कि उसका प्रभाव बना रहे और वो अधपका ना लगे। 

कथा में पूरा ध्यान आईडिया पर होने का एक घाटा यह है कि पाठक को उस रचना में अधूरापन लग सकता है। उन्हें प्रभावी विचार वाली कहानी पढ़कर ये लग सकता है कि इस कहानी में और बहुत कुछ होना चाहिए था। कहानी की घटनाएं और पात्र एक औपचारिकता से लग सकते हैं। वहीं अधिक डायल्यूट होने पर घटनाओं, किरदारों की अन्य बातों में विचार कहीं घुल सा जाता है। कभी-कभार तो पाठक का रडार विचार को पकड़ ही नहीं पाता। कुछ अपवाद में ऐसा इच्छित हो सकता है पर अधिकतर कहानी को 'कहानी' बनाने में उसका आधार गुम हो जाता है। 

विचारों से कथा या लेख बनाने के इन प्रयोगों में कभी मैं आईडिया को प्राथमिकता देता हूँ तो कभी अन्य घटकों से मिश्रित कहानी को लिखता हूँ। स्थिति अनुसार दोनों तरीके आज़माते रहना चाहिए। अगर किसी विचार में काफी सम्भावना दिखे तो उसपर दोनों तरीकों से लिखना चाहिए। वैसे एक बार किसी विचार पर कुछ लिखने के बाद तुरंत ही दोबारा (चाहे अलग तरीके से सही) उसपर लिखने का मन नहीं करता...अगर ऐसा कुछ है, तो भी उस आईडिया को आगे के लिए बचा कर रख लें। बाद में कभी जब मन करे तब अन्य तरीके से लिखने का प्रयास करें।
==========
Art - Anastasia Glushkova
#ज़हन

Tuesday, December 12, 2017

सामाजिक समस्याओं में अंतर (लेख)

Art - Mari Bobghiashvili‎
समस्या जीवन का अभिन्न अंग है। कुछ पाना है, कुछ करना है...सांस तक लेते रहना है तो भी कोई ना कोई समस्या मुँह बाये तैयार रहती है। हाँ, वीडियो गेम के लेवल की तरह कोई समस्या आसानी से निपट जाती है और कोई समस्या कितने ही संसाधन और समय व्यर्थ करवाती है। कुछ बड़ी समस्याएं जटिल होती हैं और सामाजिक परतों में अंदर तक फैली होती हैं। इन समस्याओं में ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपराध, भेदभाव, बाल शोषण, अशिक्षा, ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण आदि शामिल हैं। बचपन से इन समस्याओं के बारे में पढ़ाया जाता है और हर रोज़ इनसे जुड़े पहलुओं पर दुनियाभर में ख़बरें, वार्ता होती रहती हैं। एक समय बाद समाज इन समस्याओं का इतना अभ्यस्त हो जाता है कि अगर कोई बड़ी खबर ना हो तो इनकी तरफ ध्यान नहीं जाता। ये बातें सामने होकर भी अनदेखी सी होने लगती हैं। सरकार और लोगो की जागरूकता से स्थिति बेहतर हो सकती है पर पूरी तरह ठीक होना असंभव है। वहीं दूसरी तरफ कुछ मुद्दे छोटे स्तर, छोटे क्षेत्र-लोगों और कम समय वाले होते हैं। 

कुछ नये को सामान्य से बहुत अधिक प्रतिक्रिया मिलती है इसलिए आम जनता और सभी तरह का मीडिया 1 दिन, 2 दिन या कुछ हफ़्तों तक उस खबर को प्राथमिकता से देखते-दिखाते हैं। इसी क्रम में कभी-कभार किसी घटना पर जनता के बड़े हिस्से की नकारात्मक प्रतिक्रिया आती है और देश-दुनियाभर में प्रदर्शन, मांगें, विरोध और यहाँ तक की हिंसा भी हो जाती है। किसी के लिए छोटी सी बात किसी अन्य समूह के लिए उनकी पहचान पर सवाल या अपमान की तरह देखी जाती है। अगर ध्यान दें तो ये "छोटी" बातें उन बड़े मुद्दों का ही वेरिएशन होती हैं जो हम अनदेखा कर देते हैं। ये कुछ ऐसा है जैसे किसी फिल्म की थीम प्रेम कहानी, एक्शन, एनिमेशन या यात्रा वृतांत हो सकती है पर दर्शक उस फिल्म को इन थीम के वेरिएशन के लिए देखने जाते हैं यानी इस प्रेम कहानी में क्या नया हुआ, नयी कलाकार मण्डली कैसे साथ आयी। नयी चीज़ का "नॉवल्टी" होना कुछ समय के लिए जिज्ञासा जगाता है और जब लोग बात से ऊब जाते हैं तो उसकी जगह ताज़ी बातें ले लेती हैं। 

