अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...

Sunday, October 22, 2017

Updates

*) - Chosen as one of the top writer by Dawriter website. 
*) - My article about Sooraj Pocket Books and Novelist Shubhanand (Jagran Junction)
*) - Over 900 points now, Google Maps Local Guides Program
*) - DD Birthday Wish :)
*) – 6 new podcasts on lyrical comedy, noise pollution and art. – SoundCloud Profile
*) – Retired from MMO The Wrestling Game S3 World #39 (August 2017) 😦
*) – Kavya Comics series featured by Nazariya Now
*) – COP Exclusive Interview

Friday, October 13, 2017

Pages from upcoming Comics: Vacuumed Sanctity, Samaj Bhakshak...


Comic: Vacuumed Sanctity - पगली प्रकृति


Art - Abhilash Panda, Story - Mohit Trendster, Colors and Calligraphy - Shahab Khan
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Comic: Samaj Bhakshak
Art - Anand Singh, Story - Mohit Trendster, Colors - Harendra Saini
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*Untitled WIP project with Manabendra Majumder

ध्वनि प्रदूषण का घातक प्रभाव (Hindi Educational Podcast) #ज़हन

New Podcast (224 Seconds)
Also on Soundcloud and Vimeo
ध्वनि प्रदूषण के एक अनछुए पहलु से रूबरू करवाती रूबरू दुनिया की पहली ऑडियो पॉडकास्ट। जल्द ही रूबरू दुनिया एप पर आपको ऐसी कई पॉडकास्ट सुनने को मिलेंगी।
 - मोहित शर्मा ज़हन #mohitness #mohit_trendster

Friday, September 29, 2017

जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख) #ज़हन


कॉमिक्स लेखन में एक कहावत है, "विलेन भी अपनी नज़रों में हीरो होता है।" खलनायक अपनी छोटी भूल से लेकर जघन्य अपराधों तक का इतनी चपलता से स्पष्टीकरण देता है कि लगे उस स्थिति में सबसे ठीक विकल्प वही था। बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं? जवाब उस कॉमिक विलेन वाला है, 'अपनी पिक्चर में हर कोई नायक होता है।' दुनिया में ना कोई पूरी तरह अच्छा है और ना ही कोई बुराई का पुतला है। फिर भी खलनायक ढूँढने, बनाने की आदत हम सबके अंदर है। ये आदत कहाँ से जन्मी? शायद मानव मन को एक सांत्वना सी मिल जाती है और अपनी बुराइयों, कमियों से ध्यान हट जाता है। कभी-कभार परिवेश और घटनाओं के आधार पर किसी को डीमनाइज़ करना समझा जा सकता है पर जब यह आदत लोग अपने निजी जीवन के हर पहलु में लगाने लगें तो समस्याओं का जाल बन जाता है। 

*) - प्रकृति की कारस्तानी: नेचर का एक नियम होता है कि हर जैविक प्रजाति धरती पर हो रहे बदलाव के अनुसार खुद को ढालते हुए निश्चित विकास के साथ बढ़ती रहे। अब अगर सबसे विकसित दिमाग वाला प्राणी मनुष्य, बात बात पर अंतःकरण की आवाज़ सुनकर खुद पर सवाल करने लगेगा तो उस प्रजाति में अवसाद, हीन भावना आदि मानसिक समस्याओं का औसत काफी बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर मानव प्रजाति के विकास में बाधा आ सकती है। इस कारण से आम इंसान का ध्यान बँटाने के लिए प्रकृति ने उसमे ऐसा तंत्र फिट किया है कि वह दुनियाभर की बुराई को मैग्नीफाई करके खुद को दिलासा देता रहता है कि "मैं तो फिर भी बहुत ठीक हूँ बाकियों से।" इस सोच को बढ़ावा देने में मीडिया का बड़ा योगदान है जिसे किसी नैरेटिव और मसाले के लिए लगभग हर कहानी में किसी ना किसी को खलनायक बनाने का शौक है। 

*) - घटनाओं की नवीनता: ...यानी रीसेन्सी ऑफ़ इवेंट्स का मतलब किसी व्यक्ति द्वारा अपनी सुविधानुसार पास की घटनाओं के हिसाब से मन बनाना। वहीं पहले हुई घटनाएँ जो उसकी याददाश्त के कम्फर्ट जोन से बाहर हों उन्हें सोच में शामिल ना करना। यहाँ सुविधा सिर्फ कुछ याद रखने के दायरे में ही नहीं बल्कि अपने एजेंडे के हिसाब से घटनाओं को रखने और हटाने में भी है। अक्सर सोशल मीडिया पर किसी राजनैतिक बहस पर आप ऐसा देख सकते हैं। किसी असत्यापित खबर पर हम इसी अनुसार सही और गलत पक्ष का निर्णय सुना देते हैं। 

