अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Monday, December 25, 2017

विचारों पर विचार...


कहानी लिखते समय कभी-कभी एक दुविधा का सामना करना पड़ता है। एक विचार को आधार बनाकर एक कहानी (या लेख) गढ़ी गयी। उस विचार से बहुत से अन्य बातें, विचार, उदाहरण और निष्कर्ष जुड़े होते हैं। अब लेखक के पास दो विकल्प हैं या तो केवल उस मूल विचार को उभार कर कहानी लिख दे या फिर उस विचार के साथ बढ़ती बातों को उस कहानी में शामिल करे। विचार को मुख्य आकर्षण की तरह प्रस्तुत करने में ये संशय नहीं रहता कि पाठक का ध्यान उस विचार पर नहीं जाएगा। साथ ही पाठक को कुछ नयेपन का अनुभव होता है। इसका मतलब ये नहीं कि मूल विचार से अलग कुछ लिखा ही ना जाए। ये कुछ वैसा ही है जैसे दवाओं या रसायनों को जलमिश्रित (डायल्यूट) कर उनका सही अनुपात बनाया जाता है। विचार को घटनाओं एवम किरदारों से इतना डायल्यूट किया जाए कि उसका प्रभाव बना रहे और वो अधपका ना लगे। 

कथा में पूरा ध्यान आईडिया पर होने का एक घाटा यह है कि पाठक को उस रचना में अधूरापन लग सकता है। उन्हें प्रभावी विचार वाली कहानी पढ़कर ये लग सकता है कि इस कहानी में और बहुत कुछ होना चाहिए था। कहानी की घटनाएं और पात्र एक औपचारिकता से लग सकते हैं। वहीं अधिक डायल्यूट होने पर घटनाओं, किरदारों की अन्य बातों में विचार कहीं घुल सा जाता है। कभी-कभार तो पाठक का रडार विचार को पकड़ ही नहीं पाता। कुछ अपवाद में ऐसा इच्छित हो सकता है पर अधिकतर कहानी को 'कहानी' बनाने में उसका आधार गुम हो जाता है। 

विचारों से कथा या लेख बनाने के इन प्रयोगों में कभी मैं आईडिया को प्राथमिकता देता हूँ तो कभी अन्य घटकों से मिश्रित कहानी को लिखता हूँ। स्थिति अनुसार दोनों तरीके आज़माते रहना चाहिए। अगर किसी विचार में काफी सम्भावना दिखे तो उसपर दोनों तरीकों से लिखना चाहिए। वैसे एक बार किसी विचार पर कुछ लिखने के बाद तुरंत ही दोबारा (चाहे अलग तरीके से सही) उसपर लिखने का मन नहीं करता...अगर ऐसा कुछ है, तो भी उस आईडिया को आगे के लिए बचा कर रख लें। बाद में कभी जब मन करे तब अन्य तरीके से लिखने का प्रयास करें।
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Art - Anastasia Glushkova
#ज़हन

Wednesday, November 22, 2017

ग्राहक ज़रा बचके (लेख)


सामान, सेवा बेचने वाले व्यापारियों की एक श्रेणी अधिक पैसा कमाने के लिए कई ग़लत तरीके आज़माती है। आज उनमे से एक तरीके पर बात करते हैं। हर व्यक्ति के लिए अपनी पहचान, अहं का कुछ मोल होता है। जैसे अगर आप किसी बड़े होटल में खाना खा रहे हों तो आप अपने घर जैसे इत्मीनान, मौज से नहीं खायेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि आप वहाँ भोजन कर रहे अन्य लोगो के सामने शालीन बने रहने चाहते हैं। हालांकि, उनमे कोई आपको जानता नहीं और शायद आगे कभी जीवन में सामने भी ना आये पर फिर भी असहज ना लगे और इस आधे-एक घंटे अपनी अच्छी छवि बनी रहे इसलिए थोड़ा एडजस्ट करना चलता है। ये जो ईगो-इमेज वाली असहजता है कुछ दुकानदार इसका फायदा उठाते हैं। मान लीजिये आपको एक ख़ास तरह का टूथपेस्ट पसंद है जो आस-पास नहीं मिलता। जब तक आपका उस टूथपेस्ट लेने वाली जगह जाना नहीं होता तब तक काम चलाने के लिए आप कोई और टूथपेस्ट लेने जाते हो। अब वो दुकानदार आपको 150 रुपये का टूथपेस्ट उठाकर दे देता है। आप सोचते हो कि मेरे वाला प्रोडक्ट जल्द लेना ही है तो क्यों ना छोटा, सस्ता टूथपेस्ट ले लूँ। झिझक के साथ आप मना करने को बड़बड़ाते हो तो दुकानदार झूठी हँसी, या तंज भरे स्वर में 'भोला' सवाल करता है कि अन्य ग्राहक, दुकानकर्मियों का ध्यान आप दोनों पर जाता है। 

अब "ज़रा सी बात" पर आपको ताकते लोगो के सामने झेंपकर आप कहते हो कि "लाओ ये ही दे दो!" या फिर आप मन ही मन दुकानदार की ट्रिक समझ उसे कोसते हुए कहीं और से टूथपेस्ट खरीदने निकल जाते हो। अधिकतर पहली स्थिति होती है इसलिए दुकानदार ये रिस्क ले लेता है। थोड़ा वह आपके हावभाव, आदत के अनुसार अपनी बात रखता है। केवल कुछ अधिक बेचने में ही नहीं उत्पाद से सम्बंधित ग्राहक के सवालों को ख़त्म करने के लिए भी "ये बचकाने सवाल हैं" की हँसी या बर्ताव का स्वांग करता है। 

तीसरा और दुर्लभ तरीका है दुकानदार पर पलटवार - "घर में फलाना (काफी महँगे) टूथपेस्ट के बॉक्स पड़े हैं। वो तो ख़ास डीलर पर मिलता है आपके यहाँ होगा नहीं तो सोचा एक बार के इस्तेमाल के लिए फलाना छोटा साइज ले लूँ...टीवी पर इसके बड़े एड देखे हैं। ये बड़ा साइज जो आप दे रहे हो ये तो पड़ा-पड़ा ख़राब होगा! है क्या आपके पास फलाना प्रोडक्ट? (तंज वाली हँसी जोड़ें)" यह बस एक उदाहरण भर है। स्थिति अनुसार ऐसे जवाब देने और व्यापारी को इस तरह फायदा ना देने के लिए हमेशा तैयार रहें। 
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#ज़हन

Monday, November 6, 2017

खौफ की खाल (नज़्म) #ज़हन - पगली प्रकृति कॉमिक


Poetry and artwork from Pagli Prakriti (Vacuumed Sanctity) Comic

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
...और नदी अपनों को बहा कर ले गयी!
बहानों के फसाने चल गये,
ज़मानों के ज़माने ढल गये...
रुक गये कुछ जड़ों के वास्ते,
बाकी शहर कमाने चल दिये। 

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
गुड़िया फ़िर भूखे पेट सो गयी...
समझाना कहाँ था मुश्किल, 
क्यों समीर को मान बैठे साहिल?
तिनकों को बिखरने दिया,
साये को बिछड़ने दिया?

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
रुदाली अपनी बोली कह गयी...
रौनक कहाँ खो गयी?
तानो को सह लिया,
बानो को बुन लिया। 
कमरे के कोने में खुस-पुस शिकवों को गिन लिया। 

खौफ की खाल उतार दो ना...
तानाशाहों के खेल बिगड़ दो ना!
शायद उतरी खाल देख दुनिया रंग बदले,
एक दुकान में गिरवी रखा हमारा सावन... 
शायद उस दुकान का निज़ाम बदले!
घिसटती ज़िन्दगी में जो ख्वाहिशें आधी रह गयीं,
कुछ पल जीकर उन्हें सुधार दो ना!
खौफ की खाल उतार दो ना...
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#mohitness #mohit_trendster #abhilash_panda #freelance_talents

Sunday, October 22, 2017

Updates

*) - Chosen as one of the top writer by Dawriter website. 
*) - My article about Sooraj Pocket Books and Novelist Shubhanand (Jagran Junction)
*) - Over 900 points now, Google Maps Local Guides Program
*) - DD Birthday Wish :)
*) – 6 new podcasts on lyrical comedy, noise pollution and art. – SoundCloud Profile
*) – Retired from MMO The Wrestling Game S3 World #39 (August 2017) 😦
*) – Kavya Comics series featured by Nazariya Now
*) – COP Exclusive Interview

Friday, October 13, 2017

ध्वनि प्रदूषण का घातक प्रभाव (Hindi Educational Podcast) #ज़हन

New Podcast (224 Seconds)
Also on Soundcloud and Vimeo
ध्वनि प्रदूषण के एक अनछुए पहलु से रूबरू करवाती रूबरू दुनिया की पहली ऑडियो पॉडकास्ट। जल्द ही रूबरू दुनिया एप पर आपको ऐसी कई पॉडकास्ट सुनने को मिलेंगी।
 - मोहित शर्मा ज़हन #mohitness #mohit_trendster

Friday, September 29, 2017

जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख) #ज़हन


कॉमिक्स लेखन में एक कहावत है, "विलेन भी अपनी नज़रों में हीरो होता है।" खलनायक अपनी छोटी भूल से लेकर जघन्य अपराधों तक का इतनी चपलता से स्पष्टीकरण देता है कि लगे उस स्थिति में सबसे ठीक विकल्प वही था। बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं? जवाब उस कॉमिक विलेन वाला है, 'अपनी पिक्चर में हर कोई नायक होता है।' दुनिया में ना कोई पूरी तरह अच्छा है और ना ही कोई बुराई का पुतला है। फिर भी खलनायक ढूँढने, बनाने की आदत हम सबके अंदर है। ये आदत कहाँ से जन्मी? शायद मानव मन को एक सांत्वना सी मिल जाती है और अपनी बुराइयों, कमियों से ध्यान हट जाता है। कभी-कभार परिवेश और घटनाओं के आधार पर किसी को डीमनाइज़ करना समझा जा सकता है पर जब यह आदत लोग अपने निजी जीवन के हर पहलु में लगाने लगें तो समस्याओं का जाल बन जाता है। 