ऊपर समझाया गया संदर्भ बिना जाने, एक बात लोग अक्सर कहते हैं कि देश में जघन्य अपराध, ग़रीबी जैसे मुद्दों पर तो कुछ नहीं होता! उनपर किसी को कोई धरना, विरोध प्रदर्शन आदि नहीं करते नहीं देखा...पर देखो इन नासमझ लोगों को जो छोटी बात या ज़रा से स्थानीय मुद्दे पर तिल का ताड़ बना रहे हैं। पहली बात, बिना उस पक्ष की पूरी बात जाने एकतरफा नरेटिव पर कभी प्रतिक्रिया ना दें। मानव के सामने चुनौती रहे हज़ारों-लाखों वर्षों वाले मुद्दों की तुलना 4-6 दिन की अस्थाई बात से ना करें। ये एक दुखद सच्चाई है कि अन्याय, बुराई कम किये जा सकते हैं पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सकते। कितनी आसानी से कह दिया "कोई कुछ नहीं करता!" जिन बड़ी समस्याओं की आप बात कर रहे हैं देश-दुनिया में अनगिनत स्कूलों, विश्वविद्यालयों में उनपर अलग से सर्टिफिकेट, डिग्री पाठ्यक्रम तक पढ़ाये जाते हैं। रोज़ जगह-जगह हज़ारों जागरूकता एवम मदद प्रोग्राम, सेमिनार, कैंपेन आयोजित किये जाते हैं। कितने ही सरकारी विभाग, निजी संस्थाएं उन समस्याओं पर अनुसंधान और उनके निवारण (उन्हें कम करना बेहतर शब्द होगा) के लिए मौजूद हैं। हाँ, मैं मानता हूँ कि लोगों को और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है, साथ ही विभागों, संस्थाओं की कार्यप्रणाली और कार्यान्वयन को बेहतर किया जा सकता है पर ऐसी फ़िल्मी डायलॉगबाज़ी से बचें कि कोई कुछ नहीं करता। कोई नहीं बल्कि करोड़ों लोग करते हैं इसलिए सामान्य बात नज़रों में आते हुए भी बच जाती है। वो करोड़ों लोग इस सामान्य से काम को करना छोड़ दें तो दुनिया की बैंड बज जायेगी। इस वजह से जेनेरिक (व्यापक) समस्याओं को स्पेसिफिक (छोटी पर नयापन लिए अलग) घटनाओं के बराबर रखना जायज़ नहीं है। समाज सेवा के अनेकों अवसर ठीक आपके सामने होंगे, कोसने के अलावा उन अवसरों को चुनने की हिम्मत भी रखें। 

========
#ज़हन 

पहचान की कमान (लेख)


अपनी पहचान पर दाग ना पड़े इसके लिए लोग क्या कुछ नहीं करते! अब सोचें कितने ही देश, विचारधारा, धर्म, प्रदेश बहुत विस्तृत और स्वयं में एक संसार समेटे हुए हैं वो क्या-क्या करते होंगे? चेहरा बचाने की कुछ कोशिशें और थोड़ी बहुत सेंसरशिप झेली जा सकती है। समस्या तब आती है जब एक पहचान से जुड़े लोगों को बचपन से सिखाया जाये कि उनकी पहचान कभी ग़लत हो ही नहीं सकती और वो दुनिया में सबसे बेहतर हैं। इस सोच को मन में बैठाने के लिए हास्यास्पद कहानियां, स्टंट से लेकर किसी भी विरोधाभासी आवाज़ का दमन करना अब आम बात है। आपके जीने का तरीका आपको सर्वश्रेष्ठ इसलिए लगता है क्योंकि आप उसके अभ्यस्त हो चुके हैं ना कि वो वाकई सर्वश्रेष्ठ है। हाँ, अगर मान लें जीने के तरीके में 50 बातें हों तो संभव है आपके कुछ घटक बेहतर हों पर ये मानना की 50 में से 50 ही सही हैं तो आपको बाकी दुनिया के तौर तरीके देखने की आवश्यकता है। 

विचारधारा को ज़बरदस्ती बेहतर दिखाना कुछ ऐसा लगता है जैसे कोई 50-55 वर्षीय महिला या पुरुष मेकअप, सर्जरी आदि जतन से 25 की लगने की कोशिश करें। इस तरह वो अपने मन को दिलासा तो दे देते हैं क्योंकि उन्होंने पैसा खर्च किया है और बदलाव देखा है। वहीं उनसे अनजान व्यक्ति उन्हें 25 वर्ष का नहीं बतायेगा। अपनी सोच अनुसार कोई 40 वर्ष बोल देगा तो कोई 45 वर्ष। क्या मिला? संसार की सहमति की लीज़ बढ़ गयी कुछ और वर्षों के लिए....बस? सच्चाई तो सात-आठ सालों में फ़िर मुँह उठा लेगी। कमियों को छुपाने से वो फफूंद की तरह बढ़ती हैं क्योंकि मन को झूठा दिलासा रहता है कि कमी तो है ही नहीं तो इलाज कैसा? जबकि कमी को मानकर एक तरह से हम खामियों को अपना लेते हैं। अपनायी हुई कमियां आँखों के सामने रहती हैं जिस से उनके इलाज की सम्भावना अधिक हो जाती है। इसका मतलब ये नहीं कि अबतक जिया जीवन कमतर था बल्कि जो पहचान थी वो अब और बेहतर हो गयी। गलतियां मानना वो भी बड़ी विचारधारा, देश आदि के लिए काफी हिम्मत की बात है और दुर्भाग्य से ऐसी हिम्मत ना के बराबर देखने को मिलती हैं। सीखी हुई मान्यताओं के लिए संघर्ष करना अच्छा है पर कभी-कभी मान्यताओं से आंतरिक संघर्ष और भी अच्छी बात है। एवोल्यूशन केवल प्रकृति के भरोसे ना छोड़ें क्योंकि संभव है आगे बदले समीकरण, प्रकृति आपके लिए कोई विकल्प ना छोड़ें। 
=========
Art - Caroline B.

