अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Tuesday, August 16, 2022

Mygov website visit on Independence Day

 This independence day, spent some time on MyGov.in As a part of citizen engagement they share some interesting info, quizzes and activities open to all citizens of India.

Swarag Quiz based on latest DD show on India's freedom struggle.

Online financial fraud quiz

Har Ghar Tiranga Quiz

Zero-pollution mobility campaign quiz

Pledge to use Indian handloom products

Wednesday, May 30, 2018

क्यों कहते हैं? (लघुकथा) #ज़हन


चाय की दुकान पर नये-पुराने ग्राहकों के बीच एक ऐसा ग्राहक कुक्कू जिसे दोबारा कभी उस जगह नहीं आना था। कुक्कू के साथ उसकी रूसी गर्लफ्रेंड डेना भी थी। 

कुक्कू - "ओए! 2 चाय, एक खस्ता बना।"

चाय वाला  - "ठीक है सर।"

कुक्कू - "....और सुन बे! अच्छी चाय ज़्यादा दूध वाली साथ में खस्ता बड़ा वाला एक्स्ट्रा चटनी के साथ।"

चाय वाला  - "अच्छा!"

इसके बाद दुकानदार खुद से बड़बड़ाया। - "क्यों? औरों से ज़्यादा पैसे दे रहे हो जो सब एक्स्ट्रा चाहिए?"

कुक्कू साहब ने बड़बड़ाहट में अपनी तौहीन सुन ली थी। तुरंत कुपोषित चाय वाले की रसीद काटने के लिए उसका कॉलर पकड़ लिया। 

"हरामखोर! उतना बोल जितना है। इतना ग़लत कमाते हो तुम लोग...."

चाय वाला - "नहीं पीनी तो मत पियो, साब! गाली क्यों दे रहे हो? किसी भी सरकारी या प्राइवेट दफ्तर में चले जाओ....पूरी दुनिया ही ग़लत कमा रही है।"

कुछ हिन्दी और हाव-भाव समझ रही डेना ने कुक्कू से पूरी बात समझनी चाही। जब कुक्कू ने बात समझायी तो डेना बोली -
"चाय वाला सही तो कह रहा है। जैसा दाम, वैसा काम...या तो फिर सभी को हमारे जैसा सर्व करे या हमें सबके जैसी चाय और खस्ता परोसे।"

कुक्कू झुंझला कर बोला - "नहीं बेबी, तुम समझ नहीं रही हो। ऐसा यहाँ कहते हैं..."

डेना का मासूम सवाल - "क्यों कहते हैं?"

समाप्त!
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Art - Tina K.

Monday, April 13, 2015

Nyctophobia Struggle....


My entry for Red Streak Publications Fire for Fear Contest. 

                                                             Red Streak Publications
Entry #4
from meerut
डर हर किसी के जीवन का अंग है, बस उसके कारक अलग-अलग हो सकते है पर डर का अनुभवकभी ना कभी हम सभी करते है। अपने अनुभव से मैंने यह सीखा है कि डर को टाल कर हम उसे अपनी आदत में आने का और बड़ा होने का अवसर दे देते है जबकि उसका सामना कर उसको हराना उतना मुश्किल नहीं जितना हम समझते है। जीत कभी तुरंत मिल जाती है और कभी धीरे-धीरे भय को मारा जाता है।


मेरा डर अँधेरे से था। वजह तो पता नहीं पर बस यही एक बात थी जिस से मुझे बेचैनी होती थी। बचपन तो मम्मी-पापा के बीच में राजा की तरह सोकर कट गया पर टीनएजर होने पर बड़े भैया और दीदी के अलग शहरों में जाने के बाद अपना कमरा मिला तो रात में लाइट ऑफ करना मेरे लिए एक संघर्ष बन गया। जैसा मैंने कहा कि इसका कारण मुझे याद नहीं पर अवचेतन मन में शायद कोई बचपन में सुनी कहानी घर कर गयी थी या मैंने खुद ही कोई अनजान अनुभव गढ़ लिया था। धीरे-धीरे घरवालो ने इस आदत के लिए टोकना शुरू किया पर हमेशा मेरे पास कुछ ना कुछ बहाने रहते थे लाइट जली छोड़ने के। शायद समय के साथ मेरे पिता जी जान चुके थे पर मुझे बुरा ना लगे इसलिए उन्होंने कभी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया इस बात पर मेरे बड़े होने के बाद भी।

यह भय केवल अंधकार का नहीं था बल्कि उसमे गढ़ी अज्ञात बातों, काल्पनिक भूत-प्रेतों, जीवों का भी भय था। जब भी लाइट ऑफ कर सोने की कोशिश करता तो ऐसा लगता जैसे कोई कमरे में बैठा मुझे देख रहा है। उस ओर पीठ कर सोने को होता तो लगता कि वह और पास आ गया है। वैसे अंधेरे में कहीं बाहर टहलने में, किसी अँधेरी जगह जाने में यह डर शायद इसलिए नहीं लगता था क्योकि मन को गाड़ियों-लोगो कि आवाज़ों से यह तस्सली रहती थी कि आस-पास कोई है और कुछ अनहोनी होने पर मैं दौड़ कर उनके पास पहुँच सकता हूँ। पर रात को ना लोगो कि आवाज़े रहती और ना ही मैं परिवार के सदस्यों को परेशान करना चाहता था इसलिए चाहे-अनचाहे मुझे अपने कमरे में मुझे घूरते अनजान जीवों के साथ रहना पड़ता।

