अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Thursday, June 19, 2014

एक डॉक्टर की मौत (1991) फिल्म समीक्षा - मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness



एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म। यह ईमानदार प्रयास प्रकाश डालता है भारतीय सरकारी प्रणाली और उसके मुलाज़िमों पर ना सिर्फ सुस्त, कामचोर, घूसखोर होते है बल्कि किसी सच्चे, मेहनती इंसान को भी आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते चाहे इसमें दूसरो का भला ही क्यों ना छिपा हो। असल घटना तो  लम्बी और दर्दनाक थी इसलिए इस रूपांतरण में कुछ बातें बदली गयी पर फिर भी फिल्म का संदेश साफ़ मिला। 

कहानी एक डॉक्टर-वैज्ञानिक की है जो वर्षो तक कुष्ट रोग पर अनुसंधान करता है, अपनी निजी ज़िन्दगी और करियर को दांव पर लगा कर। इस धुन में सवार वो अपने करीबियों, खासकर  अपनी पत्नी को बहुत तकलीफ पहुँचाता है पर वो उसका साथ निभाते है। डॉक्टर की मेहनत में कोई कमी नहीं थी पर काम का अगला कदम यानी व्यवस्था और उसके भ्रष्ट लोगो पर निर्भरता। इसमें दुखी डॉक्टर अपेक्षित व्यवहार नहीं करता और कई किताबी ज्ञान  रखने वाले नाम के महकमे वालो को नाराज़ कर बैठता है। इस बीच डैमेज कंट्रोल और काउन्सलिंग की कोशिशें होती है, करीबी समझाते है पर सब बेकार। तो इस अदने डॉक्टर-वैज्ञानिक और सिस्टम के बीच किसकी जीत हुयी, इसके लिये फिल्म देखिये। 



फिल्म का प्लाट तो बेहतरीन और अलग है ही पटकथा में तपन सिन्हा द्वारा की गयी मेहनत, रिसर्च साफ़ झलकती है। वैज्ञानिक भाषा, एक्सप्लेनेशन, बैकड्रॉप कमाल के है। थोड़ी कमी बस बजट में दिखी जो समानांतर सिनेमा में आम बात है। अभिनय के मामले में फिल्म के मुख्य किरदार पंकज कपूर डॉक्टर रॉय के किरदार में घुल गये है, उनकी कोई सीमा ही नहीं लगती और दर्शक के मन में अलग-अलग दृश्यों में वो किरदार अनुरूप क्या कर देंगे देखने की जिज्ञासा रहती है, ऐसा बहुत कम कलाकारों के साथ होता है। डॉक्टर रॉय की पत्नी की निरंतर शांत  व्यथा तत्कालीन सिनेमा में शबाना आज़मी के अलावा शायद ही कोई निभा पाता। युवा पत्रकार बने इरफ़ान खान ने सीमित संवादों और दृश्यों के बावजूद भी दिल जीत लिया। विजयेंद्र घाटके के किरदार का उचित प्रयोग नहीं किया गया जैसा इस उम्दा अभिनेता के साथ अक्सर होता आया है। अब इनकी उम्र की वजह से इनका करियर भी सेमी-रिटायरमेंट में चला गया है, हालाँकि इनकी बेटी सागरिका घाटके अब बॉलीवुड में सक्रीय है। । दीपा साही को अपने मसाला किरदारों से अलग पर सीमित रोल मिला।  



भारतीय परिवेश के इस पेचीदा विषय को समझाते हुए लिखी गयी पटकथा कुछ जगह मौलिक बात से हटती और टूटती सी लगती है जो स्वाभाविक बात है  पर विषय की गहराई और मार्मिकता कम नहीं होती। फिल्म का ट्रीटमेंट आपको दूरदर्शन के स्वर्णिम युग की याद भी दिलवायेगा, इस फिल्म को मै 8.5/10 रेटिंग दूंगा। 

421 Brand Beedi Grade - A (Rating 8/10) 

- Mohit


Tuesday, June 12, 2012

Songs for Doga Movie (क्यों फेंका कूडे पर..?, दना दन डोगा, हमे डोगा से प्यार है!)