Friday, December 8, 2017

Ishq Baklol (Hindi Novel) Review


"इश्क़ बकलोल", नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि खुद में एक बड़ा बाज़ार बन चुकी फूहड़ता का फायदा उठाने को एक पुस्तक और लिख दी गयी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसी रोलरकॉस्टर राइड सी भारतीय परिवेश में भावनाओं की गुत्थमगुत्था है इश्क़ बकलोल। 2012 में देवेन पाण्डेय जी ने अपने अनुभवों, इनके साथ घटी बातों पर लिखना शुरू किया तब लगा कि कई शौकिया लेखकों की तरह ये कुछ समय बाद लेखन को टाटा कर देंगे। नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां संभालते हुए इन्होने लेखन जारी रखा और कम समय में काफी सुधार किया। एक दिन इनका मैसेज आया कि इन्होने एक उपन्यास लिखा है और मैं उपन्यास की इंट्रो पोएम लिखूं। उपन्यास का संक्षिप्त आईडिया जो सुना उसके अनुसार एक नज़्म भेज दी। सूरज पॉकेट बुक्स के सौजन्य से इश्क़ बकलोल अब बाजार में उपलब्ध है, जिसकी अच्छी बिक्री हो रही है। 

कवर पेज इंटरनेट से किसी स्टॉक तस्वीर को ना लेकर आकर्षक चित्रांकन रखा गया। सूरज पॉकेट बुक्स की ये पहल मुझे बढ़िया लगी। कहानी के विस्तार में ना जाकर इतना कहूँगा कि इसे रोमांटिक के बजाय एक सामाजिक उपन्यास कहना उचित होगा। भारतीय समाज के अंदर बसी विविधता को बड़ी सुंदरता से दर्शाया है। जीवन की घटनाओं - दुर्घटनाओं के बीच किस तरह हम बिना सोचे कितना कुछ कर जाते हैं (या असमंजस में कुछ नहीं करते) जिनके दूरगामी परिणाम जीवन की दिशा बदल देते हैं। कहानी के दौरान पात्रों की प्रवृत्ति -नज़रिये में आये बदलाव अच्छे लगे। अक्सर ज़बरदस्ती करैक्टर आर्क दिखाने के चक्कर में घटक जोड़ दिए जाते हैं वो यहाँ नहीं हुआ। मनोरंजन की दुनिया में मार्केटिंग जुमला बन चुके फ़र्जी देसीपन की जगह यहाँ किरदारों में असली देसीपन पढ़ने को मिला। कुछ जगह भाषा शैली, कथा के प्रवाह और दृश्य परिवर्तन में सुधार की सम्भावना है, जिसे पहले प्रयास के हिसाब से अनदेखा किया जा सकता है। ये देवेन जी का स्नेह है कि कहानी में एक किरदार मेरा भी है। मुझे पता चला कि मेरा किरदार बड़ा था पर कहानी के लिए उसे छोटा करना पड़ा (इस कारण रेटिंग में आधा अंक काट लेता हूँ....हाहा)। आशा है आगामी उपन्यास और भी धमाकेदार हो। शुभकामनाएं!

उपन्यास के संसार में देवेन पाण्डेय के पदार्पण को मैं रेट करता हूँ - 7.5/10

P.S. मुझे नहीं पता कि मैं रात के डेढ़ बजे अपनी रसोई में धूप का चश्मा लगाकर सेल्फी क्यों ले रहा हूँ।

Wednesday, November 22, 2017

ग्राहक ज़रा बचके (लेख)