इन्वर्टर आम होने के ज़माने से पहले लाइट जाने पर रात में अगर मेरी नींद खुलती तो 15-20 मिनट्स तक करवटें बदलने तक अगर लाइट वापस नहीं आती तो मुझे बरामदे में टहलना पड़ता जहाँ दूर की स्ट्रीट लाइट्स से, घरों से थोड़ी बहुत रौशनी रहती थी। वैसे तो टोर्च भी थी पर घुप्प अँधेरे में टोर्च की रौशनी घरवालो का ध्यान खींच सकती थी और उसे किसी तरह ढकने या एंगल बदलने पर फायदा ना होता। पूरी कोशिश रहती थी की मेरे परिवार पर यह बात ज़ाहिर ना हो इसलिए रात में कम से कम हरकते करता था। एक बार तो सरकारी मकान में अपने कमरे कि खिड़की के कोने में अच्छा-खासा छेद कर दिया जिस से लाइट जाने पर भी दूर अलग फेज़ की स्ट्रीट लाइट की बीम से कमरे में थोड़ा उजाला रहे।

समय के साथ चीज़ें बदली पर यह आदत जैसे मेरे रूटीन में आ गयी। अगर मैं कहीं किसी के यहाँ कुछ दिनों के लिए बाहर जाता या किसी फंक्शन आदि वजह से कोई मेरे कमरे में सोता तब मुझे ऐसा कोई डर नहीं लगता था। पर यह बात 25 साल के हो जाने के बाद भी जारी रहने पर मुझे परेशान करने लगी। जब भी मैं लाइट बंद कर सोने की कोशिश करता तो कुछ ही देर में इतनी बेचैनी हो जाती कि उठकर स्विच ऑन करना पड़ता। अब खुद पर गुस्सा बढ़ने लगा था। पहले तो 6 फ़ीट से ऊपर अपने शरीर को देख कर लगता था कि ऐसा क्यों करता हूँ मैं, फ़िर इस बात को बचपन से अब तक घसीटते जाने पर। एक यह सोचने पर हँसी और रोष दोनों आते थे कि बचपन से अब तक मैं कितनी लाइट वेस्ट कर चुका हूँ इस डर के चक्कर में।

समस्या पर गौर करने पर मैंने पाया कि अब तक मैं सिर्फ इसको अनदेखा कर रहा था, टालते हुए बच रहा था पर असल में मैंने कभी इसका सामना तो किया ही नहीं। सबसे पहले तो मैंने पाया की मेरा शरीर और मेरी आँखें रात में रौशनी की इतनी अभ्यस्त हो चुकी थी कि उजाला कम या बंद होने पर अपने आप मेरी नींद टूट जाती थी, शायद तभी कहते है कि बहुत लम्बे समय तक बुरी आदत के साथ रहने पर उस से पीछा छुड़ाना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है। फिर मैंने अपने कमरे में रात के लिए अलग से ज़ीरो वॉट का बल्ब लगाया और कुछ हफ्ते उसमे सोया। जब मुझे कुछ अंतर महसूस हुआ तो समय था डर से सीधे उसके इलाके में युद्ध करने का। मैंने एक रात वह बल्ब भी ऑफ कर दिया पर पूरी रात सो नहीं पाया, पसीने से लथपथ बेचैनी का यह सिलसिला कुछ दिनों तक चला। फिर मैंने ध्यान बटाऊ टैक्टिक्स सोचे जैसे सोने से पहले खुद को अलग-अलग विचारों में डुबा देना, एक्सरसाइज से बहुत थका लेना, भगवान जी का स्मरण करते रहना, म्यूजिक सुनना आदि जिस से फायदा हुआ पर लगा कि यह भी भय को टालना हुआ, उसका सामना करने के बजाए।

अब मैंने बिना सहारे के सीधा मुकाबला करने की ठानी। मैं कमरे में हर उस तरफ उन काल्पनिक आँखों में देखता रहता जब तक मुझे नींद नहीं आती। अंतर लग रहा था, मैं बेहतर महसूस कर रहा था। कुछ दिन बाद अपने रूटीन में मैंने बिस्तर से तुरंत उठ कर कमरे के उन कोनो, जगहों पर जाकर घूरना शुरू कर दिया जहाँ मुझे लगता कोई मुझे बैठा/खड़ा घूर रहा है। इस बात कि घूरने वाले/वाली को शायद आदत नहीं थी, अब मैं भी अंधेरे के उन काल्पनिक लोगो को वैसे ही परेशान कर रहा था जैसे होश संभालने के बाद से अब तक उन्होंने मेरी नींद हराम कि थी (और मेरे पापा का बिजली का बिल बढ़वाया था)। आखिरकार मैंने इस डर को खुद से अलग कर लिया था और जैसे एक भ्रम को राख कर मन से एक भारी बोझ कम कर लिया। मैं चैन से सोने के लिए अब उजाले पर निर्भर नहीं। अब कभी कभी वह घूरने वाला कमरे मे आता है तो उस तरफ मुस्कुरा कर आराम से सो जाता हूँ।

- Mohit Sharma (Trendster) from Meerut, U.P. #fireforfear