अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Friday, September 11, 2026

The Professor Sahab...

पुस्तक - The प्रोफेसर साहब
लेखिका - श्रीयांशी चौबे
संपादक - मोहित शर्मा ज़हन
प्रकाशक - FlyDreams Publications

 कहानी कॉलेज लाइफ, दोस्ती, पसंद और रिश्तों के बीच आगे बढ़ती है। कहानी की शुरुआत सृष्टि के कॉलेज में आने और प्रोफेसर राघव से मिलने से होती है। धीरे-धीरे राघव का असर सृष्टि पर पड़ने लगता है और कहानी उनके रिश्ते के साथ कई नए पहलुओं को सामने लाती है।


किताब को पाठकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। मेरे लिए भी अच्छा लगता है कि जिस किताब के संपादन का हिस्सा रहा, उसे पढ़कर लोग अपनी राय साझा कर रहे हैं। उम्मीद है The Professor Sahab आगे भी और पाठकों तक पहुँचेगी।



Friday, August 14, 2026

मासूम आवाज़ों में आज़ादी का जश्न...स्वतंत्रता दिवस!

 

पता नहीं कौन सिरफिरे आपकी शहादत के किस्से पढ़ा करते हैं, 100 साल बाद भी आप भारत के बच्चे-बच्चे में जिया करते हैं.... जय हिंद! इंक़लाब ज़िंदाबाद!

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जब स्वतंत्रता दिवस पर बच्चों को स्कूल से किसी स्वतंत्रता सेनानी का रूप बनकर आने को कहा जाता है, तो सच कहूँ, बच्चों से ज़्यादा मैं खुद उत्साहित हो जाता हूँ। उनकी मासूम आँखों में देश के लिए गर्व और उनकी टूटी-फूटी ज़ुबान में स्वतंत्रता सेनानियों के नारे सुनकर मन खुश हो जाता है। विभव आज शहीद भगत सिंह जी बने हैं। शायद यही वो छोटी-छोटी चीज़ें हैं, जो हमारी अगली पीढ़ी को हमारे इतिहास और हमारे संघर्षों से जोड़ती हैं। हमारे देश ने आज़ादी के बाद कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन हमारे सामने आज भी कई चुनौतियाँ हैं। बेहतर भारत की ओर बढ़ने का यह सफ़र और संघर्ष यूँ ही आगे बढ़ता रहे।

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

जय हिंद!

#ज़हन

Wednesday, October 15, 2025

Voices, Stories, and Passion – The Spirit of Kitaabein Zara Hatke Utsav | Fly Dreams Publication


At the Kitaabein Zara Hatke Utsav, Somya and his team stood out for their passion and dedication. With remarkable patience and sincerity, Somya conducted insightful interviews with several writers and poets, beautifully capturing the spirit of the festival through his coverage. His efforts, along with his team’s hard work behind the scenes, are truly commendable and deserving of appreciation.

This video also features my interview (and my latest works).

Monday, April 21, 2025

Show Update #1 (April 2025)

Show crossed 5 Million Plays!

Show Team - Apurva Anitya, Pankaj Pammu, Mohit Sharma, Abhivyanjana Pandey, Abhishek Singh.

Story summary - Insaani Dragon follows the journey of Neel, a seemingly ordinary young man who discovers he is connected to an ancient power source tied to mystical dragons and dark sorcery. When a magical gem becomes the key to unlocking devastating powers, Neel is thrust into a dangerous world of hidden truths, conspiracies, and battles between good and evil. The series is a blend of action, fantasy, psychological conflict, and hero's journey, as Neel struggles to balance his humanity with the dragon energy inside him.

The core conflict revolves around Neel's destiny as a protector of the gem while navigating trust issues, especially with Sherry, a mysterious girl with her own dark secrets. The shadow of the antagonist Tantrik, a master of dark arts, looms large as he seeks to capture the gem and awaken a monstrous force. As Neel grows stronger, he must decide what kind of hero he truly wants to become.