सामान, सेवा बेचने वाले व्यापारियों की एक श्रेणी अधिक पैसा कमाने के लिए कई ग़लत तरीके आज़माती है। आज उनमे से एक तरीके पर बात करते हैं। हर व्यक्ति के लिए अपनी पहचान, अहं का कुछ मोल होता है। जैसे अगर आप किसी बड़े होटल में खाना खा रहे हों तो आप अपने घर जैसे इत्मीनान, मौज से नहीं खायेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि आप वहाँ भोजन कर रहे अन्य लोगो के सामने शालीन बने रहने चाहते हैं। हालांकि, उनमे कोई आपको जानता नहीं और शायद आगे कभी जीवन में सामने भी ना आये पर फिर भी असहज ना लगे और इस आधे-एक घंटे अपनी अच्छी छवि बनी रहे इसलिए थोड़ा एडजस्ट करना चलता है। ये जो ईगो-इमेज वाली असहजता है कुछ दुकानदार इसका फायदा उठाते हैं। मान लीजिये आपको एक ख़ास तरह का टूथपेस्ट पसंद है जो आस-पास नहीं मिलता। जब तक आपका उस टूथपेस्ट लेने वाली जगह जाना नहीं होता तब तक काम चलाने के लिए आप कोई और टूथपेस्ट लेने जाते हो। अब वो दुकानदार आपको 150 रुपये का टूथपेस्ट उठाकर दे देता है। आप सोचते हो कि मेरे वाला प्रोडक्ट जल्द लेना ही है तो क्यों ना छोटा, सस्ता टूथपेस्ट ले लूँ। झिझक के साथ आप मना करने को बड़बड़ाते हो तो दुकानदार झूठी हँसी, या तंज भरे स्वर में 'भोला' सवाल करता है कि अन्य ग्राहक, दुकानकर्मियों का ध्यान आप दोनों पर जाता है। 

अब "ज़रा सी बात" पर आपको ताकते लोगो के सामने झेंपकर आप कहते हो कि "लाओ ये ही दे दो!" या फिर आप मन ही मन दुकानदार की ट्रिक समझ उसे कोसते हुए कहीं और से टूथपेस्ट खरीदने निकल जाते हो। अधिकतर पहली स्थिति होती है इसलिए दुकानदार ये रिस्क ले लेता है। थोड़ा वह आपके हावभाव, आदत के अनुसार अपनी बात रखता है। केवल कुछ अधिक बेचने में ही नहीं उत्पाद से सम्बंधित ग्राहक के सवालों को ख़त्म करने के लिए भी "ये बचकाने सवाल हैं" की हँसी या बर्ताव का स्वांग करता है। 

तीसरा और दुर्लभ तरीका है दुकानदार पर पलटवार - "घर में फलाना (काफी महँगे) टूथपेस्ट के बॉक्स पड़े हैं। वो तो ख़ास डीलर पर मिलता है आपके यहाँ होगा नहीं तो सोचा एक बार के इस्तेमाल के लिए फलाना छोटा साइज ले लूँ...टीवी पर इसके बड़े एड देखे हैं। ये बड़ा साइज जो आप दे रहे हो ये तो पड़ा-पड़ा ख़राब होगा! है क्या आपके पास फलाना प्रोडक्ट? (तंज वाली हँसी जोड़ें)" यह बस एक उदाहरण भर है। स्थिति अनुसार ऐसे जवाब देने और व्यापारी को इस तरह फायदा ना देने के लिए हमेशा तैयार रहें। 
===========
#ज़हन

Monday, November 13, 2017

केस स्टडी: बदलते दौर में ढलता स्टारडम


इंटरनेट (अंतरजाल) जो पहले मिलने-जुलने, कोडिंग, हल्के मनोरंजन और जानकारी का साधन था वो धीरे-धीरे दुनियाभर के कलाकारों के लिए एक अथाह मंच बन गया। हालाँकि, इस मंच में कई कमियाँ हैं पर फिर भी इसका लाभ करोड़ों लोगो को मिला है। आज अंतरजाल की दुनिया से एक रोचक केस अध्ययन। इंटरनेट सर्फ करते हुए श्रद्धा शर्मा के यूट्यूब चैनल पर जाना हुआ। अप्रैल 2011, 15 साल की उम्र में इस लड़की ने बॉलीवुड गानों के कवर यूट्यूब पर डालने शुरू किये जो उस समय भारत में अनसुनी तो नहीं पर एक नयी बात थी। कुछ समय बाद श्रद्धा के गाये चौथे अपलोड "हाल ए दिल" गाने के कवर को कम समय में 10 लाख से अधिक व्यूज़ मिले और रातों-रात श्रद्धा का नाम हो गया। स्थानीय , राष्ट्रीय अखबारों-पत्रिकाओं ने उसपर सुर्खियाँ बनायीं, कई कॉलेज फेस्ट से न्यौते आने लगे। जहाँ उसके प्रशंसकों की कमी नहीं थी वहीं आलोचक भी बढ़ रहे थे। जिनका मत था कि श्रद्धा टैलेंट के बदले नोवेल्टी के कारण चल रही है, नहीं तो लाखों भारतीय गायक-गायिकाएँ जो यूट्यूब पर नहीं हैं या जिन्हे एडिटिंग आदि का ज्ञान नहीं है इस प्रसिद्ध गायिका से कहीं बेहतर हैं। उसके बाद 2013-14 की खबर थी कि श्रद्धा की डेब्यू एल्बम आ रही है जिसका निर्माण और संगीत निर्देशन लेस्ली लुईस कर रहे हैं। 2014 में एल्बम आने के बाद से श्रद्धा शर्मा के कुछ वेब विज्ञापन, कोलैबोरेशन आये पर कोई बड़ी अपडेट नहीं मिली। 