Doga movie ka annoucement 2008 mey ho gaya tha aur excited fans ne Orkut par unofficial Doga Movie Community banai thi, forums aur baaki comics communities mey bhi "what if" analysis aur possibilities, etc par charcha ho rahi thi. Maine bhi Doga par 3 lyrics/songs likhe. "Kyu Phenka Kude par..?" k liye to maine Yashpal Foundation Award bhi jeeta baad mey (2009). 

Here is the Orkut Thread (Once you login you will see the poster's names instead of "Anonymous", as RC Forums are down...I am unable to give the thread.)

Saath hi Dana Dan Doga naam bhi mil gaya jo aage Doga ki ek comic series mey uski pehchaan bana.  



1). क्यों फेंका कूडे पर..? 

मुझको साया दिखा....और उसके पीछे रौशनी,
पल मे यूँ गुम गया जैसे था ही वो नहीं,
छोडा मुझे अनजाना सा...बेगाना सा यहाँ,
खुद से मै पूछता मुझको जाना अब कहाँ?

ओ माँ...........
क्यों फेंका कूडे पर....मेरी माँ??
हमम..क्यों फेंका कूडे पर मेरी माँ???

कैसे कर लूँ मै इस बात का यकीन?
होश आया नहीं.... और मै बन गया यतीम.
क्या थी मजबूरी या मुझमे कुछ कमी,
आँचल के बदले क्यों मिली मुझे ज़मी?
आहट हो जब भी तो लगता है यही,
देखे तू मुझको छुप के कहीं...
कबसे तुझको ढूँढता फिर रहा...
देख ना...तेरा बेटा मुंबई का बाप बन गया...

ओ माँ.....
क्यों फेंका कूडे पर....मेरी माँ...!!
हमम….क्यों फेंका कूडे पर मेरी माँ??

धुन्दला सा याद है अब तक साया वो तेरा,
आँचल मे क्यों ना दी पनाह?
इतना तो सोचा होता....
नन्ही सी जान और इतना बड़ा जहाँ....
बचपन तो गया...फिर भी वक़्त है थमा....
मुझे बता...ओ माँ....क्यों फेंका कूडे पर मेरी माँ??



2). दना दन डोगा

सड़के सुनसान जब,
शहर बेजान जब,
आये तूफ़ान तब,
जो है...धिन धिनक धिन डोगा...
बोलो धिन धिनक धिन डोगा....

शोला वो आग का,
सीना फौलाद का,
दुश्मन अपराध का,
दे दे...दे दना दन डोगा...
ये है दे दना दन डोगा.....

आहट हो खून की,
चीखें मासूम की,
गुर्राए सूरत वो कुत्ते सी...
जो है धुम धड़क धुम डोगा...
आहा धुम धड़क धुम डोगा...

जिस्म पर बारूद लपेटे,
दिल मे तूफ़ान समेटे,
जिसके दम पर मुंबई वाले चैन से सोते,
वो है..दे दना दन डोगा...
अपना दे दना दन डोगा.....

मिला सदा ठोकरों का साथ,
होश मिलते ही हो गया अनाथ,
अब है मुंबई का बाप,
अपना धुम धड़क धुम डोगा...
ये है धुम धड़क धुम डोगा....


3). ...हमे डोगा से प्यार है!! 

Maybe Lomdi or Monica can sing this song in Doga movie...

सूरज को ढककर निकले जो डोगा,
रोज़ अनजानी राहो पर ना जाने क्या होगा?
अंधेरो को रोशन करता रहे...
अपराधो से हर दम लड़ता रहे.....
तो मुंबई क्यों ना कहे?
मुझे शाम का इंतज़ार है...
मुझे डोगा से प्यार है.....

जिस्म पर बारूद लपेटे....
ज़हन मे आग समेटे....
बाहर से चाहे पत्थर दिखे...पर जिसके दिल मे सबके लिए आंसू बहते.
शहर वाले जिसे असली मर्द कहते,
मजलूम जिसके लिए गाते रहते.....
मुझे शाम का इंतज़ार है......
मुझे डोगा से प्यार है.....

फरिश्तो मे वो फ़रिश्ता,
दरिंदो का वो दरिंदा,
जिसके रहते इंसानियत नहीं होती कभी शर्मिंदा,
जिसके भरोसे चैन से रहता है शहर का हर बाशिंदा,
मुझे शाम का इंतज़ार है....
मुझे डोगा से प्यार है....