*) - प्रकृति की कारस्तानी: नेचर का एक नियम होता है कि हर जैविक प्रजाति धरती पर हो रहे बदलाव के अनुसार खुद को ढालते हुए निश्चित विकास के साथ बढ़ती रहे। अब अगर सबसे विकसित दिमाग वाला प्राणी मनुष्य, बात बात पर अंतःकरण की आवाज़ सुनकर खुद पर सवाल करने लगेगा तो उस प्रजाति में अवसाद, हीन भावना आदि मानसिक समस्याओं का औसत काफी बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर मानव प्रजाति के विकास में बाधा आ सकती है। इस कारण से आम इंसान का ध्यान बँटाने के लिए प्रकृति ने उसमे ऐसा तंत्र फिट किया है कि वह दुनियाभर की बुराई को मैग्नीफाई करके खुद को दिलासा देता रहता है कि "मैं तो फिर भी बहुत ठीक हूँ बाकियों से।" इस सोच को बढ़ावा देने में मीडिया का बड़ा योगदान है जिसे किसी नैरेटिव और मसाले के लिए लगभग हर कहानी में किसी ना किसी को खलनायक बनाने का शौक है। 

*) - घटनाओं की नवीनता: ...यानी रीसेन्सी ऑफ़ इवेंट्स का मतलब किसी व्यक्ति द्वारा अपनी सुविधानुसार पास की घटनाओं के हिसाब से मन बनाना। वहीं पहले हुई घटनाएँ जो उसकी याददाश्त के कम्फर्ट जोन से बाहर हों उन्हें सोच में शामिल ना करना। यहाँ सुविधा सिर्फ कुछ याद रखने के दायरे में ही नहीं बल्कि अपने एजेंडे के हिसाब से घटनाओं को रखने और हटाने में भी है। अक्सर सोशल मीडिया पर किसी राजनैतिक बहस पर आप ऐसा देख सकते हैं। किसी असत्यापित खबर पर हम इसी अनुसार सही और गलत पक्ष का निर्णय सुना देते हैं। 

*) - निजी जीवन: बाहरी घटक तो एक बार के लिए फिर भी संभाले जा सकते हैं पर अगर कोई इंसान अपने जीवन में अहम् किरदार लिए लोगो को डीमनाइज़ करना शुरू कर दे तब वह अनजाने में अपना ही नुक्सान करने लगता है। उसके पेशे, रिश्तों पर इसका बुरा असर पड़ता है। बिना किसी ठोस आधार के अपनी कल्पनाओं के अम्बार को आग लगाकर हम अपने जीवन के रावणो को ढूँढ लेते हैं। समय के साथ ये आदत प्रबल हो जाती है पर इतनी प्रत्यक्ष होकर भी हमें दिखाई नहीं देती। 

पूछें खुद से ये सवाल - उसकी जगह मैं होता तो क्या करता? 
क्या कोई ऐसी बात तो नहीं जो मुझसे अनदेखी रह गयी? 
कहीं मैं मन में गढ़ी बातों को असल बातों में मिला तो नहीं रहा?
इस मसले पर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति की क्या राय होती?
मन के ध्यान बटाऊ टैक्टिस में फँसने के बजाय इन सवालों के ईमानदार जवाब कई मामलों में ग़लतफहमी दूर कर देंगे और शर्तिया 10 में से 8-9 बार आपकी कहानी में बिना बात कोई काल्पनिक खलनायक नहीं रहेगा। 
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Tuesday, August 1, 2017

खाना ठंडा हो रहा है...(काव्य) #ज़हन


साँसों का धुआं,
कोहरा घना,
अनजान फितरत में समां सना,
फिर भी मुस्काता सपना बुना,
हक़ीक़त में घुलता एक और अरमान खो रहा है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

तेरी बेफिक्री पर बेचैन करवटें मेरी,
बिस्तर की सलवटों में खुशबू तेरी,
डायन सी घूरे हर पल की देरी,
इंतज़ार में कबसे मुन्ना रो रहा है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

काश की आह नहीं उठेगी अक्सर, 
आईने में राही को दिख जाए रहबर,
कुछ आदतें बदल जाएं तो बेहतर,
दिल से लगी तस्वीरों पर वक़्त का असर हो रहा है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

बालों में हाथ फिरवाने का फिरदौस, 
झूठे ही रूठने का मेरा दोष,
ख्वाबों को बुनने में वक़्त लग गया,
उन सपनो के पकने का मौसम हो चला है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

तमाशा ना बनने पाए तो सहते रहोगे क्या?
नींद में शिकायतें कहते रहोगे क्या?
आज किसी 'ज़रूरी' बात को टाल जाना,
घर जैसे बहाने बाहर बना आना, 
आँखों को बताने तो आओ कि बाकी जहां सो रहा है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

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Thumbnail Artwork - Nadezhda Repina‎
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster
*Second poem in Matlabi Mela (Kavya Comic Series)

Saturday, July 29, 2017

सीमा समाप्त! (हिन्दी हॉरर कहानी) #ज़हन

रात के 3 बजे सरोर पुलिस थाने से सटे कमरे में सोते दीवान जी की किवाड़ ज़ोर से धड़धड़ाई। यकायक हुई तेज़ आवाज़ से दीवान जी उठ बैठे। उन्होंने तो जूनियर मुंशी को थाने पर किसी इमरजेंसी के लिए बैठाया था फिर ऐसा क्या हो गया जो उनकी ज़रुरत आन पड़ी? शायद कहीं रोड होल्डअप या डकैती पड़ गई। असल में 62 वर्ष और कागज़ पर साढ़े 59 साल की उम्र में रिटायरमेंट के करीब दीवान जी को किसी झंझट में पड़ना पसंद नहीं था इसलिए वो नौकरी में कम से कम जोखिम चाहते थे। आजकल लोग पुलिस पर केस भी बहुत करने लगे थे। उन्होंने मन बनाया कि अगर संभव होगा तो वो अपनी जगह जूनियर मुंशी को भेज देंगे। 

जब किवाड़ धड़-धड़ कर टूटने को हुई तो दीवान जी चिल्लाये। 

"अरे! रुको यार आ रहा हूँ। ऐसा कौनसा मंत्री मर गया यहाँ छोटे से सरोर में....वो भी आधी रात को?"

अँधेरे में दीवान जी को अपने थाना इंचार्ज दरोगा जी की झलक सी दिखी और उनके पीछे बनल थाने के इंचार्ज इंस्पेक्टर साहब थे, जिनके थाने की सीमा सरोर से मिलती थी। 

"ओह जय हिन्द साहब! किसी हमराह सिपाही को भेज दिया होता आपने। मैं वर्दी पहन कर अभी आया।"

मुँह-हाथ धोकर वर्दी पहनने में दीवान जी को 6-7 मिनट लगे, उन्हें अजीब लगा कि इस बीच थाने में बैठने के बजाए के बजाये दोनों अफसर उनके निवास के बाहर अँधेरे में खड़े रहे। 

इंस्पेक्टर साहब खरखराती आवाज़ में बोले - "हमारे साथ एक मौके पर चलना है।"

दोनों तेज़ कदमों से कुछ लंगड़ाते हुए से चलने लगे। आधी नींद से जगे दीवान जी को लगा कि या तो कोई पैसे की बात है या कहीं हाथ से निकली वारदात पर लिखा-पढ़ी कैसे की जाए इसलिए पूरे थाने में बिना किसी सिपाही को बुलाये सिर्फ उन्हें उठाया गया। जीप में दोनों अधिकारी आगे बैठ गए और दीवान जी पीछे आ गए। बैठने पर उन्हें एक व्यक्ति बंधा हुआ दिखा जिसके मुँह में कपडा ठूँसा हुआ था। उसे देखकर लगा किसी अपराधी का फर्जी एनकाउंटर होने वाला है। 

सीनियर अफसरों के सामने दीवान जी ने लिहाज़ में कुछ पूछना उचित नहीं समझा। बिजली की किल्लत वाले कसबे में अमावस की रात का अँधेरा ऊपर से जीप की जर्जर बैटरी से मोमबत्ती सी जलती हेडलाइट्स में कुछ देखना मुश्किल था। जीप तेज़ गति से बनल थाने की ओर बढ़ रही थी। बँधे हुए व्यक्ति को हिलते हुए देख इंचार्ज के सामने पॉइंट बनाने को आतुर दीवान जी बोले। 

"सर आपको तो ड्राइवर की ज़रुरत ही नहीं! एकदम एक्सपर्ट! और तू भाई नीचे पड़ा रह शान्ति से....अब हिलने उं-उं करने का क्या फायदा? जो पाप तूने किये होंगे साहब लोग उसी की सज़ा दे रहे हैं तुझे। मरने से पहले क्यों तकलीफ दे रहा है अपने-आप को?"

जीप दोनों थानों की सीमा पर एक सुनसान मोड़ पर आकर रुकी। 

दीवान जी ने कुछ नोटिस किया। 

"सर आप दोनों की वर्दी से खून टपक रहा है। कुछ किया था क्या इस बदमाश ने?"