हैरानी की बात यह है कि अब 6-7 वर्ष बाद श्रद्धा के यूट्यूब चैनल के सब्सक्राइबर्स 2 लाख 34 हज़ार हैं यानी शुरुआती बूम के बाद बहुत कम लोग श्रद्धा के चैनल से जुड़े। उस दौर में जो बड़ी बात थी अब हज़ारों भारतीय चैनल्स, तरह-तरह के कलाकारों को श्रद्धा की तुलना में कहीं अधिक प्रशंसक और प्रतिक्रिया मिलती हैं। कभी अग्रिम पंक्ति में खड़ी श्रद्धा कंटेंट क्रिएटर्स की भीड़ में कहीं गुम सी हो गयी। ऐसा क्यों हुआ? इसपर कुछ बातें -

*) - जहाँ इंटरनेट ने सबको मंच दिया वहीं बढ़ती प्रतिभावान भीड़ के साथ प्रतिस्पर्धा का स्तर भी बढ़ गया है। जो बातें आज से कुछ वर्ष पहले चल जाती थी उनका आज के परिवेश में हिट होना काफी मुश्किल है। हर क्षेत्र में गिने चुने लोग ही चोटी पर बने रह सकते हैं। उनके अलावा आम जनता का ध्यान उस क्षेत्र में सक्रीय अन्य कलाकारों पर कम जाता है। एक शैली अगर लोग पसंद करेंगे तो कुछ ही दिनों में उस से ऊबकर कंटेंट क्रियेटर से कुछ नया करने की मांग करेंगे। अगर कलाकार कुछ नया नहीं कर पाता तो लोग अन्य विकल्पों की तरफ बढ़ जाते हैं। 

*) - अगर आर्टिस्ट के काम में मौलिकता की कमी हो और वह अधिकांश अन्य कलाकारों के काम को आधार बनाकर कुछ करता हो तो एक समय बाद उसका काम आकर्षण खोने लगता है। ऐसे में अगर उसके मौलिक काम का स्तर औसत या उस से नीचे हो तो ना सिर्फ उसके प्रशंसक बल्कि वह खुद अपने आप में विश्वास खोने लगता है। अगर ऐसा हो रहा है तो उसे अपनी कमियों को पहचान कर उनपर काम शुरू कर देना चाहिए और ऐसे तरीकों पर काम करना चाहिए जिनका पालन कर उसके मौलिक काम का स्तर स्वीकार्य स्तर तक आ सके। 

*) - एक महत्वपूर्ण बात ये है कि किसी व्यक्ति के लिए सफलता और उस स्तर पर बने रहने का मोल क्या है? अगर जीवन में सफलता जल्दी मिल जाये तो उसका मोल आसान लगने लगता है जबकि बड़े स्तर पर बने रहने के लिए निरंतर पापड़ बेलते रहने पड़ते हैं। थोड़ा बहुत आलस्य या ब्रेक अपनी जगह ठीक है पर मेहनत के विकल्प या काल्पनिक दिलासे ढूँढ लेने से आप एक भूला-बिसरा नाम बनकर रह जाते हैं। 

*) - जगह और माहौल बदलने के बाद आर्टिस्ट को अपने क्षेत्र से जुड़े कई घटक पता चलते हैं। उसे लगता है कि अभी कुछ बनाने से पहले कितना कुछ सीखना बाकी है। इस कारण जिस खुलेपन से कलाकार पहले काम करता था वो बरक़रार नहीं रहता। लोगों के साथ-साथ उसकी खुद की अपेक्षा होती है कि हर बार वह पहले से बेहतर करे और अगर किसी वजह से ऐसा नहीं हो पाता तो वह अपने सीमित दायरे में बँध जाता है। इस घेरे से निकलने के लिए ज़रूरी है कि धीमी ही सही पर कुछ रचनात्मक गति बनी रहे, प्रयोग होते रहें। 

भविष्य में क्या होगा ये कहा नहीं जा सकता पर अगर श्रद्धा गायन की अन्य विधाओं, शैलियों को सीखकर नये प्रयोग करें तो स्थिति में काफी सुधार हो सकता है। आशा है ऐसा ही हो!
=========
#ज़हन

Wednesday, September 6, 2017

New Hindi Quotes #मोहित_शर्मा_ज़हन


*) - अपने अनुभव, प्रतिभा और जो भी जीवन में अर्जित किया उसका मोल समझें पर आत्ममुग्धता से बचें। सामने वाले व्यक्ति को परसों पैदा हुआ ना मानें। 

*) - निष्पक्ष होना दुनिया की सबसे कठिन कला है। 

*) - किसी की सहनशीलता को उसकी कमज़ोरी मत समझें। इलास्टिक को इतना खींचने की आदत ना डालें कि वो ऐसी घड़ी में टूटे जब आपको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत हो। 

*) - इतिहास कभी एक नहीं होता। इतिहास नदी की धाराओं सा इधर-उधर बह जाता है और लोग अपनी विचारधारा के हिसाब से उन धाराओं को पकड़ कर अपना-अपना इतिहास चुन लेते हैं। जो मानना है मानो पर मानने से पहले सारी धाराओं का पानी ज़रूर पीकर देखना....जिस पानी की आदत नहीं उसे पीकर शायद तबियत बिगड़ जाए पर दिमाग सही हो जाएगा। 

*) - सुरक्षित राह पर जीवन को तीन से पौने चार बनाने में बाल सफ़ेद हो जाते हैं और कोई दांव लगाकर तीन से तेईस हो जाता है। अब पौने चार से शून्य दूर होता है या  तेईस?