MAIN CHARACTERS

Neel

  • Protagonist, the "Insaani Dragon"

  • Kind-hearted but impulsive

  • Struggles between his human emotions and the destructive dragon energy within

  • Chosen protector of the magical gem

Sherry

  • Mysterious girl, sometimes ally, sometimes suspicious

  • Holds knowledge about the gem and dragons

  • Has emotional conflict between duty and her desire for a normal life

  • Possible romantic tension with Neel

Karan

  • Neel’s friend and occasional rival

  • Brave but reckless, often questions Neel’s choices

  • Provides comic relief but plays a crucial role in fights

Manya

  • A skilled warrior, strict and disciplined

  • Trains Neel, believes in strategy over emotions

  • Protective towards the group but hides her own painful past

Tantrik (The Dark Sorcerer)

  • Main antagonist

  • Master of black magic and necromancy

  • Wants to harness the gem’s power to awaken an ancient destructive beast

  • Manipulates others using illusions and mind control

Sherry’s Parents (The Lost Guardians)

  • Former protectors of the gem

  • Their mysterious disappearance is linked to Tantrik

  • Pieces of their story are revealed gradually

MAJOR SUBPLOTS

  1. Neel’s Power Progression / Self-Discovery Arc

    • Learning to control his dragon energy

    • Facing inner rage and emotional breakdowns

    • Discovering new forms and abilities through training with Manya

  2. Trust & Betrayal Between Neel and Sherry

    • Is Sherry truly on Neel’s side?

    • Secrets about her family’s connection to the gem

    • Moments of doubt and emotional conflict between them

  3. Karan and Manya’s Side Missions

    • Undertake dangerous missions to retrieve ancient relics

    • Manya’s past revealed through these journeys

    • Karan proving his worth beyond being the sidekick

  4. Tantrik’s Mind Games and Psychological Warfare

    • Use of illusions to trap Neel and the group

    • Psychological attacks to break Neel’s spirit

    • Turning Neel’s dragon side against him

  5. The Mystery of the Gem’s Origin

    • History of the gem linked to ancient dragons and guardians

    • Why the gem chooses Neel as its protector

    • Flashbacks to the battles of past guardians

  6. The Final Awakening: Ancient Beast Threat

    • Tantrik's ultimate plan to awaken an ancient beast of destruction

    • Climactic battle where Neel must fully embrace both his human and dragon sides

    • Sherry’s crucial choice that could save or destroy everything

Thursday, February 15, 2024

कलाकार अभिषेक सिंह से छोटी सी मुलाक़ात

पुस्तक मेले 2024 में एक किताब के विमोचन में जाना था कि तभी एक बड़े कैनवास पर व्यस्त एक कलाकार को देखा। वह आर्ट स्टाइल और कद-काठी जान पहचानी लगी और मैं कार्यक्रम का मोह छोड़ कर तुरंत उस तरफ बढ़ गया। यहां Abhishek Singh जी तल्लीनता से अपनी कला में किरदार निभा रहे कछुए की आँखों में जादू भर रहे थे। सबसे पहले तो मैंने भीड़ में से ही उनकी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल खोलकर यह दिखाया कि मैं आपकी फ़्रेंडलिस्ट में हूं। अभिषेक भाई मुस्कुराए, फिर कुछ देर बातें हुई और समय का पता ही नहीं चला। वापस लौटने की बात कहकर कार्यक्रम की ओर बढ़ गया, वो और बात है कि फिर लौट नहीं पाया... 

#phirkabhisahi #art #AbhishekSingh #worldbookfair2024

Sunday, March 5, 2023

World Book Fair 2023 - Random Thoughts #funny

अच्छा, तो पुस्तक मेले में एक और परिचित की स्टाल लगी है। लेकिन उनकी स्टाल तो भीड़ के बीच पौने दो किलोमीटर दूर है...छोड़ो इतनी भी जान पहचान नहीं है।

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अंतिम घंटे में, "चाय-चाय...चाय लेंगे सर?"

सर - "ये अपने पैर कितने के दिए?"

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किताबों के बारगेन में जो पैसा बचाया था वो तो यहां के छोले भटूरे और पानी में चला गया। ये कैसा थेनोसपन है?

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ये कैसा पाठक है, ये मेरी किताब क्यों खरीद रहा है।

"आपकी अगली किताब कब आएगी, मोहित जी?"

Mit Gupta - "इनकी? नहीं आएगी!"

"लेकिन इनके साझा संकलन फलाना तो आते रहते हैं।"

मिथिलेश गुप्ता - "वो साझा नहीं, पाठकों को इनका झांसा होता है।"

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3 प्रशंसक आए हैं, एक की कसकर झप्पी ले ली, दूसरे को साइड हग किया। तीसरे को बस थपकी दे दी। इनकी गलती है! ये अलग से एक एक करके मिलने क्यों नहीं आते? दो प्रशंसक खो दिए मैंने!

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"भगवान, ऐसा कुछ कर दो कि मेरे पैर का दर्द चला जाए।"

*मधुमक्खी ने काट लिया।*

"हां, अब ठीक है।"

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"आप साहित्य विमर्श में भी हैं ना?"