*) - निजी जीवन: बाहरी घटक तो एक बार के लिए फिर भी संभाले जा सकते हैं पर अगर कोई इंसान अपने जीवन में अहम् किरदार लिए लोगो को डीमनाइज़ करना शुरू कर दे तब वह अनजाने में अपना ही नुक्सान करने लगता है। उसके पेशे, रिश्तों पर इसका बुरा असर पड़ता है। बिना किसी ठोस आधार के अपनी कल्पनाओं के अम्बार को आग लगाकर हम अपने जीवन के रावणो को ढूँढ लेते हैं। समय के साथ ये आदत प्रबल हो जाती है पर इतनी प्रत्यक्ष होकर भी हमें दिखाई नहीं देती। 

पूछें खुद से ये सवाल - उसकी जगह मैं होता तो क्या करता? 
क्या कोई ऐसी बात तो नहीं जो मुझसे अनदेखी रह गयी? 
कहीं मैं मन में गढ़ी बातों को असल बातों में मिला तो नहीं रहा?
इस मसले पर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति की क्या राय होती?
मन के ध्यान बटाऊ टैक्टिस में फँसने के बजाय इन सवालों के ईमानदार जवाब कई मामलों में ग़लतफहमी दूर कर देंगे और शर्तिया 10 में से 8-9 बार आपकी कहानी में बिना बात कोई काल्पनिक खलनायक नहीं रहेगा। 
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Wednesday, September 6, 2017

New Hindi Quotes #मोहित_शर्मा_ज़हन


*) - अपने अनुभव, प्रतिभा और जो भी जीवन में अर्जित किया उसका मोल समझें पर आत्ममुग्धता से बचें। सामने वाले व्यक्ति को परसों पैदा हुआ ना मानें। 

*) - निष्पक्ष होना दुनिया की सबसे कठिन कला है। 

*) - किसी की सहनशीलता को उसकी कमज़ोरी मत समझें। इलास्टिक को इतना खींचने की आदत ना डालें कि वो ऐसी घड़ी में टूटे जब आपको उसकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत हो। 

*) - इतिहास कभी एक नहीं होता। इतिहास नदी की धाराओं सा इधर-उधर बह जाता है और लोग अपनी विचारधारा के हिसाब से उन धाराओं को पकड़ कर अपना-अपना इतिहास चुन लेते हैं। जो मानना है मानो पर मानने से पहले सारी धाराओं का पानी ज़रूर पीकर देखना....जिस पानी की आदत नहीं उसे पीकर शायद तबियत बिगड़ जाए पर दिमाग सही हो जाएगा। 

*) - सुरक्षित राह पर जीवन को तीन से पौने चार बनाने में बाल सफ़ेद हो जाते हैं और कोई दांव लगाकर तीन से तेईस हो जाता है। अब पौने चार से शून्य दूर होता है या  तेईस?

*) - सही, सकारात्मक और बिना किसी विचारधारा के प्रभाव में आकर किये गए सामाजिक अनुकूलन से समाज की अनेकों कुरीतियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

*) - अक्सर भूल जाने लायक छोटी जीतों के गुमान में लोग याद रखने लायक बड़ी बाज़ी हार जाते हैं। 

*) - कला के क्षेत्र में केवल यह सोचकर खुद को रोक लेना सही नहीं कि ऐसा पहले हो चुका होगा। शायद हो चुका हो....पर आपके नज़रिये और अंदाज़ से तो नहीं हुआ ना!
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#mohitness #ज़हन ##mohit_trendster

Friday, August 25, 2017

3 Million :) Thank you, everyone!


My e-books, comics, e-zines crossed 3 Million online reads/downloads on Google Play Books. Amazing response on other apps/websites Readwhere, issuu, Dailyhunt, Scribd, edocr etc. Thank you to each and every one of you for the love and support! :) #mohitness #ज़हन #mohit_trendster #freelance_talents

Tuesday, August 1, 2017

खाना ठंडा हो रहा है...(काव्य) #ज़हन


साँसों का धुआं,
कोहरा घना,
अनजान फितरत में समां सना,
फिर भी मुस्काता सपना बुना,
हक़ीक़त में घुलता एक और अरमान खो रहा है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

तेरी बेफिक्री पर बेचैन करवटें मेरी,
बिस्तर की सलवटों में खुशबू तेरी,
डायन सी घूरे हर पल की देरी,
इंतज़ार में कबसे मुन्ना रो रहा है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

काश की आह नहीं उठेगी अक्सर, 
आईने में राही को दिख जाए रहबर,
कुछ आदतें बदल जाएं तो बेहतर,
दिल से लगी तस्वीरों पर वक़्त का असर हो रहा है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

बालों में हाथ फिरवाने का फिरदौस, 
झूठे ही रूठने का मेरा दोष,
ख्वाबों को बुनने में वक़्त लग गया,
उन सपनो के पकने का मौसम हो चला है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

तमाशा ना बनने पाए तो सहते रहोगे क्या?
नींद में शिकायतें कहते रहोगे क्या?
आज किसी 'ज़रूरी' बात को टाल जाना,
घर जैसे बहाने बाहर बना आना, 
आँखों को बताने तो आओ कि बाकी जहां सो रहा है...
...और खाना ठंडा हो रहा है। 

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Thumbnail Artwork - Nadezhda Repina‎
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster
*Second poem in Matlabi Mela (Kavya Comic Series)