*) - सही, सकारात्मक और बिना किसी विचारधारा के प्रभाव में आकर किये गए सामाजिक अनुकूलन से समाज की अनेकों कुरीतियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

*) - अक्सर भूल जाने लायक छोटी जीतों के गुमान में लोग याद रखने लायक बड़ी बाज़ी हार जाते हैं। 

*) - कला के क्षेत्र में केवल यह सोचकर खुद को रोक लेना सही नहीं कि ऐसा पहले हो चुका होगा। शायद हो चुका हो....पर आपके नज़रिये और अंदाज़ से तो नहीं हुआ ना!
============
#mohitness #ज़हन ##mohit_trendster

Thursday, April 13, 2017

सिर्फ मर्सिडीज़ ही चाहिए? (लेख) #मोहितपन


जब से लेखन, कला, कॉमिक्स कम्युनिटीज़ में सक्रीय हूँ तो ऑनलाइन और असल जीवन में कई लेखकों, कलाकारों से मिलने का मौका मिला है। एक बात जो मैं नये रचनाकारों को अक्सर समझाता हूँ वो आज इस लेख में साझा कर रहा हूँ।

3-4 साल पहले एक युवा कवि/लेखक ने मेरे ब्लॉग्स पढ़कर मुझसे संपर्क किया और हम ऑनलाइन मित्र बन गये। कुछ समय तक उनके काव्य, कहानियां पढ़ने को मिली फिर वो गायब से हो गये। वो अकेले ऐसे उदाहरण नहीं हैं, पिछले 11 वर्षों में कई प्रतिभावान लेखक, कलाकार यूँ नज़र से ओझल हुए। निराशा होती है कि एक अच्छे कलाकार को पता नहीं क्या बात लील गयी....कहने को तो व्यक्ति के वश से बाहर जीवन में कई बातें उसे रचनात्मक पथ से दूर धकेल सकती हैं पर एक कारक है जिसके चलते कई हार मान चुके कलाकार अपना क्षेत्र छोड़ देते हैं। एक लेखक का उदाहरण देकर समझाता हूँ। मान लीजिए नये लेखक को ऑनलाइन मैगज़ीन के लिए लिखने का मौका मिला, उसने मना कर दिया। मैगज़ीन पेज पर 700 फॉलोवर और प्रति संस्करण 450 डाउनलोड वाली ऑनलाइन पत्रिका पर वह अपना समय और एक आईडिया क्यों बर्बाद करे? इस क्रम में लेखक ने कई वेबसाइट को ठेंगा दिखाया कि वो उसके स्तर की नहीं। चलो सही है, थोड़े समय बाद उसे एक स्थानीय प्रिंट मैगज़ीन या अखबार में कुछ भेजने को कहा गया फिर उसने समझाया - जो प्रकाशन 2-3 शहरों तक सीमित हो उसमे छपना भी क्या छपना। पब्लिश हो तो इस तरह कि दुनिया हिल जाए! हम्म.... कुछ अंतराल बाद इनके किसी मित्र को लेखन अच्छा लगा तो अपनी शार्ट फिल्म के लिए स्क्रिप्ट की बात करने आया। जवाब फिर से ना और मन में ("अबे हट! ऐसे वेल्ले लोगो की फिल्म थोड़े ही लिखूंगा, सीधा चेतन भगत की तरह एंट्री मारूंगा।") और इस तरह मौके आते गये-जाते गये। अब ऐसे लेखक, कवि और कलाकार एक समय बाद भाग्य को दोष देकर हार मान लेते हैं और इनकी ऑनलाइन गिनी चुनी रचना पड़ी मिलती हैं और इनके मेल ड्राफ्ट्स में डेढ़-दो सौ आईडिया सेव होते हैं जो कभी दुनिया के सामने नहीं आते क्योकि इन्हे एक खुशफ़हमी होती है कि ये जन्मजात आम दुनिया से ऊपर पैदा हुए हैं तो आम दुनिया जैसी मज़दूरी किये बिना ये डायरेक्ट सलमान खान, ऋतिक रोशन के लिए फिल्म लिखेंगे या 90 के दशक के वेद प्रकाश शर्मा जी की तरह एक के बाद एक बेस्टसेलर किताबें बेचेंगे। मतलब खरीदेंगे तो सीधा मर्सिडीज़ बीच में साइकिल, बाइक, मारुती 800, वैगन आर, हौंडा सिटी लेने का मौका मिलेगा भी तो भाड़ में जाए....ऐसा नहीं करेंगे तो बादशाह सलामत की शान में गुस्ताखी हो जायेगी ना!