"हूं तो नहीं, लेकिन उनसे इस विषय पर विमर्श चल रहा है।"

"विकास नैनवाल जी स्टेरॉइड्स लेते हैं ना?"

"हां! खुद सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' ने मुझे बताया था।"

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"अरे इधर आओ, कोई पानी लाओ!

सत्य व्यास जी...को लगी है प्यास।"

"वाह! आप तो अच्छे कवि हैं, मोहित सर।"

"तो क्या आप मेरा काव्य संग्रह छापेंगे?"

"नहीं!"

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"कैसे हो मोहित?"

"भैया, आप मोहित हो मैं अभिराज हूं।"

"हां तो ऐसे इवेंट्स में सुबह-दोपहर मिल लिया करो। शाम को मैं...मैं नहीं रहता!"

"मैं कहां मिलने आया था भैया, आप ही..."

"शटअप मोहित!"

...

Saturday, February 27, 2021

पीएचडी वाले डॉक्टर (लघुकथा)

 

वर्ष 1998

वैसे तो संदीप जी की किराना दुकान थी, पर वे दुकान के बाहर भी बड़े जुगाड़ू इंसान थे। खुद का पढ़ने में मन कभी लगा नहीं, इसलिए 10वीं के बाद दुकान पर बैठ गए, लेकिन समय के साथ पास ही हाईवे पर बने विश्वविद्यालय में उनकी अच्छी जान पहचान हो गई थी। अब दुकान के साथ-साथ उन्होंने उस विश्वविद्यालय में छात्रों के एडमिशन पर कमीशन लेने का काम शुरू किया। कुछ सालों बाद, अच्छे संपर्कों और कुछ घूस के साथ संदीप ने अपनी औसत बुद्धि धर्मपत्नी को डॉक्टरेट की उपाधि दिलवा दी। इस उपलब्धि से उत्साहित होकर उन्होंने अपनी साली, बहन, जीजा को भी पीएचडी धारक बनवा दिया। इन डॉक्टरेट डिग्री के बल पर इन "डॉ" को शिक्षा, अनुसंधान से जुड़े सरकारी विभागों में नौकरी मिल गई। इस तरह संदीप ने कई जानने वालों को फर्ज़ी सम्मान और नौकरियां दिलवाने में मदद की। 

वर्ष 2021

संदीप की 30 साल की बेटी, हेमा का किसी काम में मन नहीं लगता था। ऊपर से वह भी औसत बुद्धि। अब पुराना ज़माना जा चुका था। वर्तमान में, पीएचडी करने के लिए कड़े नियम लागू थे और इस डिग्री में चयन से लेकर अंतिम शोध लिखने की प्रक्रिया इतनी आसान नहीं थी कि कोई भी डॉक्टरेट की उपाधि पा ले। इतना ही नहीं, उस विश्वविद्यालय पर भी ऐसे मामलों में कुछ जांच चल रही थीं। संदीप के संपर्कों ने अब जो इक्का-दुक्का जगह उपलब्ध बिकाऊ पीएचडी का दाम बताया वो आम इंसान की पहुंच से बाहर था। फिर इतने पैसे देने के बाद भी मेहनत और समय लगना ही था...जो संदीप को सिस्टम की बेईमानी लगता था। 

एक दिन किसी शुभचिंतक ने संदीप की दुखती रग पर हाथ रख दिया। 

"आपके परिवार में इतने पीएचडी वाले डॉक्टर हैं, बिटिया को भी कहिए...कुछ देखे इसमें।"

संदीप ने मन ही मन पहले हालात और फिर शुभचिंतक को गाली देकर लंबी सांस ली...और कहा -

"आजकल के बच्चों में...वह पहले जैसी बात कहाँ?"

समाप्त!

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#ज़हन

Friday, November 22, 2019

अनुवाद कार्य

एक ऑडियो ऐप्लिकेशन और साइट के लिए कुछ अनुवाद का काम किया। एक चीनी उपन्यास के शुरुआती अध्यायों का हिंदी अनुवाद। अच्छा अनुभव रहा! श्रोताओं की प्रतिक्रिया के आधार पर इस कहानी या दूसरे उपन्यासों की कहानी का आगे का अनुवाद किया जाएगा।

Thursday, October 10, 2019

Third Issue - Junction Planet


एक और अच्छा प्रयास! अप्रकाशित पगली सीरीज के विज्ञापन और मेरी कुछ पंक्तियाँ (Page - 73, 74) जंक्शन प्लैनेट मैगज़ीन (कॉमिक्स जंक्शन) के इस अंक में शामिल की गई हैं। आभार!