जवाब में जीप की बैटरी में जाने कैसे जान सी आ गयी और दीवान जी को सब साफ़ दिखने लगा। उं-उं करके हिल रहा व्यक्ति कोई अपराधी नहीं बल्कि बनल थाने का दीवान था। दोनों अफसरों की वर्दी से खून इसलिए रिस रहा था क्योकि दोनों के शरीर को बीच में से आधा काटा गया था और अब बनल थाना इंचार्ज का आधा दांया भाग सरोर के दरोगा के बायें भाग से जुड़ा था और सरोर दरोगा का दायां हिस्सा बनल इंचार्ज इंस्पेक्टर के बायें हिस्से से जुड़ा था। इस कारण ही ये दोनों शरीर लंगड़ा कर चल रहे थे और इनकी आवाज़ें भी सामान्य से अलग थीं। 

भयावह मुस्कान बिखेरते चेहरों को देख डर से गिर पड़े और दूर घिसटने की कोशिश कर रहे दीवान जी के पास आकर दोनों शरीर बैठ गए और बोले - "पिछले हफ्ते यहाँ पड़ी डकैती तो याद होगी दीवान जी? डकैत यहाँ एक एस.यू.वी. गाडी रोक एक परिवार के 8 लोग लूट कर सबको गोली मार गए थे। यहाँ से गुज़र रहे राहगीरों ने 100 नंबर कण्ट्रोल रूम फोन किया तो सूचना दोनों थानों पर गई। अब चूँकि यह इलाका दोनों थानों की सीमा है तो दोनों ने मामला काफी देर तक एक-दूसरे पर टाल दिया और तड़पता हुआ परिवार मदद की देरी में दम तोड़ गया। वो बेचारी आत्माएं लौटी और ना इसका ना मेरा करके हम दोनों को आधा-आधा काट गई जैसे हम अपनी ज़िम्मदारी को काट गए थे। पुलिस कण्ट्रोल रूम ने फ़ोन किया आपको और बनल के दीवान जी को और दोनों ने अपने-अपने थाना इंचार्ज को ये आईडिया दिया कि क्यों झंझट में पड़ना। वो आत्माएं उन डकैतों को निपटाने गई हैं हम दो जिस्म, दो जानों को एक काम सौंप कर... जैसे हम अधकटे एक-दूसरे से चिपके हैं, वैसे ही तुम दोनों दीवान के शरीर हमें काट कर, अलग-अलग जोड़ने हैं एकदम जैसे हम दोनों के शरीर जोड़े उन आत्माओं ने। 

फिर उन दोनों लंगड़ाते शरीरों ने बनल के दीवान और सरोर के दीवान जी के शरीर बीच से फाड़ने शुरू किये जिस से आस-पास का समां मौत से पहले की चीखों से भर गया। दोनों मृत शरीर को एक-दूसरे के आधे हिस्सों से जोड़ दिया गया। अगले दिन उस सीमांत मोड़ पर लोगो को चार लाशें मिली। हर लाश में 2 अलग-अलग इंसानो की आधी लाशें थी। 

समाप्त!
 - मोहित शर्मा ज़हन
Artwork - Thanh Tuan
#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents #trendybaba 

Saturday, April 15, 2017

रूहानी नाटक (कहानी) #ज़हन


मेरा नाम कृष्णानंद है और लोग मुझे किशन कहकर बुलाते हैं। 9 साल की उम्र में अपने गांव से बिना सोचे लखनऊ आया, वैसे सोचकर भी क्या कर लेता...नौ साल का दिमाग क्या सलाह देता? सीखने में आम बच्चो जैसा नहीं था तो मुझे मंदबुद्धि कहा जाता था, सोने पे सुहागा यह कि मैं हकलाता था। शहर तो आ गया पर यहाँ रहने लायक कोई काम भी तो आना चाहिए था। एक थिएटर उस्ताद ने अपनी शरण में लिया और मैं उनके रंगमंच में साफ़-सफाई, कपड़ो-मंच का रखरखाव जैसे काम करने लगा। दूर से नाटक के कलाकारों को देखते हुए कई बार उनकी टोली में मिल जाने मन किया पर फिर अपनी कमियों को देखकर खुद को रोक लिया। अक्सर सबके जाने के बाद खाली थिएटर में पूरे मन के साथ घंटो अपने बनाये 'शो' करता। ऐसा करते हुए कितने साल बीत गए। आज जब किसी तरह हिम्मत कर के उस्ताद को यह बात बतानी चाही तो पूरी टोली मुझपर हँसने लगी। मेरे बात करने के लहज़े का ना जाने कितना मज़ाक उड़ाया गया। यकीन नहीं हुआ ये सब वही लोग हैं जो सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ने की बातें करते हैं, जागरूकता फैलाते हैं। अब और कितना संघर्ष करूँ? जीवन भर घिसट-घिसट के क्यों बिताऊं? क्या फायदा इन सबके बीच रहकर इस अधूरे जीवन को बिताने का? इस से बढ़िया तो मैं पैदा ही ना हुआ होता! अभी देर नहीं हुई है, मैं खुदखुशी कर लूँगा। 

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"किस ख़ुशी में कर लोगे खुदख़ुशी? हम करने ही नहीं देंगे!"

(**सामने के नज़ारे से किशन की आवाज़ गुम हो गई इसलिए नैरेटर को टेकओवर करना पड़ रहा है।**)

छत के बाहर की ओर टांग लटकाये बैठे किशन को झटका लगा और वह अंदर आकर गिरा। उसके सामने अलग-अलग मानव आकृतियों वाले भूत खड़े थे। उनकी मुखिया एक सुन्दर परी सी आत्मा बोल रही थी। अचानक जैसे उसके मोनोलॉग को सुन रही काल्पनिक प्रकृति जागृत हो गयी। किशन डर से जड़ हो गया। 

"डरो मत किशन! हम सब तुम्हे कुछ बातें बताने आएं हैं। कभी सोचा है रोज़ तुम आराम से उठते थे, हर दूसरे दिन तुम्हे लगता था कि आज तो तुम्हे पक्का देर हो जायेगी पर कभी ऐसा हुआ नहीं। तुम्हारे कमरे का किराया, बिजली-पानी का खर्च तुम्हारी मासिक आय से काट लें तो 50 रुपये बचते हैं...पर जब भी तुम्हारा मन कोई मिठाई, आइस क्रीम खाने को होता, किसी गरीब की मदद करने को होता तो तुम्हारी जेब से ज़रुरत भर के पैसे निकल आते। थिएटर टोली में सब कहते हैं कि किशन कभी बीमार नहीं पड़ता, सही कहते हैं। उन्हें यह नहीं पता कि तुम्हे कभी चोट भी नहीं लगती। तुम्हारे घर पर हर महीने माँ-बाप के खर्चे लायक मनी आर्डर जाता है....अरे वो तो छोडो, एक मित्र से तुम्हे ना कहने मे दिक्कत हुई और तुमने उस से जीवन बीमा पॉलिसी खरीद ली, फिर भूल गए। उस पॉलिसी का प्रीमियम ढाई साल से हर 3 महीने बिना नागा जमा हो रहा है। कभी सोचा है यह सब कैसे हो रहा है? कौन और क्यों कर रहा है? 

कैसे सोचोगे? तुम बहुत भोले हो! तुम्हारी कला और मन में मिलावट नहीं है। किसी को दिखाने के लिए लोग जो आडम्बर ओढ़ते हैं उससे तुम कोसो दूर हो। हम सब हर रात तुम्हारे नाटक देखने आते हैं। अब तो बाहर के शहरों के भूत तक सिर्फ तुम्हारे लिए यहाँ आते हैं। जब तुम अपने सोचे नाटकों पर माइम करते हुए दर्जन किरदारों के स्वांग रचते हो तो तुम्हारे रचना संसार के आगे बाहर की दुनिया बहुत छोटी लगने लगती है। दिनभर जिस संकोच और शर्म के पीछे कुछ शब्द बोलने से डरते हो, रात में उतनी ही गहनता से हकलाते हुए जब संवाद बोलते हो तो फिर जन्म लेकर तुम्हारे साथ रहने का मन करता है। जिस जीवन को इतनी आसानी से छोड़ने की बात कर रहे हो उसके केवल कुछ क्षणों के लिए हम सब आत्माएं अतृप्त घूम रही हैं।"

किशन का मन हल्का हुआ कि उसकी कला के हज़ारों कद्रदान हैं। उसने फिर से शुरुआत की और कुछ समय बाद अपने रूहानी कद्रदानों की मदद से लखनऊ मे एक सरप्राइज थिएटर शो बुक किया। शो के अनोखे प्रचार से कई वहाँ पहुंचे, जिनमे किशन का उस्ताद और उसकी उत्सुक टोली भी शामिल थी। किशन की मेहनत रंग लाई और सबको अपनी प्रतिभा से चौंकाते हुए उसने एक हिट शो दिया। टोली को अपनी बड़ी भूल का एहसास हुआ और किशन के माइम, कहानी के अनुसार उन लोगो ने कुछ अलग नाटक रचे। अब वह थिएटर किशन के नाम से जाना जाता है। हाँ, आज भी अक्सर किशन रात में खाली फिर भी 'भरे हुए' थिएटर में अपनी नाट्य प्रस्तुति देता है। 

समाप्त!
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster

Thursday, April 13, 2017

सिर्फ मर्सिडीज़ ही चाहिए? (लेख) #मोहितपन


जब से लेखन, कला, कॉमिक्स कम्युनिटीज़ में सक्रीय हूँ तो ऑनलाइन और असल जीवन में कई लेखकों, कलाकारों से मिलने का मौका मिला है। एक बात जो मैं नये रचनाकारों को अक्सर समझाता हूँ वो आज इस लेख में साझा कर रहा हूँ।