अरे! स्टेटस या अहं की बात बनाने के बजाए ऐसे छोटे मौकों को आगे मिलने वाले बड़े अवसरों के पायदान और अभ्यास की तरह लीजिए। अगर आप वाकई अपने जुनून के लिए कुछ रचनात्मक कर रहे हैं तो इन बातों का असर तो वैसे भी नहीं पड़ना चाहिए। मंज़िल के साथ-साथ यह ध्यान रखें कि आप सफर में धीमे ही सही पर आगे बढ़ रहे हैं या नहीं। आप कलात्मक क्षेत्र में जिन्हे भी अपना आदर्श मानते हैं उनकी जीवनी खंगालें, लगभग सभी का सफर ऐसे छोटे अवसरों से मिले धक्के से बड़े लक्ष्य तक पहुँचा मिलेगा। हाँ, अपनी प्राथमिकताएं सही रखें, ऐसा ना हो कि सामने कोई बड़ा अवसर मिले और आप किसी बेमतलब की चीज़ में प्रोक्रैसटीनेट कर रहे हों। संतुलन बिगड़ने मत दीजिये और खुद पर विश्वास बनाये रखें। गुड लक!

#ज़हन

Wednesday, February 22, 2017

Anik Planet #04 Magazine Update


...Wrote an article "Pyaar se Parhez" (Superheroes and their complicated love life) for Anik Planet #04 (February 2017 Issue), Publisher: Comics Our Passion Community


=============


#Backcover remark on horror novella Woh Bhayanak Raat by Mithilesh Gupta.

Friday, October 7, 2016

इंडी आर्टिस्ट का मतलब क्या है? - मोहित शर्मा ज़हन

Art - Thomas Lepine


किसी रचनात्मक क्षेत्र में किये गए स्वतंत्र काम को इंडी (Indie/Indy) यानी इंडिपेंडेंट रचना कहा जाता है। इंडी काम कई प्रकार और स्तर का हो सकता है, कभी न्यूनतम या बिना किसी निवेश के बनी रचना केवल कला के बल पर अनेक लोगो तक पहुंच सकती है और धन अर्जित कर सकती है, तो कभी कलाकार का काफी पैसा लगने के बाद भी असफल हो सकती है। किसी लेबल, कंपनी या प्रकाशक के ना होने के कारण इंडी रचनाओं में कलाकार पर उसके दिमाग में उपजे विचारों को बाजार के हिसाब से बदलने का दबाव कम हो जाता है। वहीं कभी-कभी अपनी मर्ज़ी चलने का घाटा यह होता है कि जनता कलाकार के विज़न को पूरी तरह समझ नही पाती। मुझे लगता है हर लेखक, कवि या कलाकार को इंडी चरण से गुज़ारना ही चाहिए, सीधे किसी बड़े लेबल से चिपकना भी अच्छा नहीं। अपनी कला के विकास के लिए तो स्वत्रंत रहकर अलग-अलग शैलियों, स्थितियों और अन्य कलाकारों के साथ प्रयोग करना बेहद आवश्यक है। ऐसा करने से व्यक्ति को पता चलता है कि उसे अपना समय किन बातों में देना चाहिए और किन बातों में उसकी मेहनत अधिक लगती है पर परिणाम कम आता है। जैसे लेखन में ही दर्जनों शैलियाँ हैं, कहने को तो लेखक सबमे लिख ले पर किनमें उसे सहजता है और किन शैलियों के संगम में वह कमाल करता है ये बातें धीरे-धीरे प्रयोग करते रहने से ही समझ आती है। कई मामलों में कम बजट वाली छोटी कंपनियों के लेबल के साथ प्रकाशित हुए काम को कम मुनाफे और पहुँच की वजह से इंडी श्रेणी में रखा जाता है। 

अब भाग्य के फेर से कुछ लोग इंडी चरण में कुछ समय के लिए नाम को आते हैं और सीधा बड़ा टिकेट पाते हैं। जबकि कई इक्का-दुक्का मौको को छोड़ कर जीवनभर इंडी रह जाते हैं। कला का स्तर और कीमत सामने खड़े व्यक्ति के नज़रिये पर निर्भर करता है, फिर भी अगर 100 में से 70 से अधिक लोग किसी चीज़ पर एक राय रखते हैं तो उसको एक मापदंड माना जा सकता है। मापदंड ये कि यह कलाकृतियां, रचनाएं क्या पैसा कमा पाएंगी या नहीं। यह सवाल कई कलाकारों को दुख देता है लेकिन इसका सामना सबको करना पड़ता है बशर्ते आपकी पैतृक संपत्ति भयंकर हो या आप मनमौजी कलाकार हो, जो एक के बाद एक रचना निर्माण में मगन रहता है। पैसा आये तो अच्छा, पैसा ना आये तो खाना तो मिल ही रहा है! मनमौजी कलाकारों को भगवान् तेज़ स्मृति देते हैं जो सारी की सारी वो अपने काम में लगा देते हैं। उन्हें आस-पास की दुनिया में हुए पिछले क्षण चाहे याद ना हों पर 11 वर्ष पहले अगर उन्होंने कोई आईडिया कहीं इस्तेमाल किया तो उसमे क्या दिमागी दांव-पेंच हुए और क्या परिणाम आया सब याद रहेगा। अक्सर पैसों और मार्गदर्शन के अभाव में कई आर्टिस्ट संघर्ष के शुरुआती वर्षों में ही कोई और राह चुन लेते हैं, फिर कुछ ऐसे हैं जो कला से संन्यास तो नहीं होते पर सेमी-रिटायर होकर कभी-कभार कुछ काम दिखा देते हैं। ये कलाकार अपने जैसे अन्य कलाकारों, लेखको को पसंद करते हैं पर अपने क्षेत्र और हरदम मस्तिष्क के रचनात्मक जाल में उलझे होने के कारण ढंग से प्रोत्साहित नहीं कर पाते हैं। स्वयं पर निर्भर होने के कारण सफलता मिलने में अधिक समय लगता है। जो लोग पैसे को प्राथमिकताओं में नही रखते उनके लिए रास्ता मुश्किल है। धन से आप अपनी रचनाओं की पहुंच परिवर्धित कर सकते हैं, पैसे के साथ आप सिर्फ अपनी कला पर ध्यान लगा सकते हैं, नही तो एक बार का दाल-पेट्रोल का भाव नापने में आपके 4 आईडिया सुसाइड कर लेंगे। अपने कलात्मक सफर के बीच-बीच में एक नज़र आर्थिक पहलुओं पर रखना फायदे का सौदा है। 