Saturday, July 13, 2019

अभिमान से अपमान (बाल कथा) - अनुभव पत्रिका जुलाई 2019 में प्रकाशित


सलोना भालू फुलवारी वन का एक प्रतिभावान खिलाड़ी था। किशोरावस्था में ही वह अपनी उम्र से बड़े और अनुभवी खिलाडियों को नाकों चने चबवा देता था। जल्द ही उसका नाम फुलवारी वन और उसके आस-पास के इलाकों में भी फ़ैल गया। केवल एक खेल नहीं बल्कि भाला फेंक, शॉट पुट, 400/800 मीटर दौड़ और तेज़ चाल में वह कमाल का प्रदर्शन करता था। स्थानीय व अंतर-जंगलीय प्रतियोगिताओं में सलोना शीर्ष पदक जीतने लगा। आगामी प्रतियोगिता जंगलों के सबसे बड़ी, सम्मान वाली प्रतियोगिता थी। इसका नाम था जंगल ओलम्पिक। सलोना भालू का यह पहला ओलम्पिक था। वह कई महीनों पहले से गंभीर तैयारी में जुट गया। खेलों का आयोजन पुष्पपुर जंगल कर रहा था। लंबी यात्रा कर वहाँ पहुँचे सलोना को पुष्पपुर की दृष्टि की सीमा से विस्तृत फूलों की वादियों ने मोहित कर लिया। कम समय में सलोना बहुत से वन क्षेत्रों की यात्रा कर चुका था और अलग-अलग प्रजातियों के जानवरों से मिल चुका था। हर तरफ अपने कौशल की तारीफ़ सुनकर सलोना में दंभ भर गया था। 

एकसाथ 4 खेलों में अपने जंगल का प्रतिनिधित्व करने वाला सलोना अकेला एथलीट था। अपनी जीत को लेकर वह इतना आश्वस्त था कि उसने अभ्यास छोड़ पुष्पपुर जंगल में विचरण और प्रतिष्ठित जानवरों के साथ उठना-बैठना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं अपने अभिमान में वह अभ्यास कर रहे जानवरों का मज़ाक भी उड़ाता था। जब फुलवारी जंगल के अन्य खिलाडियों और प्रशिक्षक ने सलोना को समझाने की कोशिश की तो उसने उल्टा उन्हें अपना प्रदर्शन उसके बराबर लाने की चुनौती दे दी। इतने पदक जीत चुके सलोना को अधिक टोकने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी। अगले सप्ताह खेल शुरू हुए और एक के बाद एक प्रतिस्पर्धा में सलोना भालू को हार मिलने लगी। शुरुआत में 800 मीटर दौड़ में कांस्य भी न मिला, उसके बाद शॉट पुट, भाला फेंक में भी सलोना प्रथम 5 स्थान में जगह नहीं बना पाया। पहले पहल भाग्य को दोष दे रहा सलोना अब अपनी 4 में से 3 प्रतिस्पर्धाओं में बिना पदक रह गया था। अंत में 20 किलोमीटर तेज़ चाल  प्रतिस्पर्धा में उतरते हुए सलोना में पहले का दंभ हार के डर में बदल गया था। परिणाम सबकी आशा अनुरूप ही था। सीमित तैयारी, बिगड़ी लय और खोये आत्मविश्वास के साथ सलोना ये प्रतिस्पर्धा भी हार गया। उस रात गुस्से में खिलाडियों, निर्णायकों और सहायक स्टाफ के लिए बने खेल गाँव में सलोना भालू ने खूब तोड़-फोड़ मचायी। उपद्रव मचाते हुए उसके वीडियो समाचारों की सुर्खियां बन गये। फुलवारी वन ने इस बार पदक तालिका में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया लेकिन जंगल की इस उपलब्धि को सलोना के हुड़दंग से हुई बदनामी ने फीका कर दिया। सलोना को अपनी भूल पर पछतावा देर से हुआ। फुलवारी जंगल खेल संघ ने सलोना के ऊपर स्थानीय या अंतर-जंगलीय किसी भी खेल खेलने पर 5 वर्ष का प्रतिबंध लगा दिया। 


प्रतिबंध की अवधि पूरी करने के बाद सलोना भालू ने ज़बरदस्त वापसी की और अपने जंगल के लिए कई पदक अर्जित किये। हालांकि, सलोना को अक्सर एक मलाल रहता है। अपनी भूल के कारण उसने एक खिलाडी के रूप में अपने उत्कृष्ट वर्ष (जिनमें वह शारीरिक, मानसिक रूप से अपने चरम पर था) गँवा दिये, साथ ही इतने बड़े मंच पर अपने जंगल का नाम ख़राब किया।

समाप्त!