3-4 साल पहले एक युवा कवि/लेखक ने मेरे ब्लॉग्स पढ़कर मुझसे संपर्क किया और हम ऑनलाइन मित्र बन गये। कुछ समय तक उनके काव्य, कहानियां पढ़ने को मिली फिर वो गायब से हो गये। वो अकेले ऐसे उदाहरण नहीं हैं, पिछले 11 वर्षों में कई प्रतिभावान लेखक, कलाकार यूँ नज़र से ओझल हुए। निराशा होती है कि एक अच्छे कलाकार को पता नहीं क्या बात लील गयी....कहने को तो व्यक्ति के वश से बाहर जीवन में कई बातें उसे रचनात्मक पथ से दूर धकेल सकती हैं पर एक कारक है जिसके चलते कई हार मान चुके कलाकार अपना क्षेत्र छोड़ देते हैं। एक लेखक का उदाहरण देकर समझाता हूँ। मान लीजिए नये लेखक को ऑनलाइन मैगज़ीन के लिए लिखने का मौका मिला, उसने मना कर दिया। मैगज़ीन पेज पर 700 फॉलोवर और प्रति संस्करण 450 डाउनलोड वाली ऑनलाइन पत्रिका पर वह अपना समय और एक आईडिया क्यों बर्बाद करे? इस क्रम में लेखक ने कई वेबसाइट को ठेंगा दिखाया कि वो उसके स्तर की नहीं। चलो सही है, थोड़े समय बाद उसे एक स्थानीय प्रिंट मैगज़ीन या अखबार में कुछ भेजने को कहा गया फिर उसने समझाया - जो प्रकाशन 2-3 शहरों तक सीमित हो उसमे छपना भी क्या छपना। पब्लिश हो तो इस तरह कि दुनिया हिल जाए! हम्म.... कुछ अंतराल बाद इनके किसी मित्र को लेखन अच्छा लगा तो अपनी शार्ट फिल्म के लिए स्क्रिप्ट की बात करने आया। जवाब फिर से ना और मन में ("अबे हट! ऐसे वेल्ले लोगो की फिल्म थोड़े ही लिखूंगा, सीधा चेतन भगत की तरह एंट्री मारूंगा।") और इस तरह मौके आते गये-जाते गये। अब ऐसे लेखक, कवि और कलाकार एक समय बाद भाग्य को दोष देकर हार मान लेते हैं और इनकी ऑनलाइन गिनी चुनी रचना पड़ी मिलती हैं और इनके मेल ड्राफ्ट्स में डेढ़-दो सौ आईडिया सेव होते हैं जो कभी दुनिया के सामने नहीं आते क्योकि इन्हे एक खुशफ़हमी होती है कि ये जन्मजात आम दुनिया से ऊपर पैदा हुए हैं तो आम दुनिया जैसी मज़दूरी किये बिना ये डायरेक्ट सलमान खान, ऋतिक रोशन के लिए फिल्म लिखेंगे या 90 के दशक के वेद प्रकाश शर्मा जी की तरह एक के बाद एक बेस्टसेलर किताबें बेचेंगे। मतलब खरीदेंगे तो सीधा मर्सिडीज़ बीच में साइकिल, बाइक, मारुती 800, वैगन आर, हौंडा सिटी लेने का मौका मिलेगा भी तो भाड़ में जाए....ऐसा नहीं करेंगे तो बादशाह सलामत की शान में गुस्ताखी हो जायेगी ना!

अरे! स्टेटस या अहं की बात बनाने के बजाए ऐसे छोटे मौकों को आगे मिलने वाले बड़े अवसरों के पायदान और अभ्यास की तरह लीजिए। अगर आप वाकई अपने जुनून के लिए कुछ रचनात्मक कर रहे हैं तो इन बातों का असर तो वैसे भी नहीं पड़ना चाहिए। मंज़िल के साथ-साथ यह ध्यान रखें कि आप सफर में धीमे ही सही पर आगे बढ़ रहे हैं या नहीं। आप कलात्मक क्षेत्र में जिन्हे भी अपना आदर्श मानते हैं उनकी जीवनी खंगालें, लगभग सभी का सफर ऐसे छोटे अवसरों से मिले धक्के से बड़े लक्ष्य तक पहुँचा मिलेगा। हाँ, अपनी प्राथमिकताएं सही रखें, ऐसा ना हो कि सामने कोई बड़ा अवसर मिले और आप किसी बेमतलब की चीज़ में प्रोक्रैसटीनेट कर रहे हों। संतुलन बिगड़ने मत दीजिये और खुद पर विश्वास बनाये रखें। गुड लक!

#ज़हन

Saturday, April 8, 2017

काश में दबी आह! (कहानी) #ज़हन


स्कूल जाने को तैयार होती शिक्षिका सुरभि पड़ोस के टीवी पर चलता एक गाना सुनकर ठिठक गई। पहले इक्का-दुक्का बार उसे जो भ्रम हुआ था आज तेज़ गाने की आवाज़ ने वो दूर कर दिया। जाने कब वो सब भूलकर सुनते-सुनते उस गाने के बोल पड़ोस के घर के गेट से सटकर गुनगुनाने लगी। अपनी धुन में मगन सुरभि का ध्यान पडोसी की 4 साल की बेटी पीहू के अवाक चेहरे पर गया और वह मुस्कुराते हुए सामान्य होकर वहाँ से स्कूल की तरफ बढ़ चली। आज स्कूल में सुरभि का मन नहीं लग रहा था, वो तो यादों के सागर में गोते लगा रही थी। किस तरह वह अपने गायक, गिटारिस्ट बॉयफ्रेंड घनश्याम के गानों, रियाज़ को घंटो सुना करती थी। उसके दर्जनों गानों के बोल सुरभि को आज भी याद थे। 

ज़िन्दगी को सुलझाते हुए जाने कब दोनों का रिश्ता उलझ गया और अपने सपनो का पीछा करता घनश्याम सुरभि से अलग हो गया। सुरभि में अपने परिवार से बग़ावत करने की हिम्मत नहीं थी। दूर जाने का दर्द तो दोनों को बहुत था पर अक्सर चल रहे पल इंसान के सामने कुछ ऐसे दांव रखते हैं कि बीते लम्हों की याद आने में काफी समय लग जाता है। कभी दो जिस्म, एक जान यह जोड़ा अब एकल जीवन में व्यस्त एक-दूसरे के संपर्क में भी नहीं था।  दोनों का लगा शायद वक़्त एक मौका और देगा पर कुछ सालों बाद सुरभि की शादी हो गई। आज वो खुश थी कि देर से सही पर कम से कम उसके पूर्व प्रेमी को अपनी मंज़िल तो मिली। शाम को लौटकर सबसे पहले उसने इंटरनेट पर इन गानों और घनश्याम का नाम ढूँढा। सुरभि हैरान थी कि इन गानों के साथ घनश्याम का नाम कहीं नहीं था। उसे लगा शायद घनश्याम ने मायानगरी जाकर अपना नाम बदल लिया हो पर गायको, म्यूजिक टीम की तस्वीरों, वीडिओज़ में घनश्याम कहीं नहीं था। सुरभि के आँसुओं की धारा में एक से अधिक दुख बह रहे थे। प्यार को जलाकर रिश्ते की आँच पर जो सपने पकायें थे उनके व्यर्थ जाने का दुख, घनश्याम की तरह हिम्मत ना दिखाने का दुख, उसका प्रेमी ज़िंदा भी है या नहीं यह तक ना जान पाने की टीस... 

उधर लालगंज से दूर फ़िरोज़ाबाद में चूड़ी की दूकान पर खरीददार महिला को कंगन पहनाते घनश्याम के कानो पर रेडियो में किसी और द्वारा गाये अपने गानों का कोई असर नहीं पड़ रहा था। उसकी आँखों की तरह उसकी बातें भी पत्थर बन चुकी थीं। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Monday, March 20, 2017

माहौल बनाना (कहानी) #ज़हन

Art - Harikant Dubey

वृद्ध लेखक रंजीत शुक्ला की अपने पोते हरमन से बहुत जमती थी। जहाँ नयी पीढ़ी के पास अपनों के अलावा हर किसी के लिए समय होता है वहाँ हरमन का रोज़ अपने दादा जी के साथ समय बिताना जानने वालो के लिए एक सुखद आश्चर्य था। बातों से बातें निकलती और लंबी चर्चा खिंचती चली जाती। एक दिन हरमन ने रंजीत से पूछा कि उन्हें अपने जीवन में किस चीज़ का मलाल है। 

रंजीत गंभीर मुद्रा में कुछ सोचकर बोले - "कठिन सवाल है! इतने वर्षो में जाने कितनी गलतियाँ की हैं जिनपर सोचता हूँ कि उस समय कोई और निर्णय लिया होता तो अबतक जीवन कितना अलग होता फिर सोचता हूँ कि जिन बातों पर पछता रहा हूँ अगर वो ना की होती तो क्या आज, अबतक 'मैं' वाकई 'मैं' रहता? एक राह चुनने पर दूसरी राहों को छोड़ने का मलाल स्वाभाविक है।"

हरमन - "यानी मलाल हैं भी और नहीं भी? बड़ी अजीब स्थिति हो गयी ये तो। मुझे लगा जीवन के इस पड़ाव पर आपका हर जवाब निश्चित हो गया होगा।"

रंजीत - "वैसे एक चीज़ और रह गई। अपनी ज़िन्दगी के एक बड़े हिस्से मेरी एक आदत के कारण मैंने अनेक अवसर गंवाएं होंगे। वो आदत थी, किसी भी काम को करने के लिए माहौल बनाने की आदत।"

हरमन - "मैं समझा नहीं! माहौल मतलब?"

रंजीत - "मतलब हर बड़े काम को करने या महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले सभी बातें मेरे अनुकूल बनाने या उनके अनुकूल होने का इंतज़ार करना। मान लो मुझे कार खरीदनी है। तो कभी मार्किट के ठीक होने का इंतज़ार करना, कभी नौकरी बदलने या प्रमोशन की बाट जोहना, कभी सोचना इस शहर के हिसाब से मेरी पसंद की गाडी ठीक नहीं...एक बात को इतना टाल देना कि या तो वो साकार ही ना हो पाए या उसके पूरे होने पर मज़ा ना आये, एक अधूरापन लगे। इसी तरह किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में, घर लेने के निर्णय में, कोई किताब शुरू करने से पहले या निवेश में सभी आंतरिक और बाहरी घटकों के मेरे हिसाब से हो जाने का इंतज़ार करना। कभी कभार ऐसा करना गलत नहीं पर इसे एक आदत बना लेने से हम अपनी मेहनत से अधिक अपने भाग्य के भरोसे बैठ जाते हैं क्योकि जो बस के बाहर है उस स्थिति पर मन मसोस कर रह जाना सही नहीं।"

हरमन - "चलिए, मैं आज यह शपथ लेता हूँ कि पार्टी के अलावा कहीं माहौल नहीं बनाऊंगा...हा हा हा।"

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster

Sunday, March 19, 2017

शाकाहारी मनोज का मांसाहारी बदला (कहानी) #mohitness

Artwork - Kedar Naik

पंखे की आवाज़ से ध्यान हटाकर मनोज कुछ महीनो पहले की अपनी मनोस्थिति सोच रहा था। तब गाँव से शहर आकर पढाई और सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षाओं तैयारी करना मनोज को जितना कठिन लग रहा था, असल में उतना था नहीं। यहाँ बने घनिष्ठ मित्रों, शिक्षको के सहयोग से मनोज का सफर कुछ आसान हो गया था। हालांकि, कुछ बातों में उसका मत और पसंद अपने मित्रो के समूह से अलग होते थे। अक्सर उसके दोस्त उसे मांसाहार खाने की ज़िद करते पर वह हमेशा उन्हें टाल देता। जब मनोज कहता कि उसने बचपन से नहीं खाया इसलिए खाने का मन नहीं होता तो उसके मित्र कहते कि "जीवन में कभी ना कभी तो कोई चीज़ पहली बार करते ही हो, यह भी कर के देख लो।" एक बार मनोज के मुँह से निकल गया कि वह पंडित है तो सब हँसते हुए बोले कि "अरे! आजकल पंडित ही तो सबसे ज़्यादा खाते हैं।" बहस करने और उसमे जीतने की मनोज को आदत नहीं थी। ऐसी कोई स्थिति आने पर वह असहज होकर वहाँ से निकलने के बारे में सोचता रहता था।  उसके घर के माहौल और निजी मत के अनुसार मांसाहार वर्जित था। उसे यह बात खटकती थी कि जब वह अपने दोस्तों पर मांसाहार छोड़ने के लिए दबाव नहीं डालता तो वो लोग उसके पीछे क्यों पड़े रहते हैं? 

एक दिन मनोज के मित्रों ने धोखे से उसे एक मांसाहार व्यंजन, पनीर-मशरूम की ख़ास डिश कहकर खिलाया। मनोज ने जब खाने के स्वाद की तारीफ़ की तो सबने उसका मज़ाक उड़ाया और बताया कि मांसाहार खाने के बाद भी वह इंसान ही है और उस में कुछ नहीं बदला। उस जैसे इंसान मांस खाते हैं और बिना किसी परेशानी के जीते हैं। मनोज को इस बात से बड़ी ठेस पहुंची और पर उसने मित्र मंडली के सामने अपनी निराशा नहीं जताई। समय बीतने के साथ सब आगामी एग्जाम की तैयारी मे जुट गए और एग्जाम होने के बाद मनोज ने सबको अपने कमरे पर आमंत्रित किया। मनोज तरह-तरह के व्यंजन लाया था और सबने बड़े चाव से दावत का मज़ा लिया। हालांकि, धोखे से मनोज मांसाहार खा चुका था पर उसने आज अपने लिए शाकाहार व्यंजन ही रखे। दावत ख़त्म होने के बाद मनोज बोला.... 

"बिरयानी के साथ कुत्ते का शोरबा, छिपकली की चटनी कैसी लगी?"

इतना सुनना था कि सबके कुत्ते वाले मुँह बन गए। पहले तो मित्रो ने विश्वास नहीं किया पर फिर मनोज की मुस्कराहट देख कर कोई उल्टी करने दौड़ा तो किसी ने मनोज का गिरेबान पकड़ लिया। मनोज ने अपने दोस्तों की टोन में जवाब दिया - "चिंता मत करो...कुत्ता या छिपकली चीन, म्यांमार, ताइपे देशो में इंसानो द्वारा खाये जाते हैं और इन्हें खाने के बाद भी तुम सब इंसान ही रहोगे, तुम्हारे अंदर कुछ नहीं बदलेगा।"

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness

Tuesday, March 14, 2017

पुरुष आत्महत्या का सच (कहानी) #ज़हन

Art - L. Naik

पार्क में जॉगिंग करते हुए कर्नल शोभित सिंह अपने पडोसी लिपिक शिवा आर्यन से रोज़ की तरह बातें कर रहे थे। उनकी वार्ता में एक बात से दूसरी बात और एक विश्लेषण से कहीं और का मुद्दा ऐसे बदल जाते थे जैसे किशोर टीवी चैनल बदलते हैं। दोनों के लिए अपनी चिंता, मानसिक दबाव कम करने का इस से बेहतर साधन नहीं था। जॉगिंग के बाद जब दोनों बेंच पर बैठकर अखबार पढ़ने लगे तो एक रिपोर्ट ने उनका ध्यान खींचा।

शिवा आर्यन - "हम्म....औरतों की तुलना में मर्द क्यों दुगनी संख्या में सुसाईड करते हैं? इसका जवाब मुझे पता है।" (अखबार साइड में रखकर) अरे आप तो सीरियस हो गए...गलत टॉपिक छेड़ दिया लगता है। कल के क्रिकेट मैच से बात शुरू करनी चाहिए थी। चलो कोई नहीं, चिल्ल कर के बैठो सर! लोड मत लो, मैं यहाँ अपनी दुखभरी कहानी से आपको परेशान नहीं करने वाला। बस अपने उदाहरण से यह मुद्दा समझा रहा हूँ। मेरी लाइफ नार्मल है, बचपन से लेकर अब तक हर बात साधारण रही है। मैं, मेरा परिवार, मेरी क्लर्क की नौकरी, मेरी पत्नी, मेरा मकान, मेरा रूटीन....सब कुछ आर्डिनरी। 

जब किसी घर में लड़का पैदा होता है तो माँ-बाप की आँखों में ढेर सारे सपने पलने लगते हैं कि हमारा लाडला पता नहीं कौनसी तोप उखाड़ेगा, कलेक्टर बनेगा, दुनिया बदल देगा फलाना-ढिमका। बच्चे के बड़े होने के साथ कुछ सपने मर जाते हैं और कुछ ज़बरदस्ती उसपर थोप दिए जाते हैं कि कम से कम इतना तो करना ही पड़ेगा। उन सपनो को बस्ते में ढोकर वो बच्चा अपने जैसे करोड़ो बच्चों से रेस लगता है। तब उसे पता चलता है कि सपनो को ज़िंदा रखने के लिए करोड़ो में सिर्फ अच्छा होना काफी नहीं बल्कि असाधारण होना पड़ता है। इस रेस में करोड़ो बच्चो को हराकर और करोड़ो से हारकर वो बच्चा मेरे जैसी साधारण ज़िन्दगी वाली स्थिति में पहुँच जाता है। पहले माँ-बाप के सपने मरते देखता हूँ, फिर शादी के बाद मेरी पत्नी की आँखों के सपनो मुझे सोने नहीं देते थे। ऐसा नहीं कि मैं मेहनत नहीं करता, अक्सर ओवरटाइम करता हूँ - टाइम पर बोनस पाता हूँ पर 19-20 मेरी नौकरी की एक रेंज है, आगे भी रहेगी और वो रेंज मेरे अपनों के सपनो की रेंज से बहुत नीचे है। समय के साथ मेरी तरह सबने एडजस्ट करना सीख लिया। सबने सिवाय मेरी नन्ही गुड़िया ने! उसके लिए मैं टीवी पर आने वाले सुपरहीरोज़ से बढ़कर था जो दुनिया में कुछ भी कर सकता है। एक ऐसा हीरो जिसके इर्द-गिर्द उसकी छोटी सी दुनिया बसी थी। जैसे-जैसे गुड़िया बड़ी हो रही है, दुनिया के आईने में उसका सुपरहीरो पापा हर दिन छोटा होता जा रहा है। अब मुझसे उसकी आँखों में मर रहे सपने देखे नहीं जाते। सबसे आँखें चुरा सकता हूँ पर अपनी गुड़िया से ऐसी आदत डालने में बहुत दर्द होगा, ऐसा दर्द जो किसी से बाँट भी नहीं सकता। यह घरेलु हिंसा की तरह दिखने वाले ज़ख्म नहीं है, अंदर घुट-घुट कर कलेजा छलनी करने वाले घाव हैं। मैं आत्महत्या नहीं करूँगा...साला हिम्मत के मामले में भी आर्डिनरी हूँ। पर समझ सकता हूँ कुछ आर्डिनरी लोगो की घुटन, अंदर के ज़ख्म इतना दर्द देते होंगे कि उन्हें सुसाइड के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखता होगा। 

इसका मतलब ये मत लगाना कि सपने मार दो। बस अपने बाप, भाई, पति, प्रेमी को सपनो से हारने मत दो, उसको बताओ कि चाहे जो हो - आपके जीवन की पिक्चर का हीरो वो है और रहेगा। एक सपना मरेगा तो 10 नए आ जाएंगे पर कहीं किसी गुड़िया का हीरो चला जाएगा तो वो किसके कंधो पर चढ़कर सपने देखेगी...वो तो सपनो से ही डरने लगेगी।"

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन
 #mohitness #mohit_trendster

Sunday, November 20, 2016

अपना उधार ले जाना! (नज़्म) - मोहित शर्मा ज़हन


अपना उधार ले जाना!

तेरी औकात पूछने वालो का जहां, 
सीरत पर ज़ीनत रखने वाले रहते जहाँ, 
अव्वल खूबसूरत होना तेरा गुनाह, 
उसपर पंखो को फड़फड़ाना क्यों चुना?
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!

पत्थर को पिघलाती ज़ख्मी आहें,
आँचल में बच्चो को सहलाती बाहें,
तेरे दामन के दाग का हिसाब माँगती वो चलती-फिरती लाशें। 
किस हक़ से देखा उन्होंने कि चल रही हैं तेरी साँसे?
तसल्ली से उन सबको खरी-खोटी सुना आना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!
माँ-पापा के मन को कुरेदती उसकी यादें धुँधली,
देखो कितनो पर कर्ज़ा छोड़ गई पगली।
ये सब तो ऐसे ही एहसानफरामोश रहेंगे,
पीठ पीछे-मिट्टी ऊपर बातें कहेंगे,
तेरी सादगी को बेवकूफी बताकर हँसेंगे,
बूढे होकर बोर ज़िन्दगी मरेंगे।
इनके कहे पर मत जाना,
अपनी दुनिया में खोई दुनिया को माफ़ कर देना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!

ख्वाबों ने कितना सिखाया, 
और मौके पर आँखें ज़ुबां बन गयीं...
रात दीदार में बही,
हाय! कुछ बोलने चली तो सहरिश रह गई...
अब ख्वाब पूछते हैं....जिनको निकले अरसा हुआ,
उनकी राह तकती तू किस दौर में अटकी रह गई....
कितना सामान काम का नहीं कबसे,
उन यादों से चिपका जो दिल के पास हैं सबसे,
पुराने ठिकाने पर ...ज़िन्दगी से चुरा कर कुछ दिन रखे होंगे,
दोबारा उन्हें चैन से जी लेना...
इस बार अपना जीवन अपने लिए जीना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!

बेगैरत पति को छोडने पर पड़े थे जिनके ताने, 
अखबारों में शहादत पढ़, 
लगे बेशर्म तेरे किस्से गाने। 
ज़रा से कंधो पर साढ़े तीन सौ लोग लाद लाई,
हम तेरे लायक नहीं,
फिर क्यों यहाँ पर आई?
जैसे कुछ लम्हो के लिए सारे मज़हब मिला दिए तूने,
किसी का बड़ा कर्म होगा जो फ़रिश्ते दुआ लगे सुनने.... 
छूटे सावन की मल्हार पूरी कर आना,
....और हाँ नीरजा! अबकी आकर अपना उधार ले जाना!

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*नीरजा भनोट को नज़्म से श्रद्धांजलि*, कल प्रकाशित हुई ट्रिब्यूट कॉमिक "इंसानी परी" में यह नज़्म शामिल है।

Tuesday, November 15, 2016

Anik Planet (अनिक प्लैनेट) - Issue #01


Cover story for Comics Our Passion magazine Anik Planet - अनिक प्लैनेट (Issue # 01), November 2016. They were kind enough to advertise my upcoming projects "Kadr" and "Peripheral Angel" in this issue.

Saturday, November 5, 2016

सेलेब्रिटी पी.आर. का घपला (लेख) - मोहित शर्मा ज़हन

पैसा और सफलता अक्सर अपने साथ कुछ बुरी आदते लाते हैं। कुछ लोग इनसे पार पाकर अपने क्षेत्र में और समाज में ज़बरदस्त योगदान देते हैं वहीं कई शुरुआती सफलता के बाद भटक जाते हैं। एक बड़े स्तर पर आने के बाद प्रतिष्ठित व्यक्ति पर इमेज, ब्रांड मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी आ जाती है लोगो पर, अब या तो आप मेहनत और साफ़-सुथरे तरीके से ये काम करे या फिर अपनी मन-मर्ज़ी का जीवन जीते हुए बाद मे अपने कृत्यों को सही ठहराने की कोशिश करें। इन्ही में कुछ विख्यात लोग लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अपने पीआर एजेंट या नेटवर्क का सहारा लेते हैं। जैसे अगर कोई सेलिब्रिटी कोई गलत बात, काम करता पकड़ा जाए या उसकी वजह से जनता, समाज को कोई नुक्सान हो तो अपनी टीम की मदद से वो ये बातें प्रचारित करने की कोशिश करेगा कि उसका ये मतलब नहीं था वो तो इस काम से समाज की मानसिकता दिखाना चाहता/चाहती थी या उसे सेलिब्रिटी होने की सज़ा मिल रही है। ये सही है....सेलिब्रिटी होने के मज़े तक सब ठीक पर उस लाइफ में एडजस्ट करने वाले हिस्सो में शिकायत करो। 

उदाहरण के लिए किसी सेलिब्रिटी ने एक मुद्दे पर बिना जानकारी के कोई बेवकूफी भरी बात कही अब उसका सोशल मीडिया आदि जगह मज़ाक उड़ा। तो उसकी बेवकूफी गयी एक तरफ और उसने निकाल लिया अपने अल्पसंख्यक, महिला या किसी अन्य मजबूरी का कार्ड, फिर क्या मीडिया, जनता का ध्यान कहीं और गया। यानी अगर उस बात की तारीफ़ होती तब कोई दिक्कत नहीं थी, जहाँ एक वर्ग ने मज़ाक उडा दिया तो घुमा-फिरा कर बात अपने ऊपर मत आने दो। 

साथ ही ये लोग समय, स्थिति के अनुसार नए-नए स्टंट सोचते हैं। जैसे अपने बीते जीवन में किसी दुखद काल्पनिक घटना को जोड़ देना या किसी बीमारी (खासकर मानसिक) से जूझकर उस से जीतना दिखाना। क्या यार....आपके एक जीवन में घटनाओ का घनत्व कुछ अधिक नहीं हो गया? मैं यह नहीं कह रहा कि सब बड़े लोग ऐसा दिखावा करते है पर ऐसा करने वाले लोगो का अनुपात बहुत ज़्यादा है। आम जन - ख़ास लोग सबका जीवन चुनौतियों, संघर्षो वाला होता है पर ज़बरदस्ती के पीआर स्टंट कर के कम से कम खुद से झूठ मत बोलिये। इस नौटंकी के बिना भी आप लोकप्रिय और महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर जनता का ध्यान ला सकते हैं (बशर्ते आप वैसा करना चाहें ना की केवल अपनी पब्लिसिटी के चक्कर में पड़े रहे)। हालांकि, पैसे के पीछे भागते मीडिया को नैतिक-अनैतिक से कोई मतलब नहीं होता। हर दिन कुछ नया वायरल करने की होड़ में मीडिया के लिए कुछ नैतिकता की सोचना पाप है। वैसे व्यक्ति के बारे में थोड़ी रिसर्च और पहले का रिकॉर्ड देख कर आप जान सकते हैं कि कौन सही दावा कर रहा है और कौन पीआर के रथ पर सवार है। 

जो पाठक सोच रहे है कि क्या फर्क पड़ता है? बेकार में मुद्दा बनाया जा रहा है! अगर ऐसा करने से किसी को नुक्सान नहीं पहुँच रहा तो क्या गलत है? उन मित्रो से मेरा यह कहना है कि कभी-कभी किसी वर्ग को लंबे समय से छद्म रूप से हो रहा नुक्सान सीधे नुक्सान से बड़ा होता है। जिन लोगो को वाकई मीडिया, जनता के ध्यान-पैसे की आवश्यकता है वो बेचारे तरसते रह जाते हैं और उनका हिस्सा, उनकी फुटेज गलत संस्थाएं, लोग खा लेते हैं। मुश्किल है पर सबसे निवेदन है कि अपरंपरागत न्यूज़ सोर्सेज पर ध्यान दें, सही लोगो-संस्थाओ को आगे बढ़ने मे हर संभव मदद करें। छोटे बदलाव से धीरे-धीरे ही सही पर बड़ा असर पड़ेगा। 

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Wednesday, November 2, 2016

डूम प्लाटून रिटर्न्स (मोहित शर्मा ज़हन)



Challenge - Include horror, comedy, dark, crime fiction, superhero genres in 1 story.
Semi Finalists - 9

सन् 1947 में रूपनगर के पास जंगलों एवम समुद्र से सटे तटवर्ती इलाके मे दो बड़े स्थानीय कबीलों तरजाक और रीमाली ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह के कारण वहाँ से गुजरने वाले जहाज़ और आस-पास के बंदरगाहों के व्यापार पर असर पड़ने लगा। शांत कबीलों के अप्रत्याशित विद्रोह के दमन के लिए कर्नल मार्क डिकोस्टा के नेत्रत्व मे 71 लोगो की 'डूम प्लाटून' को भेजा गया। उनका लक्ष्य था हालात को सामान्य बनाना और उस स्थान और कबीले मे ब्रिटिश राज को फिर से कायम करना।

मिशन जब एक हफ्ते से लंबा खिंच गया तो मार्क सोच में पड़ गया। जिस ऑपरेशन को वह 4 दिन की बात समझ रहा था, उसमे इतना समय कैसे लग सकता था। वरिष्ठ सदस्यों की मीटिंग के बाद जब कोई निष्कर्ष नहीं निकला तो मार्क ने अपने 2 ख़ास गुप्तचरों को प्लाटून की जासूसी पर लगाया साथ ही वह खुद भी रात में रूप बदल कर प्लाटून की गतिविधियां जांचने लगा। रात के पौने तीन बजे उसे जंगलों में कुछ हलचल दिखाई दी। उस स्थान के पास पहुँचने पर उसे प्लाटून का मेजर रसल और एक कबीले की स्त्री बात करते दिखे। वह महिला रसल के लिए फलों की टोकरी लाई थी और दोनों टूटी-फूटी बोली में एक-दूसरे के आलिंगन में प्यार भरी बातें कर रहे थे। कर्नल ने तुरंत ही पहरा दे रहे सैनिको के साथ मेजर और उस महिला को बंदी बना लिया। सुबह उनकी पेशी में मेजर रसल ने सफाई देते हुए कहा कि व्यापार के लालच में पड़ी ब्रिटिश सरकार की गतिविधियों के कारण इन क़बीलों का प्राकृतिक निवास, खाने और रहने के साधन धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। यही कारण है कि अब तक ब्रिटिश राज की सभी बातों का पालन करने वाले कबीलों के विद्रोह का बिगुल बजाया। प्लाटून के आने पर जब युद्ध की स्थिति बनने लगी तो अपने जान की परवाह किये बिना रीमाली कबीले की एक साधारण स्त्री शीबा जंगल में बढ़ रहे मेजर को समझाने आई। शीबा के भोलेपन और जज़्बे ने रसल को सुपर मोहित कर दिया। इस वजह से रसल गलत जानकारी देकर प्लाटून को गलत दिशाओं में भटका रहा था। रसल के आश्वासन, धैर्य से शीबा की बात सुनने और निस्वार्थ कबीलों की मदद करने से शीबा को भी उस से प्रेम हो गया। क्रोधित मार्क ने रसल को समझाया की प्लाटून के पास बस 2-3 हफ़्तों लायक राशन बचा है इस दूर-दराज़ के इलाके में, चार-पांच सौ कबीलेवासीयों और अपने प्रेम के चक्कर में वह अपने साथियों की जान दांव पर नहीं लगा सकता। धरती पर बोझ ऐसे नाकारा कई कबीलों और भारतियों को ख़त्म कर ब्रिटिश सरकार ने इस देश पर एहसान ही किया है। जब मेजर रसल ने आर्डर मानने से इंकार कर दिया तब कर्नल मार्क ने उन्हें मौत का फरमान सुनाया। रसल और शीबा की अंतिम इच्छा एक आखरी बार एक-दूसरे से लिपटकर मरने की थी। मुस्कुराते हुए रसल ने शीबा को बंदूकधारियों से मुंह फिराकर अपनी ओर देखने को कहा, कुछ पल को रसल की आँखों में देख रही शीबा जैसे भूल गई की यह उसके अंतिम पल हैं। कितनी शांत और दिलासे भरी आँखें थी वो जो ना जाने कैसे मन में चल रहे तूफ़ान को खुद तक आने से रोकें हुए थी? चलो बहुत हो गया यह इमोशनल ड्रामा इन दोनों का, उड़ा दो इन बेचारे प्यार में पागल पंछियों को…हा हा हा...कर्नल के डार्क ह्यूमर पर उसके अलावा और कोई नहीं हँसा। मार्क के निर्देशों पर उसके सैनिको ने अन्य सैनिको सामने उन 2 प्रेमियों को गोलियों से भून दिया। कुछ दिनों के प्यार में जैसे दोनों ने पूरा जीवन जी लिया था इसलिए आखरी वक़्त में एक-दूसरे से लिपटे रसल और शीबा के चेहरों पर संतोष के भाव थे। कर्नल मार्क का ऐसा निर्दयी रूप और साथी मेजर रसल की मौत देख कर कर कई सैनिकों ने उसका साथ छोड़ कर वापस जाने का निर्णय लिया। आदेशों की अवहेलना और खुद के नेतृत्व पर इतने सवाल उठते देख कर मार्क आगबबूला हो उठा। वापस लौटते हुए सैनिको पर उसने अपने वफादार सैनिको से गोलियों की बरसात करवा दी।

मार्क ने मन ही मन सोचा कि चलो अच्छा हुआ अब राशन ज़्यादा दिन चलेगा और मिशन से लौटने पर इतने सैनिको का शहीद हो जाने पर उसकी बहादुरी, अडिगता के चर्चे होंगे। हालाँकि, मिशन के लगभग तीन हफ़्तों बाद ही इंग्लैंड की सरकार ने भारत छोड़ने की आधिकारिक घोषणा की, पर डूम प्लाटून का दस्ता अपने मिशन के बीच में था और दुर्गम क्षेत्र, दूरदराज़ के मिशन में उन्हें भारत की स्वतंत्रता की जानकारी नहीं मिली। मार्क की हरकत से चिढे उस स्थान के आस-पास के बाकी कबीले भी डूम प्लाटून को मिलकर ख़त्म करने में तरजाक और रीमाली कबीलों के साथ शामिल हो गए। डूम प्लाटून पर चारो तरफ से आक्रमण हो गया। समय के हिसाब से प्लाटून के पास अत्याधुनिक हथियार थे पर इतने जंगलवासियों की संख्या के सामने प्लाटून कमज़ोर पड़ रही थी। प्लाटून को उम्मीद थी कि इतना समय बीत जाने के कारण उनकी मदद के लिए इंग्लैंड सरकार ज़रूर कुछ करेगी पर भारत की आज़ादी के समय बड़े स्तर पर हुई इतनी अधिक घटनाओ के बीच यह बात दब सी गयी और डूम पलाटून के सारे सिपाही कुछ दिनों के संघर्ष के बाद मारे गए। मार्क चाहता तो कबीलों के सामने आत्मसमर्पण कर सकता था पर उसका अहंकार उसकी मौत की वजह बना। जंगलवासियों को भी आज़ादी भारत के साथ मिली पर जंगलियों को आज़ादी मिलने का तरीका भारत जैसा नहीं था।
कुछ दिनों तक सब सामान्य रहने के बाद उन तटवर्ती इलाकों मे बसे कबीलों और जंगलो मे अजीब घटनाये होने लगी। एक-एक कर कबीलों के सरदारों को भ्रामक, डरावने दृश्य नज़र आने लगे, फिर सबकी हरकतें भूतहा होने लगी। कुछ तो अपने ही भाई-बंधुओं को मारकर उनके खून को कटोरी में भर उसके साथ रोटी, खाना खाने लगे। अगर त्रस्त आकर कबीले का सरदार बदला जाता तो उसमे भी वैसा पागलपन आ जाता। हर जगह यह बात फैली की मार्क और उसके ख़ास साथियों की आत्माएं कबीलों के सरदारों के शरीर में आ जाती हैं और उन्हें मारने के बाद ही हटती हैं। जब हर जगह कबीले का कोई सरदार ना होने की बात पर सहमति बनी तो फिर कुछ दिन सामान्य बीते। कुछ दिन बात फिर आत्माओं द्वारा लोगो को सम्मोहन से दलदल में बुलाकर खींच लेने के मामले आम होने लगे। अगर कोई जगह छोड़ कर मुख्य भारत में जाता, कुछ समय बाद उसके भी मरने की खबर आती। नवजात शिशु पेड़ों पर उलटे लटक कर कबीले वालों को इंग्लिश में गालियां देने लगे। इन्ही शिशुओं में से कुछ दूध पीते हुए अपनी माताओं के वक्षस्थल से मांस नोचकर खाने लगे। इतनी घटनाओ के बीच वहां के कई कबीले एक के बाद एक रहस्यमय तरीके से ख़त्म होते चले गए। कुछ महीनो बाद वहां रूपनगर से गुज़रती नदी की बाढ़ का ऐसा असर हुआ की वो पूरा इलाका जलमग्न हो गया। बचे हुए कबीलों को भारतीय सरकार ने रूपनगर शहर में पुनर्स्थापित किया।



कई दशकों बाद जलमग्न जंगली इलाका धीरे-धीरे सामान्य हुआ। प्रगति कई ओर अग्रसर रूपनगर शहर का विस्तार करने को जगह ढूँढ रहे उद्योगपतियों और सरकार की नज़र उस तटवर्ती इलाके और जंगलो पर पड़ी। जंगल के कुछ हिस्सों की कटाई और निर्माण का काम शुरू हुआ। जहाँ हजारो मजदूरों के सामने फिर से आई डूम पलाटून की दहशत क्योकि वो अभी भी ब्रिटिश सरकार के आदेशानुसार उन इलाकों मे सिर्फ ब्रिटिश राज स्थापित करना चाहते थे। पहले तो ऐसी अनियमित घटनाओं को कल्पना मानकर नज़रअंदाज़ किया जाता रहा फिर भूतहा बातों का होना आम हो गया जिसके चलते कई मज़दूर और सुपरवाइज़र जगह छोड़ कर भाग गए। अपने पापों और दहशत से बढ़ी शक्ति के फलस्वरूप एक दिन डूम प्लाटून साकार रूप में आई, हजारो मजदूरों मे से कुछ को सबके सामने निर्दयता से मार कर डूम पलाटून ने मजदूरों मे अपनी दहशत फैलाई और वहाँ आई बहुत सी निर्माण सामग्री से मजदूरों को ब्रिटिश कालीन इमारते बनाने का निर्देश दिया। उन्होंने मजदूरों और उनके मालिको मे कोई भेद-भाव नहीं किया और सभी से बंधवा मजदूरी शुरू करवायी।
अपने साथियों की मदद से एंथोनी के कौवे प्रिंस ने इतनी जानकारी जुटायी। -

क्या है डूम प्लाटून  

*) - डूम प्लाटून के सभी सैनिक अपनी लाल वर्दी मे है और उनका मुखिया है कर्नल मार्क डिकोस्टा।

*) - ये मार्क और उसके वफादार 1947 में रूपनगर के तटवर्ती और जंगली इलाकों मे मर चुके है। प्लाटून में आंतरिक मतभेद के बाद मार्क ने अपने ही कई सैनिको को जंगल में मरवा डाला।

*) - इनके हथियार इनकी पुरानी बंदूके है जिनकी गोलियां कभी ख़त्म नहीं होती।

*) - इस पलाटून को इंग्लैंड सरकार से आदेश मिला था की उन तटवर्ती और जंगली इलाकों मे ब्रिटिश राज दोबारा स्थापित हो ये आज भी उस आदेश पर चल रहे है और जो भी इनके रास्ते मे आएगा उसे ये मार देंगे।
*) - ये बिना थके सालो से उस इलाके की रक्षा कर रहे है और ब्रिटिश सरकार की मदद का इंतज़ार कर रहे हैं।
*) - जंगल में अलग-अलग स्थान पर लाल वर्दी में कुछ आत्माएं और भटकती हैं (मेजर रसल और कर्नल द्वारा मारे गए अन्य सैनिक) वो आत्माएं किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाती।]

प्रिंस के ज़रिये यह खबर कुछ ही देर मे एंथोनी तक पहुंची और एंथोनी तुंरत रूपनगर के उस निर्जन इलाके तक पहुंचा जहाँ आज काफी हलचल थी। एंथोनी को डूम पलाटून की कहानी और इतिहास पता चल चुका था। उसने अंदाज़ा लगाया कि डूम प्लाटून और मार्क उसके समझाने पर नहीं मानेंगे। उसकी आशा अनुरूप उनको समझाने की एंथोनी की सारी कोशिशें, तर्क बेकार गए। अंततः उसका और डूम पलाटून का संघर्ष शुरू हो गया। एंथोनी एक शक्तिशाली मुर्दा था पर इतनी आत्माओं से यह संघर्ष अंतहीन सा लग रहा था। वह कुछ आत्माओं को ठंडी आग में जकड़ता तो कुछ उसपर पीछे से हमला कर देती पर जल्द ही प्रिंस की खबर पर एंथोनी की पुरानी मित्र वेनू उर्फ़ सजा भी अपने आत्मा रूप में एंथोनी की मदद करने आ गयी। एंथोनी ने वेनू के तिलिस्म की मदद से डूम प्लाटून को एक जगह बांध कर उन पर एकसाथ ठंडी आग का प्रहार किया वो आत्मायें कुछ देर तड़पने के बाद गायब हो गयी. एंथोनी को लगा की समस्या सुलझ गयी और उसने वहाँ फसे हुए लोगो को निकाला और वापस रूपनगर शहर के मुख्य इलाकों की और चल पड़ा। कुछ ही समय बाद उसे पता चला की उस जंगली इलाके के आस-पास बनी रिहाइशी कॉलोनियों मे डूम प्लाटून फिर से अपना आतंक मचा रही है और वहाँ के लोगो को ज़बरदस्ती पकड़ कर जंगल मे अधूरे पड़े निर्माण को बंनाने में लगा रही है। ऐसा इसलिए हो रहा था क्योकि उद्योगपतियों और सरकार ने जंगली इलाकों की काफी कटाई करवा दी थी जिस वजह से डूम पलाटून को वो कॉलोनियां भी अपने क्षेत्र का हिस्सा लगने लगी थी। एंथोनी फिर वहाँ पहुंचा और एक बार फिर से थोड़े संघर्ष के बाद डूम प्लाटून गायब हो गयी। यह सिलसिला चलता रहा। एक लडाई के दौरान एंथोनी के ये पूछने पर की सब ख़त्म हो जाने के इतने साल बाद भी  डूम पलाटून वो क्षेत्र छोड़ कर जाती क्यों नहीं तो कर्नल मार्क डिकोस्टा का कहना था की उन्हें ब्रिटिश सरकार का आदेश मिला है। काफी सोच-विचार के बाद एंथोनी अपने दोस्त रूपनगर डीएसपी इतिहास की मदद से दिल्ली से इंग्लैंड के दूतावास से कुछ ब्रिटिश अधिकारीयों को लाया और उनसे आतंक मचा रही डूम पलाटून को ये आदेश दिलवाया की वो अब किसी भारतीय को परेशान ना करे और ये क्षेत्र छोड़ कर पास ही समुद्र मे बने छोटे से निर्जन दहलवी द्वीप पर रहे। आखिरकार एक संघर्षपूर्ण भयावह अध्याय की समाप्ति के बाद एंथोनी की आत्मा अपनी कब्र में सोने चली। अगले दिन जब वह वापस कब्र फाड़कर निकलने को हुआ तो एक तिलिस्म ने उसे रोक लिया। सज़ा के शरीर को कब्ज़े में लेकर कर्नल मार्क ने एंथोनी की कब्र को तिलिस्म से बांध दिया था। अब तक अहंकार में चूर मार्क ने बदली सरकार का आदेश मानने से इंकार कर दिया। उसके अनुसार ब्रिटिश राज की सरकार अलग थी, वह इस कठपुतली सरकार का आदेश मानने को बाध्य नहीं था। तिलिस्म की सीमा के अंदर आये बगैर कब्र के ऊपर चिल्लाते प्रिंस ने ये बातें एंथोनी तक प्रेषित की।

इधर डूम प्लाटून अपने अधूरे निर्माण कार्य को पूरे करने में लग गयी। सरकार का ध्यान इस दिशा में गया और अर्धसैनिक बल भेजे गए लेकिन अदृश्य दुश्मन से भला वो कैसे लड़ पाते। उन सबके हथियार छीन कर, डूम प्लाटून ने उन्हें मज़दूरी पर लगा दिया। स्थिति गंभीर हो रही थी और मदद आने तक सरकार, स्थानीय प्रशासन को विचार-विमर्श करना था। ऐसा संभव था कि अपने सफलता से उत्साहित होकर मार्क अपनी प्लाटून के साथ रूपनगर शहर की तरफ कूच करे। अब या तो उस क्षेत्र को क्वारंटाइन घोषित कर सब खाली करवा सकती थी या और मदद भेजने का जोखिम उठा सकती थी, लेकिन हर गुज़रता पल उनकी मुश्किलें और शहर को नुक्सान बढ़ा रहा था। एंथोनी ने प्रिंस को सज़ा की आत्मा से तिलिस्म तोड़ने का तरीका सुझाया। सज़ा के द्वारा तिलिस्म तोड़ने का तरीका जानकर प्रिंस ने तिलिस्म के चारो ओर अपनी चोंच से एक बड़ा तिलिस्म बनाकर उसे निष्फल किया और आखिरकार एंथोनी अपनी कब्र से बाहर आ पाया। मौके की गंभीरता के बाद भी ज़मीन पर तिलिस्म बनाने में प्रिंस की घिसी हुई चोंच देखकर कुछ पलों के लिए एंथोनी अपनी हँसी रोक नहीं पाया, मदद करने के बाद भी एंथोनी को उसपर हंसता देख प्रिंस ने अपनी उबड़-खाबड़ चोंच एंथोनी को चुभाई और कान पकड़ते हुए माफ़ी मांगते एंथोनी ने प्रिंस की चोंच की मरहम-पट्टी की।

कुछ देर में ही एंथोनी एक बार फिर डूम प्लाटून ने सामने था। इस बार कर्नल मार्क ने उस पर तंज कसा, "इस तरह कब तक यह खेल चलता रहेगा मुर्दे एंथोनी? तू एक शक्तिशाली आत्मा है लेकिन हमारी संख्या के आगे तू हमे रोक नहीं सकता। तू अपनी साथी सज़ा के साथ हमारे काम में बाधा डालेगा, हमे रोकेगा। कुछ देर अपनी ठंडी आग में तड़पा लेगा और हम लोग गायब हो जाएंगे। तेरी इतनी मेहनत का फायदा क्या है? हमे मारा नहीं जा सकता, जबकि हम धीरे-धीरे तेरे शरीर को नुक्सान पहुंचा सकते हैं। हम एक जगह से भागेंगे तो फिर कहीं ना कहीं आ जाएंगे! पिछली बार तिलिस्म से कब्र में तेरा शरीर रोका था, अगर अब भी तू ना माना तो इस बार यह सुनिश्चित करूँगा की तेरा शरीर नष्ट हो जाए। सबकी भलाई इसमें ही है कि तू बार-बार हमारे रास्ते में आना छोड़ दे।"

एंथोनी - "तेरे जैसों के मुँह से सबकी भलाई की बातें शोभा नहीं देती कर्नल! एक बात मेरी भी जान ले, तुझसे पहले तेरे जैसी कई ढीट आत्माओं से पाला पड़ा है। एंथोनी का शरीर नष्ट करेगा तो आत्मा रूप में तेरे काम को रोकने आऊंगा। मुझे कभी मुक्ति मिल भी गयी तो इतना याद रख कि इंसाफ और मज़लूम की चीखों का हिसाब लेने के लिए एंथोनी स्वर्ग छोड़ कर आ सकता है। बड़े किस्से सुने हैं तेरी ईगो के जिसे तू प्रेम और लोगो की जान से ऊपर रखता है, देखते हैं पहले मैं डिगता हूँ या तू रास्ता देता है!"

कर्नल मार्क - "ठीक है! जैसी तेरी मर्ज़ी..."

एंथोनी - "एक मिनट! एक बात रह गयी...ज़रा गिनकर बताना तुझे मिलाकर तेरे सैनिक कितने हैं?"

कर्नल मार्क - "35...क्यों? अब इनके लिए कोई नया तिलिस्म लाया है?"

एंथोनी - "नहीं! 71 लोगो की डूम प्लाटून में से 35 निकले तो बचे 36! आओ तुम्हे बाकी सदस्यों से मिलवाता हूँ। मिलो दिल, भावनाओं वाले डूम प्लाटून के दूसरे हिस्से से जिसका नेतृत्व कर रहें हैं मेजर रसल। अब हुई कुछ बराबर की टक्कर। सज़ा की मदद से तुम्हारा इतिहास जानने के बाद जंगल में कहाँ-कहाँ भटकती इन आत्माओं को ढूंढकर एकसाथ, एक नेतृत्व में लाना था बस।"

सज़ा ने तट के पास निर्जन दहलवी द्वीप पर एक रास्ते को छोड़कर तिलिस्म से बांध दिया। मेजर रसल ने नेतृत्व में सैनिक मार्क के वफादार सैनिकों को उस तरफ धकेलने लगे। वहीं अपने पापों की वजह से अन्य आत्माओं से कहीं शक्तिशाली दुरात्मा मार्क को एंथोनी और सज़ा अपने सधे हुए वारों से उस ओर ले जाने लगे। सभी सैनिको के द्वीप के अंदर पहुँचने के बाद सज़ा ने बाहर से तिलिस्मी द्वार बंद कर उन्हें दहलवी द्वीप में कैद कर दिया। इसके बाद तुरंत ही डीएसपी इतिहास और अन्य अधिकारियों की सिफारिश पर द्वीप को आधिकारिक रूप से संक्रमित एव खतरनाक घोषित कर दिया गया।

....अब अगर कोई भटकी नौका या यात्री इस द्वीप पर आता है तो उसे 2 बराबर संख्या के गुट निरंतर युद्ध करते दिखाई देते हैं। बराबर क्यों? शायद इसलिए की मेजर रसल द्वीप पर नहीं जंगलों में शीबा के पास था और दोनों आत्माएं लगभग सत्तर साल पहले की उस रात की तरह ही टूटी-फूटी भाषा में प्यार भरा संवाद कर रहीं थी। ....क्या आप दहलवी द्वीप पर जाना चाहेंगे?

समाप्त!