आप सभी से निवेदन है कि अपनी रूचि के विषयों में सक्रीय इंडी लेखको, कलाकारों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी जुटाएं, उस जानकारी के आधार पर उनकी रचना, किताबें, कलाकृतियां खरीदकर, खरीदने में सक्षम नही तो अन्य लोगो को बताकर इन कलाकारों के विकास में अपना सहयोग दें।

============

कॉमिक्स फैन फिक्शन लेखकों के लिए कुछ सुझाव - मोहित शर्मा ज़हन

Tuesday, July 19, 2016

टप...टप...टप...(हॉरर कहानी) #mohitness


चन्द्रप्रकाश को पानी बहने से चिढ थी और पानी बहना तो वो सह लेता था पर कहीं से धीमे-धीमे पानी का रिसना या नल से पानी टपकना...

टप...टप...टप...

जैसे हर टपकती बूँद उसके मस्तिष्क पर गहरे वार करती थी। जब तक चन्द्रप्रकाश पानी का टपकना बंद न कर देता तब तक वह किसी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता था। कभी भी 1 मिनट से ज़्यादा नहीं हुआ होगा जो वह पानी बहने पर दौड़कर नल बंद करे न गया हुआ। अगर कुछ ही सेकण्ड्स में कोई बात सिर में दर्द करने लगे तो किसी की भी प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी। 

टप...टप...टप...

एक छुट्टी के दिन वह घर में अकेला था और बाथरूम की टंकी बहने लगी। वह अपनी धुन में तुरंत उसे बंद कर आया। फिर एक-एक कर के घर के सभी नल बहते और वह खीज कर उन्हें बंद कर आता। एक-दो बार उसे भ्रम हुआ की बाथरूम में या बाहर के नल के पास उसने किसी परछाई को देखा पर मोबाइल पर व्यस्त उसने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।

टप...टप...टप...

लो हद ही हो गयी, अब रसोई का नल चलने लगा। चन्द्रप्रकाश के सिर में दर्द शुरू हो चुका था, उसने रसोई की टंकी कसकर बंद की और मुँह उठाया तो देखा दीवार से चिपकी चिथड़े हुए शरीर और सफ़ेद रक्तरहित चेहरे वाली लड़की उसको घूर रही है। डर के झटके से चन्द्रप्रकाश पीछे जाकर गिरा। लड़की ने हल्की मुस्कान के साथ नल थोड़ा सा घुमाया...

टप...टप...टप...

अब चन्द्रप्रकाश का दिमागी मीनिया और सामने दीवार पर लटकी लड़की का डर आपस में जूझने लगे। अपनी स्थिति में जड़ हाथ बढ़ाये वह खुद से ही संघर्ष कर रहा था। 

टप...टप...टप...

हर टपकती बूँद लावे की तरह सीधे उसके दिमाग पर पड रही थी। कुछ ही देर में उसका शरीर काफी ऊर्जा व्यय कर चुका था। 

टप...टप...टप...

किसी तरह घिसटते चन्द्रप्रकाश ने लड़की से नज़रें बचाते हुए टंकी बंद की और निढाल होकर गिर गया। अचानक लड़की गायब हो गयी, चन्द्रप्रकाश को लगा कि उसने अपने डर पर विजय पा ली लेकिन तभी पानी बहने की आवाज़ आने लगी और अत्यधिक मानसिक-शारीरिक दबाव में चन्द्रप्रकाश के दिमाग की नस फटने से उसकी मौत हो गयी। अपने जीवन के आखरी क्षणों में उसने जो पानी की आवाज़ सुनी वो बाहर शुरू हुई बारिश की थी पर कमज़ोरी के कारण उस आवाज़ में उसका दिमाग अंतर नहीं कर पाया। 
नल से पानी फिर टपकने लगा। 
टप...टप...टप...

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन