अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Wednesday, July 2, 2025

The Quiet Power of Doing Right (Article on Somy Ali)

 In my recent article for The Parallel, I chronicled Somy Ali’s incredible journey, from Bollywood starlet to global activist. Her story isn’t about fame, it’s about impact.

Let’s celebrate those who help without headlines.

💛 #SomyAli #CompassionIsPower #TheParallel #HumanityWins

Sunday, April 27, 2025

फिक्शन कॉमिक्स पत्रिका के हर अंक में मिलें मेरी रचनाओं से...

 

FC Magazine #1

यह बताते हुए खुशी हो रही है कि Fiction Comics Magazine में मेरे लेख, कहानियाँ और कॉमिक स्ट्रिप्स अब नियमित रूप से प्रकाशित हो रहे हैं।


FC Magazine #2

इस मैगज़ीन में काफी विविधता है, और अलग-अलग फॉर्मेट्स में लिखने का मौका मिल रहा है। इसके पहले चार अंक प्रकाशित हो चुके हैं, और आगे भी यह सिलसिला जारी है। आप सभी पाठकों का साथ और स्नेह बना रहे!


FC Magazine #3


FC Magazine #4

Sunday, July 28, 2024

Comics Character League 2024 (Round 2): A Thrilling Race to the Finals

 

The Comics Character League (CCL) Season 2 has been an intense competition, and Round 2, held from July 20 to July 27, 2024, was no exception. With each battle, the stakes grew higher as teams fought fiercely to secure their place in the finals. As Round 2 concludes, one finalist, Team 3, has already been determined, while the fate of the second finalist hangs in the balance, awaiting a tie-breaker battle.

Round 2 Recap: Dominance and Determination

Team 3, owned by Mohit Sharma, emerged as the dominant force in Round 2, winning all three of their matches and securing 7 points, along with an impressive vote share of 63.7%. Their victories included a narrow win over Team 8's Mahamanav by 4% on July 21, a resounding 32% margin victory against Team 6's Miss Killer on July 24, and a commanding 46% win over Team 7's Lomdi on July 27. This flawless performance earned Team 3 a well-deserved spot in the finals.

Meanwhile, the battle for the second spot in the finals remains undecided. Team 6, owned by Manoj Kumar Garg, and Team 8, led by Ravi Yadav, both finished Round 2 with 2 points each. Team 6 started strong with a 28% victory over Team 7's Kaal Paheliya on July 20 but struggled in subsequent matches, losing to Team 3's Shakti and Team 8's Doga. Similarly, Team 8 secured a win against Team 7's Motu-Patlu by 10% on July 23 but lost to Team 3 and Team 6.

Update: Team 7 Won the Tie-Breaker

Team 7, owned by Mohan Lal Mourya, also finished Round 2 with 2 points. Despite a challenging round, they managed to secure a victory against Team 8's Jingalu, winning by 10% votes on July 23. However, their other matches ended in defeats, leaving them in a precarious position with the lowest vote share of 39.3%.

The Tie-Breaker: A Last Chance for Glory

With Team 7, Team 6, and Team 8 all tied with 2 points and similar vote shares, the CCL organizers have announced a Tie-Breaker Battle to determine which of these teams will join Team 3 in the finals. The tie-breaker will feature one villain character from each of the three teams, and the character that garners the most votes will secure their team's place in the finals. The Tie-Breaker Battle is scheduled to take place tomorrow, following the announcement of the final Round 2 battle results. To ensure fairness, it has been decided that only villain characters can be selected for this battle. Each team has the option to choose one of their two available villains or swap in another villain character from any publication if they feel their current options aren't strong enough. There will be no toss; instead, each team must carefully consider their choice based on their own and their opponents' characters.

Looking Ahead: The Road to the Finals

As Round 2 comes to an end, the anticipation for the Tie-Breaker Battle builds. With Team 3 already securing their spot, the remaining teams must give their all in this last-chance battle. The finals of CCL Season 2 promise to be an epic showdown, and the Tie-Breaker Battle will be a decisive moment that fans won’t want to miss. Stay tuned as the Comics Character League continues to deliver thrilling battles and unforgettable moments!