सीख - छोटी उपलब्धियों से दंभ में आकर जीवन के बड़े लक्ष्यों से भटकना नहीं चाहिए और अपने क्षेत्र के अनुभवी लोगों की सलाह को कभी अनसुना नहीं करना चाहिए। 

Cover page

Monday, April 22, 2019

कौवों का हमला Rap #ज़हन

Wrote a promo rap for Ajay Kumar's book

कांव कांव - धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

सुन ले पक्की वार्निंग 
नहीं है ये कोई जुमला 
तेरी ऐसी तैसी करने प्रेज़ेंटिंग...
कौवों का हमला!
आजा तेरी एसयूवी का घमंड तोड़ दूँ,
बोनट पर अपनी बीट निचोड़ दूँ
कांव कांव - धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

अपुन की तेज़ नज़र, 
रखे हर बात की खबर,
साइज अपना छोटा...
पर दिल से गब्बर!
कैच मी इफ यू कैन,
उड़ा मैं फर्र-फर्र... 
कांव कांव - धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

कहे काग को चालू,
ये साला होमो सेपियन मक्खीचूस,
खुद गधे की शक्ल वाला,
मुझे कहे मनहूस!
कांव कांव - धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

चिल करते ब्रोज़ को हुर्र हुररर कहके उड़ाये,
पितृ पक्ष में पूड़ी लेकर पीछे भागा आये। 
क्रो गैंग से पंगा मत ले...
अपनी चोंच से जाने कितने टकले सुजाये। 
कांव कांव - धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

तोड़ेगा तेरी ईगो का गमला,
फ्रेश रापचिक कौवों का हमला। 
तो सारे बोलो... 
कांव कांव - धाँय धाँय,
इंसानों की हाय हाय!

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- मोहित शर्मा ज़हन

Friday, January 18, 2019

Hindi Tongue Twister


Short - "चुकंदर खाकर सुंदर छछूंदर के अंदर हुआ भगन्दर।"

Long - चुकंदर खाकर सिकंदर नामक सुंदर से छछूंदर के पेट के अंदर मचे बवंडर से उसे हुआ भगन्‍दर। 

#ज़हन

Friday, August 3, 2018

कौवों का हमला Novel credits


यह अजय जी का बडप्पन है कि उन्होंने मेरी छोटी सी मदद पर आभार व्यक्त किया। उनकी पुस्तक "कौवों का हमला" अमेज़न किंडल पर उपलब्ध है। (Book Link) वैसे किताब बच्चों के लिए है पर इसकी कहानी का रस हर आयु वर्ग के पाठक को भायेगा। शुभकामनाएं!


Wednesday, May 30, 2018

क्यों कहते हैं? (लघुकथा) #ज़हन


चाय की दुकान पर नये-पुराने ग्राहकों के बीच एक ऐसा ग्राहक कुक्कू जिसे दोबारा कभी उस जगह नहीं आना था। कुक्कू के साथ उसकी रूसी गर्लफ्रेंड डेना भी थी। 

कुक्कू - "ओए! 2 चाय, एक खस्ता बना।"

चाय वाला  - "ठीक है सर।"

कुक्कू - "....और सुन बे! अच्छी चाय ज़्यादा दूध वाली साथ में खस्ता बड़ा वाला एक्स्ट्रा चटनी के साथ।"

चाय वाला  - "अच्छा!"

इसके बाद दुकानदार खुद से बड़बड़ाया। - "क्यों? औरों से ज़्यादा पैसे दे रहे हो जो सब एक्स्ट्रा चाहिए?"

कुक्कू साहब ने बड़बड़ाहट में अपनी तौहीन सुन ली थी। तुरंत कुपोषित चाय वाले की रसीद काटने के लिए उसका कॉलर पकड़ लिया। 

"हरामखोर! उतना बोल जितना है। इतना ग़लत कमाते हो तुम लोग...."

चाय वाला - "नहीं पीनी तो मत पियो, साब! गाली क्यों दे रहे हो? किसी भी सरकारी या प्राइवेट दफ्तर में चले जाओ....पूरी दुनिया ही ग़लत कमा रही है।"

कुछ हिन्दी और हाव-भाव समझ रही डेना ने कुक्कू से पूरी बात समझनी चाही। जब कुक्कू ने बात समझायी तो डेना बोली -
"चाय वाला सही तो कह रहा है। जैसा दाम, वैसा काम...या तो फिर सभी को हमारे जैसा सर्व करे या हमें सबके जैसी चाय और खस्ता परोसे।"

कुक्कू झुंझला कर बोला - "नहीं बेबी, तुम समझ नहीं रही हो। ऐसा यहाँ कहते हैं..."

डेना का मासूम सवाल - "क्यों कहते हैं?"

समाप्त!
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Art - Tina K.

Saturday, April 7, 2018

तन-मन का वहम (कहानी) #ज़हन

Art - Azika H.

एक अंधेरे गलियारे में विजय बेचैनी से घूम रहा था। दूर अपनी पत्नी जीवा की परछाई देख उसकी उलझन कुछ कम हुई। 
"बड़ी देर लगा दी इस बार?"

जीवा - "हाँ, अमीर लोगों में रिश्तेदार तो कम होते हैं पर उनके चेले-चपाटो की भीड़ इतनी रहती है कि समय लग गया।"

जीवा अपनी पहचान बदल कर एक निजी अस्पताल से जुड़वाँ बच्चे चोरी कर लायी थी। दोनों की अपेक्षा से उलट काम जल्दी और आसानी से हो गया। कुछ दिन शांत रहने के बाद डीलर से एकसाथ दो बच्चों का बढ़िया दाम मिलने की उम्मीद थी। 

उसी रात जीवा ने विजय को जगाया। 

"सुनो मेरा मन कुछ अजीब सा हो रहा है। तबियत ख़राब लग रही है। तुम्हे पूरे शरीर में खुजली नहीं हो रही?"

विजय - "हाँ, हरारत सी तो लग रही है। मैं तुझसे पूछने ही वाला था।"

जीवा ने संकोच से पूछा - "कहीं किसी ने बददुआ तो नहीं दे दी? कोई छाया-प्रेत ना छोड़ दिया हो..."

विजय - "हाँ! 2 दर्जन बच्चे उठाने के बाद तो जैसे तुझे बड़ी दुआएं मिली होंगी। शायद मौसम बदलने का असर होगा। अभी गोली ले लेते हैं...सुबह देखेंगे।"

सुबह दोनों के हाल ख़राब हो गये थे। जगह-जगह चकत्ते पड़ गये थे, तेज़ बुखार और हरी-नीली नसें बाहर आने को थी।

जीवा - "देखो मैंने कहा था ये किसी ऊपरी आत्मा का प्रकोप है। दोनों बच्चे एकदम ठीक हैं। अभी भी समय है, हम बच्चे लौटाकर माफ़ी मांग आते हैं।"

हर पल बिगड़ती हालत में विजय और जीवा को यही सबसे सही उपाय लगा। बच्चा चोर व्यापार चैन के दोनों मज़दूर, बच्चों को लेकर अस्पताल गये। जल्द ही पुलिस के साथ बच्चों के घरवाले आ गये। जीवा और विजय बच्चों के अभिभावकों से अपने कर्मों की माफ़ी मांगने लगे और खुद से ऊपरी छाया हटाने की विनती करने लगे। तब हवलदार ने उन्हें बताया - "तुमपर कोई प्रेत-व्रत नहीं है। यह युगल अफ्रीका के देश घाना से लौटा हैं। जहाँ से लौटते हुए इन्हे वहाँ फैल रहा रोटोला रोग हो गया है। स्त्री के गर्भवती होने, शुरुआती लक्षण गंभीर होने के कारण दंपत्ति इस अस्पताल में भर्ती हो गया और संयोग से उसी दिन ये दो बच्चे हो गये। माँ से यह संक्रमण बच्चों में आ गया। अगले दिन रोटोला के सही इलाज के लिए इन्हे शहर के बड़े हॉस्पिटल भेजा जाना था कि उस से पहले ही तुमने बच्चे उठा लिये।"

विजय ने अपनी चुसी हुई काया की शक्ति जुटाकर पूछा - "...तो ये बच्चे कैसे ठीक थे?"

हवलदार - "ठीक नहीं थे, उनपर दवाई की भारी डोज़ का असर था इसलिए पूरे लक्षण पता नहीं चल रहे थे।"

 वैसे गलती दोनों की थी पर खीजते विजय का मन जीवा को थप्पड़ मारने का था...उसमें अब शक्ति कहाँ थी।

समाप्त!
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Tuesday, December 12, 2017

सामाजिक समस्याओं में अंतर (लेख)

Art - Mari Bobghiashvili‎
समस्या जीवन का अभिन्न अंग है। कुछ पाना है, कुछ करना है...सांस तक लेते रहना है तो भी कोई ना कोई समस्या मुँह बाये तैयार रहती है। हाँ, वीडियो गेम के लेवल की तरह कोई समस्या आसानी से निपट जाती है और कोई समस्या कितने ही संसाधन और समय व्यर्थ करवाती है। कुछ बड़ी समस्याएं जटिल होती हैं और सामाजिक परतों में अंदर तक फैली होती हैं। इन समस्याओं में ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपराध, भेदभाव, बाल शोषण, अशिक्षा, ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण आदि शामिल हैं। बचपन से इन समस्याओं के बारे में पढ़ाया जाता है और हर रोज़ इनसे जुड़े पहलुओं पर दुनियाभर में ख़बरें, वार्ता होती रहती हैं। एक समय बाद समाज इन समस्याओं का इतना अभ्यस्त हो जाता है कि अगर कोई बड़ी खबर ना हो तो इनकी तरफ ध्यान नहीं जाता। ये बातें सामने होकर भी अनदेखी सी होने लगती हैं। सरकार और लोगो की जागरूकता से स्थिति बेहतर हो सकती है पर पूरी तरह ठीक होना असंभव है। वहीं दूसरी तरफ कुछ मुद्दे छोटे स्तर, छोटे क्षेत्र-लोगों और कम समय वाले होते हैं। 

कुछ नये को सामान्य से बहुत अधिक प्रतिक्रिया मिलती है इसलिए आम जनता और सभी तरह का मीडिया 1 दिन, 2 दिन या कुछ हफ़्तों तक उस खबर को प्राथमिकता से देखते-दिखाते हैं। इसी क्रम में कभी-कभार किसी घटना पर जनता के बड़े हिस्से की नकारात्मक प्रतिक्रिया आती है और देश-दुनियाभर में प्रदर्शन, मांगें, विरोध और यहाँ तक की हिंसा भी हो जाती है। किसी के लिए छोटी सी बात किसी अन्य समूह के लिए उनकी पहचान पर सवाल या अपमान की तरह देखी जाती है। अगर ध्यान दें तो ये "छोटी" बातें उन बड़े मुद्दों का ही वेरिएशन होती हैं जो हम अनदेखा कर देते हैं। ये कुछ ऐसा है जैसे किसी फिल्म की थीम प्रेम कहानी, एक्शन, एनिमेशन या यात्रा वृतांत हो सकती है पर दर्शक उस फिल्म को इन थीम के वेरिएशन के लिए देखने जाते हैं यानी इस प्रेम कहानी में क्या नया हुआ, नयी कलाकार मण्डली कैसे साथ आयी। नयी चीज़ का "नॉवल्टी" होना कुछ समय के लिए जिज्ञासा जगाता है और जब लोग बात से ऊब जाते हैं तो उसकी जगह ताज़ी बातें ले लेती हैं। 

ऊपर समझाया गया संदर्भ बिना जाने, एक बात लोग अक्सर कहते हैं कि देश में जघन्य अपराध, ग़रीबी जैसे मुद्दों पर तो कुछ नहीं होता! उनपर किसी को कोई धरना, विरोध प्रदर्शन आदि नहीं करते नहीं देखा...पर देखो इन नासमझ लोगों को जो छोटी बात या ज़रा से स्थानीय मुद्दे पर तिल का ताड़ बना रहे हैं। पहली बात, बिना उस पक्ष की पूरी बात जाने एकतरफा नरेटिव पर कभी प्रतिक्रिया ना दें। मानव के सामने चुनौती रहे हज़ारों-लाखों वर्षों वाले मुद्दों की तुलना 4-6 दिन की अस्थाई बात से ना करें। ये एक दुखद सच्चाई है कि अन्याय, बुराई कम किये जा सकते हैं पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सकते। कितनी आसानी से कह दिया "कोई कुछ नहीं करता!" जिन बड़ी समस्याओं की आप बात कर रहे हैं देश-दुनिया में अनगिनत स्कूलों, विश्वविद्यालयों में उनपर अलग से सर्टिफिकेट, डिग्री पाठ्यक्रम तक पढ़ाये जाते हैं। रोज़ जगह-जगह हज़ारों जागरूकता एवम मदद प्रोग्राम, सेमिनार, कैंपेन आयोजित किये जाते हैं। कितने ही सरकारी विभाग, निजी संस्थाएं उन समस्याओं पर अनुसंधान और उनके निवारण (उन्हें कम करना बेहतर शब्द होगा) के लिए मौजूद हैं। हाँ, मैं मानता हूँ कि लोगों को और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है, साथ ही विभागों, संस्थाओं की कार्यप्रणाली और कार्यान्वयन को बेहतर किया जा सकता है पर ऐसी फ़िल्मी डायलॉगबाज़ी से बचें कि कोई कुछ नहीं करता। कोई नहीं बल्कि करोड़ों लोग करते हैं इसलिए सामान्य बात नज़रों में आते हुए भी बच जाती है। वो करोड़ों लोग इस सामान्य से काम को करना छोड़ दें तो दुनिया की बैंड बज जायेगी। इस वजह से जेनेरिक (व्यापक) समस्याओं को स्पेसिफिक (छोटी पर नयापन लिए अलग) घटनाओं के बराबर रखना जायज़ नहीं है। समाज सेवा के अनेकों अवसर ठीक आपके सामने होंगे, कोसने के अलावा उन अवसरों को चुनने की हिम्मत भी रखें। 

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#ज़हन 

Friday, December 8, 2017

Ishq Baklol (Hindi Novel) Review


"इश्क़ बकलोल", नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि खुद में एक बड़ा बाज़ार बन चुकी फूहड़ता का फायदा उठाने को एक पुस्तक और लिख दी गयी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसी रोलरकॉस्टर राइड सी भारतीय परिवेश में भावनाओं की गुत्थमगुत्था है इश्क़ बकलोल। 2012 में देवेन पाण्डेय जी ने अपने अनुभवों, इनके साथ घटी बातों पर लिखना शुरू किया तब लगा कि कई शौकिया लेखकों की तरह ये कुछ समय बाद लेखन को टाटा कर देंगे। नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां संभालते हुए इन्होने लेखन जारी रखा और कम समय में काफी सुधार किया। एक दिन इनका मैसेज आया कि इन्होने एक उपन्यास लिखा है और मैं उपन्यास की इंट्रो पोएम लिखूं। उपन्यास का संक्षिप्त आईडिया जो सुना उसके अनुसार एक नज़्म भेज दी। सूरज पॉकेट बुक्स के सौजन्य से इश्क़ बकलोल अब बाजार में उपलब्ध है, जिसकी अच्छी बिक्री हो रही है। 

कवर पेज इंटरनेट से किसी स्टॉक तस्वीर को ना लेकर आकर्षक चित्रांकन रखा गया। सूरज पॉकेट बुक्स की ये पहल मुझे बढ़िया लगी। कहानी के विस्तार में ना जाकर इतना कहूँगा कि इसे रोमांटिक के बजाय एक सामाजिक उपन्यास कहना उचित होगा। भारतीय समाज के अंदर बसी विविधता को बड़ी सुंदरता से दर्शाया है। जीवन की घटनाओं - दुर्घटनाओं के बीच किस तरह हम बिना सोचे कितना कुछ कर जाते हैं (या असमंजस में कुछ नहीं करते) जिनके दूरगामी परिणाम जीवन की दिशा बदल देते हैं। कहानी के दौरान पात्रों की प्रवृत्ति -नज़रिये में आये बदलाव अच्छे लगे। अक्सर ज़बरदस्ती करैक्टर आर्क दिखाने के चक्कर में घटक जोड़ दिए जाते हैं वो यहाँ नहीं हुआ। मनोरंजन की दुनिया में मार्केटिंग जुमला बन चुके फ़र्जी देसीपन की जगह यहाँ किरदारों में असली देसीपन पढ़ने को मिला। कुछ जगह भाषा शैली, कथा के प्रवाह और दृश्य परिवर्तन में सुधार की सम्भावना है, जिसे पहले प्रयास के हिसाब से अनदेखा किया जा सकता है। ये देवेन जी का स्नेह है कि कहानी में एक किरदार मेरा भी है। मुझे पता चला कि मेरा किरदार बड़ा था पर कहानी के लिए उसे छोटा करना पड़ा (इस कारण रेटिंग में आधा अंक काट लेता हूँ....हाहा)। आशा है आगामी उपन्यास और भी धमाकेदार हो। शुभकामनाएं!

उपन्यास के संसार में देवेन पाण्डेय के पदार्पण को मैं रेट करता हूँ - 7.5/10

P.S. मुझे नहीं पता कि मैं रात के डेढ़ बजे अपनी रसोई में धूप का चश्मा लगाकर सेल्फी क्यों ले रहा हूँ।