Round 1 Summary

Sunday, March 5, 2023

World Book Fair 2023 - Random Thoughts #funny

अच्छा, तो पुस्तक मेले में एक और परिचित की स्टाल लगी है। लेकिन उनकी स्टाल तो भीड़ के बीच पौने दो किलोमीटर दूर है...छोड़ो इतनी भी जान पहचान नहीं है।

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अंतिम घंटे में, "चाय-चाय...चाय लेंगे सर?"

सर - "ये अपने पैर कितने के दिए?"

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किताबों के बारगेन में जो पैसा बचाया था वो तो यहां के छोले भटूरे और पानी में चला गया। ये कैसा थेनोसपन है?

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ये कैसा पाठक है, ये मेरी किताब क्यों खरीद रहा है।

"आपकी अगली किताब कब आएगी, मोहित जी?"

Mit Gupta - "इनकी? नहीं आएगी!"

"लेकिन इनके साझा संकलन फलाना तो आते रहते हैं।"

मिथिलेश गुप्ता - "वो साझा नहीं, पाठकों को इनका झांसा होता है।"

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3 प्रशंसक आए हैं, एक की कसकर झप्पी ले ली, दूसरे को साइड हग किया। तीसरे को बस थपकी दे दी। इनकी गलती है! ये अलग से एक एक करके मिलने क्यों नहीं आते? दो प्रशंसक खो दिए मैंने!

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"भगवान, ऐसा कुछ कर दो कि मेरे पैर का दर्द चला जाए।"

*मधुमक्खी ने काट लिया।*

"हां, अब ठीक है।"

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"आप साहित्य विमर्श में भी हैं ना?"

"हूं तो नहीं, लेकिन उनसे इस विषय पर विमर्श चल रहा है।"

"विकास नैनवाल जी स्टेरॉइड्स लेते हैं ना?"

"हां! खुद सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर' ने मुझे बताया था।"

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"अरे इधर आओ, कोई पानी लाओ!

सत्य व्यास जी...को लगी है प्यास।"

"वाह! आप तो अच्छे कवि हैं, मोहित सर।"

"तो क्या आप मेरा काव्य संग्रह छापेंगे?"

"नहीं!"

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"कैसे हो मोहित?"

"भैया, आप मोहित हो मैं अभिराज हूं।"

"हां तो ऐसे इवेंट्स में सुबह-दोपहर मिल लिया करो। शाम को मैं...मैं नहीं रहता!"

"मैं कहां मिलने आया था भैया, आप ही..."

"शटअप मोहित!"

...

Wednesday, September 22, 2021

मेरे देश की टीम बनाम निजी संस्था की टीम! (भारतीय क्रिकेट)

Japan (Women) cricket team - 2010 Asian Games Bronze Medalists

 जो बीत गया, उसे बदला नहीं जा सकता - लेकिन उससे सीख ज़रूर लेनी चाहिए। जहां पदक तालिका में जापान, अफ़गानिस्तान जैसे उभरते देशों को देखना अच्छा रहा, लेकिन फिर याद आया कि किसी द्विपक्षीय सीरीज़ की वजह से भारत ने एशियाई खेलों में जैसे थाली में सजा के रखे गए चार पदकों को नहीं लिया। पुरुष टीम का कैलेंडर आईपीएल आदि की वजह से समझ में आता है (वैसे यह वजह भी सही नहीं), पर महिलाओं को 2010 और 2014 के दो स्वर्ण पदक जीतने के लिए क्यों नहीं भेजा गया, मेरी समझ से परे है। अगर भारत अपनी रिज़र्व टीमें भी भेजे, तो स्वर्ण न सही पर पदक ज़रूर आ सकते हैं। 

उस समय इस बात पर काफ़ी हंगामा और कोर्ट केस भी हुआ था। अंत में लचीले कानूनों पर अमीर बीसीसीआई बोर्ड की जीत हुई और फ़ैसला दिया गया कि तकनीकी रूप से भारतीय क्रिकेट टीम - भारत की टीम न होकर, बीसीसीआई संस्था की टीम है। यह खबर जानकार बड़ी निराशा हुई। इस बाबत मैंने लल्लनटॉप मीडिया के एक कार्यक्रम में नामी भारतीय महिला क्रिकेटर शिखा पांडे से सवाल किया (और उन्हें जापान जैसे देशों के क्रिकेट में पदक जीतने का उदाहरण भी दिया), तो उन्होंने डिप्लोमेटिक से जवाब में बताया कि एक क्रिकेटर होने के नाते उनका मुख्य काम क्रिकेट खेलना है और बोर्ड की नीतियों या प्रबंधन के फ़ैसलों की उन्हें खास जानकारी नहीं है...सार्वजनिक मंच पर मुझे ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी।

अब देखना है कि 2022 के खेलों में बीसीसीआई का क्या रुख रहता हैं।

Monday, September 20, 2021

स्वर्ण पदक वाले चोकर - दक्षिण अफ़्रीका क्रिकेट टीम



अपने देश के अलावा हम सभी की 1-2 पसंदीदा टीम होती हैं। अगर हमारी टीम आईसीसी टूर्नामेंट जैसे वर्ल्ड कप, चैंपियंस ट्रॉफ़ी या एशिया कप में हार जाती है, तो मन करता है कि खास हमारी दूसरी पसंदीदा टीम जीत जाए। भारत के बाद मेरे लिए वह टीम हमेशा दक्षिण अफ़्रीका रही। कुल जीत-हार के अनुपात में दक्षिण अफ़्रीका का रिकॉर्ड काफ़ी अच्छा है (लगभग 60% जीत की दर)। 1990 के दशक की शुरुआत में वापसी के बाद से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट भारत, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान जैसे देशों से कई सीरीज़ जीती हैं।

हालांकि, आईसीसी टूर्नामेंट में उन्हें चोकर का ताना मारा जाता है - कई बार बड़े टूर्नामेंट में सामने वाली टीम के अलावा डकवर्थ लुइस, बारिश आदि किस्मत के घटकों से इस टीम को हार मिली है, लेकिन कई देशों वाले एक गैर-आईसीसी टूर्नामेंट में उन्हें जीत मिली। मलेशिया में हुए 1998 के कॉमनवेल्थ या राष्‍ट्रमंडल खेलों में 16 देशों वाले फ़ॉर्मेट में क्रिकेट को शामिल किया गया था। फाइनल में उस समय जैसे अश्वमेघ यज्ञ का रथ दौड़ा रही ऑस्ट्रेलिया की लगाम दक्षिण अफ़्रीका ने पकड़ी और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इससे पहले सेमी-फाइनल में फिर लगने लगा था कि श्रीलंका उन्हें चोकर का तमगा पहना देगी। आखिर में, एक विकेट से जीत कर दक्षिण अफ़्रीका ने किस्मत को ठेंगा दिखा दिया। इस टूर्नामेंट में भारत ने अपनी कुछ हल्की टीम भेजी थी जिस वजह से हम पहला दौर पार नहीं कर पाए, लेकिन एक जांबाज़ टीम को मैडल जीतते देखना सुखद था। इस बात का दूसरा पहलु यह है कि दक्षिण अफ़्रीका ने फिर भी पदक जीता, बड़े टूर्नामेंट की ट्रॉफ़ी अभी बाकी है...देखते हैं, कितना इंतज़ार करना होगा।

#ज़हन

Tuesday, July 16, 2019

Latest issue of Junction Planet Magazine


2 contributions - An article on author Anurag Kumar Singh and a joint fan artwork with artist Yash Thakur, colorist Ajay Thapa published in Junction Planet e-zine by Comics Junction group (July 2019 issue).

Monday, December 25, 2017

विचारों पर विचार...


कहानी लिखते समय कभी-कभी एक दुविधा का सामना करना पड़ता है। एक विचार को आधार बनाकर एक कहानी (या लेख) गढ़ी गयी। उस विचार से बहुत से अन्य बातें, विचार, उदाहरण और निष्कर्ष जुड़े होते हैं। अब लेखक के पास दो विकल्प हैं या तो केवल उस मूल विचार को उभार कर कहानी लिख दे या फिर उस विचार के साथ बढ़ती बातों को उस कहानी में शामिल करे। विचार को मुख्य आकर्षण की तरह प्रस्तुत करने में ये संशय नहीं रहता कि पाठक का ध्यान उस विचार पर नहीं जाएगा। साथ ही पाठक को कुछ नयेपन का अनुभव होता है। इसका मतलब ये नहीं कि मूल विचार से अलग कुछ लिखा ही ना जाए। ये कुछ वैसा ही है जैसे दवाओं या रसायनों को जलमिश्रित (डायल्यूट) कर उनका सही अनुपात बनाया जाता है। विचार को घटनाओं एवम किरदारों से इतना डायल्यूट किया जाए कि उसका प्रभाव बना रहे और वो अधपका ना लगे। 

कथा में पूरा ध्यान आईडिया पर होने का एक घाटा यह है कि पाठक को उस रचना में अधूरापन लग सकता है। उन्हें प्रभावी विचार वाली कहानी पढ़कर ये लग सकता है कि इस कहानी में और बहुत कुछ होना चाहिए था। कहानी की घटनाएं और पात्र एक औपचारिकता से लग सकते हैं। वहीं अधिक डायल्यूट होने पर घटनाओं, किरदारों की अन्य बातों में विचार कहीं घुल सा जाता है। कभी-कभार तो पाठक का रडार विचार को पकड़ ही नहीं पाता। कुछ अपवाद में ऐसा इच्छित हो सकता है पर अधिकतर कहानी को 'कहानी' बनाने में उसका आधार गुम हो जाता है। 

विचारों से कथा या लेख बनाने के इन प्रयोगों में कभी मैं आईडिया को प्राथमिकता देता हूँ तो कभी अन्य घटकों से मिश्रित कहानी को लिखता हूँ। स्थिति अनुसार दोनों तरीके आज़माते रहना चाहिए। अगर किसी विचार में काफी सम्भावना दिखे तो उसपर दोनों तरीकों से लिखना चाहिए। वैसे एक बार किसी विचार पर कुछ लिखने के बाद तुरंत ही दोबारा (चाहे अलग तरीके से सही) उसपर लिखने का मन नहीं करता...अगर ऐसा कुछ है, तो भी उस आईडिया को आगे के लिए बचा कर रख लें। बाद में कभी जब मन करे तब अन्य तरीके से लिखने का प्रयास करें।
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Art - Anastasia Glushkova
#ज़हन

Tuesday, December 12, 2017

सामाजिक समस्याओं में अंतर (लेख)

Art - Mari Bobghiashvili‎
समस्या जीवन का अभिन्न अंग है। कुछ पाना है, कुछ करना है...सांस तक लेते रहना है तो भी कोई ना कोई समस्या मुँह बाये तैयार रहती है। हाँ, वीडियो गेम के लेवल की तरह कोई समस्या आसानी से निपट जाती है और कोई समस्या कितने ही संसाधन और समय व्यर्थ करवाती है। कुछ बड़ी समस्याएं जटिल होती हैं और सामाजिक परतों में अंदर तक फैली होती हैं। इन समस्याओं में ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपराध, भेदभाव, बाल शोषण, अशिक्षा, ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण आदि शामिल हैं। बचपन से इन समस्याओं के बारे में पढ़ाया जाता है और हर रोज़ इनसे जुड़े पहलुओं पर दुनियाभर में ख़बरें, वार्ता होती रहती हैं। एक समय बाद समाज इन समस्याओं का इतना अभ्यस्त हो जाता है कि अगर कोई बड़ी खबर ना हो तो इनकी तरफ ध्यान नहीं जाता। ये बातें सामने होकर भी अनदेखी सी होने लगती हैं। सरकार और लोगो की जागरूकता से स्थिति बेहतर हो सकती है पर पूरी तरह ठीक होना असंभव है। वहीं दूसरी तरफ कुछ मुद्दे छोटे स्तर, छोटे क्षेत्र-लोगों और कम समय वाले होते हैं। 

कुछ नये को सामान्य से बहुत अधिक प्रतिक्रिया मिलती है इसलिए आम जनता और सभी तरह का मीडिया 1 दिन, 2 दिन या कुछ हफ़्तों तक उस खबर को प्राथमिकता से देखते-दिखाते हैं। इसी क्रम में कभी-कभार किसी घटना पर जनता के बड़े हिस्से की नकारात्मक प्रतिक्रिया आती है और देश-दुनियाभर में प्रदर्शन, मांगें, विरोध और यहाँ तक की हिंसा भी हो जाती है। किसी के लिए छोटी सी बात किसी अन्य समूह के लिए उनकी पहचान पर सवाल या अपमान की तरह देखी जाती है। अगर ध्यान दें तो ये "छोटी" बातें उन बड़े मुद्दों का ही वेरिएशन होती हैं जो हम अनदेखा कर देते हैं। ये कुछ ऐसा है जैसे किसी फिल्म की थीम प्रेम कहानी, एक्शन, एनिमेशन या यात्रा वृतांत हो सकती है पर दर्शक उस फिल्म को इन थीम के वेरिएशन के लिए देखने जाते हैं यानी इस प्रेम कहानी में क्या नया हुआ, नयी कलाकार मण्डली कैसे साथ आयी। नयी चीज़ का "नॉवल्टी" होना कुछ समय के लिए जिज्ञासा जगाता है और जब लोग बात से ऊब जाते हैं तो उसकी जगह ताज़ी बातें ले लेती हैं। 

ऊपर समझाया गया संदर्भ बिना जाने, एक बात लोग अक्सर कहते हैं कि देश में जघन्य अपराध, ग़रीबी जैसे मुद्दों पर तो कुछ नहीं होता! उनपर किसी को कोई धरना, विरोध प्रदर्शन आदि नहीं करते नहीं देखा...पर देखो इन नासमझ लोगों को जो छोटी बात या ज़रा से स्थानीय मुद्दे पर तिल का ताड़ बना रहे हैं। पहली बात, बिना उस पक्ष की पूरी बात जाने एकतरफा नरेटिव पर कभी प्रतिक्रिया ना दें। मानव के सामने चुनौती रहे हज़ारों-लाखों वर्षों वाले मुद्दों की तुलना 4-6 दिन की अस्थाई बात से ना करें। ये एक दुखद सच्चाई है कि अन्याय, बुराई कम किये जा सकते हैं पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सकते। कितनी आसानी से कह दिया "कोई कुछ नहीं करता!" जिन बड़ी समस्याओं की आप बात कर रहे हैं देश-दुनिया में अनगिनत स्कूलों, विश्वविद्यालयों में उनपर अलग से सर्टिफिकेट, डिग्री पाठ्यक्रम तक पढ़ाये जाते हैं। रोज़ जगह-जगह हज़ारों जागरूकता एवम मदद प्रोग्राम, सेमिनार, कैंपेन आयोजित किये जाते हैं। कितने ही सरकारी विभाग, निजी संस्थाएं उन समस्याओं पर अनुसंधान और उनके निवारण (उन्हें कम करना बेहतर शब्द होगा) के लिए मौजूद हैं। हाँ, मैं मानता हूँ कि लोगों को और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है, साथ ही विभागों, संस्थाओं की कार्यप्रणाली और कार्यान्वयन को बेहतर किया जा सकता है पर ऐसी फ़िल्मी डायलॉगबाज़ी से बचें कि कोई कुछ नहीं करता। कोई नहीं बल्कि करोड़ों लोग करते हैं इसलिए सामान्य बात नज़रों में आते हुए भी बच जाती है। वो करोड़ों लोग इस सामान्य से काम को करना छोड़ दें तो दुनिया की बैंड बज जायेगी। इस वजह से जेनेरिक (व्यापक) समस्याओं को स्पेसिफिक (छोटी पर नयापन लिए अलग) घटनाओं के बराबर रखना जायज़ नहीं है। समाज सेवा के अनेकों अवसर ठीक आपके सामने होंगे, कोसने के अलावा उन अवसरों को चुनने की हिम्मत भी रखें। 

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#ज़हन 

पहचान की कमान (लेख)


अपनी पहचान पर दाग ना पड़े इसके लिए लोग क्या कुछ नहीं करते! अब सोचें कितने ही देश, विचारधारा, धर्म, प्रदेश बहुत विस्तृत और स्वयं में एक संसार समेटे हुए हैं वो क्या-क्या करते होंगे? चेहरा बचाने की कुछ कोशिशें और थोड़ी बहुत सेंसरशिप झेली जा सकती है। समस्या तब आती है जब एक पहचान से जुड़े लोगों को बचपन से सिखाया जाये कि उनकी पहचान कभी ग़लत हो ही नहीं सकती और वो दुनिया में सबसे बेहतर हैं। इस सोच को मन में बैठाने के लिए हास्यास्पद कहानियां, स्टंट से लेकर किसी भी विरोधाभासी आवाज़ का दमन करना अब आम बात है। आपके जीने का तरीका आपको सर्वश्रेष्ठ इसलिए लगता है क्योंकि आप उसके अभ्यस्त हो चुके हैं ना कि वो वाकई सर्वश्रेष्ठ है। हाँ, अगर मान लें जीने के तरीके में 50 बातें हों तो संभव है आपके कुछ घटक बेहतर हों पर ये मानना की 50 में से 50 ही सही हैं तो आपको बाकी दुनिया के तौर तरीके देखने की आवश्यकता है। 

विचारधारा को ज़बरदस्ती बेहतर दिखाना कुछ ऐसा लगता है जैसे कोई 50-55 वर्षीय महिला या पुरुष मेकअप, सर्जरी आदि जतन से 25 की लगने की कोशिश करें। इस तरह वो अपने मन को दिलासा तो दे देते हैं क्योंकि उन्होंने पैसा खर्च किया है और बदलाव देखा है। वहीं उनसे अनजान व्यक्ति उन्हें 25 वर्ष का नहीं बतायेगा। अपनी सोच अनुसार कोई 40 वर्ष बोल देगा तो कोई 45 वर्ष। क्या मिला? संसार की सहमति की लीज़ बढ़ गयी कुछ और वर्षों के लिए....बस? सच्चाई तो सात-आठ सालों में फ़िर मुँह उठा लेगी। कमियों को छुपाने से वो फफूंद की तरह बढ़ती हैं क्योंकि मन को झूठा दिलासा रहता है कि कमी तो है ही नहीं तो इलाज कैसा? जबकि कमी को मानकर एक तरह से हम खामियों को अपना लेते हैं। अपनायी हुई कमियां आँखों के सामने रहती हैं जिस से उनके इलाज की सम्भावना अधिक हो जाती है। इसका मतलब ये नहीं कि अबतक जिया जीवन कमतर था बल्कि जो पहचान थी वो अब और बेहतर हो गयी। गलतियां मानना वो भी बड़ी विचारधारा, देश आदि के लिए काफी हिम्मत की बात है और दुर्भाग्य से ऐसी हिम्मत ना के बराबर देखने को मिलती हैं। सीखी हुई मान्यताओं के लिए संघर्ष करना अच्छा है पर कभी-कभी मान्यताओं से आंतरिक संघर्ष और भी अच्छी बात है। एवोल्यूशन केवल प्रकृति के भरोसे ना छोड़ें क्योंकि संभव है आगे बदले समीकरण, प्रकृति आपके लिए कोई विकल्प ना छोड़ें। 
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Art - Caroline B.

Friday, December 8, 2017

Ishq Baklol (Hindi Novel) Review


"इश्क़ बकलोल", नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि खुद में एक बड़ा बाज़ार बन चुकी फूहड़ता का फायदा उठाने को एक पुस्तक और लिख दी गयी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसी रोलरकॉस्टर राइड सी भारतीय परिवेश में भावनाओं की गुत्थमगुत्था है इश्क़ बकलोल। 2012 में देवेन पाण्डेय जी ने अपने अनुभवों, इनके साथ घटी बातों पर लिखना शुरू किया तब लगा कि कई शौकिया लेखकों की तरह ये कुछ समय बाद लेखन को टाटा कर देंगे। नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां संभालते हुए इन्होने लेखन जारी रखा और कम समय में काफी सुधार किया। एक दिन इनका मैसेज आया कि इन्होने एक उपन्यास लिखा है और मैं उपन्यास की इंट्रो पोएम लिखूं। उपन्यास का संक्षिप्त आईडिया जो सुना उसके अनुसार एक नज़्म भेज दी। सूरज पॉकेट बुक्स के सौजन्य से इश्क़ बकलोल अब बाजार में उपलब्ध है, जिसकी अच्छी बिक्री हो रही है। 

कवर पेज इंटरनेट से किसी स्टॉक तस्वीर को ना लेकर आकर्षक चित्रांकन रखा गया। सूरज पॉकेट बुक्स की ये पहल मुझे बढ़िया लगी। कहानी के विस्तार में ना जाकर इतना कहूँगा कि इसे रोमांटिक के बजाय एक सामाजिक उपन्यास कहना उचित होगा। भारतीय समाज के अंदर बसी विविधता को बड़ी सुंदरता से दर्शाया है। जीवन की घटनाओं - दुर्घटनाओं के बीच किस तरह हम बिना सोचे कितना कुछ कर जाते हैं (या असमंजस में कुछ नहीं करते) जिनके दूरगामी परिणाम जीवन की दिशा बदल देते हैं। कहानी के दौरान पात्रों की प्रवृत्ति -नज़रिये में आये बदलाव अच्छे लगे। अक्सर ज़बरदस्ती करैक्टर आर्क दिखाने के चक्कर में घटक जोड़ दिए जाते हैं वो यहाँ नहीं हुआ। मनोरंजन की दुनिया में मार्केटिंग जुमला बन चुके फ़र्जी देसीपन की जगह यहाँ किरदारों में असली देसीपन पढ़ने को मिला। कुछ जगह भाषा शैली, कथा के प्रवाह और दृश्य परिवर्तन में सुधार की सम्भावना है, जिसे पहले प्रयास के हिसाब से अनदेखा किया जा सकता है। ये देवेन जी का स्नेह है कि कहानी में एक किरदार मेरा भी है। मुझे पता चला कि मेरा किरदार बड़ा था पर कहानी के लिए उसे छोटा करना पड़ा (इस कारण रेटिंग में आधा अंक काट लेता हूँ....हाहा)। आशा है आगामी उपन्यास और भी धमाकेदार हो। शुभकामनाएं!

उपन्यास के संसार में देवेन पाण्डेय के पदार्पण को मैं रेट करता हूँ - 7.5/10

P.S. मुझे नहीं पता कि मैं रात के डेढ़ बजे अपनी रसोई में धूप का चश्मा लगाकर सेल्फी क्यों ले रहा हूँ।

Wednesday, November 22, 2017

ग्राहक ज़रा बचके (लेख)


सामान, सेवा बेचने वाले व्यापारियों की एक श्रेणी अधिक पैसा कमाने के लिए कई ग़लत तरीके आज़माती है। आज उनमे से एक तरीके पर बात करते हैं। हर व्यक्ति के लिए अपनी पहचान, अहं का कुछ मोल होता है। जैसे अगर आप किसी बड़े होटल में खाना खा रहे हों तो आप अपने घर जैसे इत्मीनान, मौज से नहीं खायेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि आप वहाँ भोजन कर रहे अन्य लोगो के सामने शालीन बने रहने चाहते हैं। हालांकि, उनमे कोई आपको जानता नहीं और शायद आगे कभी जीवन में सामने भी ना आये पर फिर भी असहज ना लगे और इस आधे-एक घंटे अपनी अच्छी छवि बनी रहे इसलिए थोड़ा एडजस्ट करना चलता है। ये जो ईगो-इमेज वाली असहजता है कुछ दुकानदार इसका फायदा उठाते हैं। मान लीजिये आपको एक ख़ास तरह का टूथपेस्ट पसंद है जो आस-पास नहीं मिलता। जब तक आपका उस टूथपेस्ट लेने वाली जगह जाना नहीं होता तब तक काम चलाने के लिए आप कोई और टूथपेस्ट लेने जाते हो। अब वो दुकानदार आपको 150 रुपये का टूथपेस्ट उठाकर दे देता है। आप सोचते हो कि मेरे वाला प्रोडक्ट जल्द लेना ही है तो क्यों ना छोटा, सस्ता टूथपेस्ट ले लूँ। झिझक के साथ आप मना करने को बड़बड़ाते हो तो दुकानदार झूठी हँसी, या तंज भरे स्वर में 'भोला' सवाल करता है कि अन्य ग्राहक, दुकानकर्मियों का ध्यान आप दोनों पर जाता है। 

अब "ज़रा सी बात" पर आपको ताकते लोगो के सामने झेंपकर आप कहते हो कि "लाओ ये ही दे दो!" या फिर आप मन ही मन दुकानदार की ट्रिक समझ उसे कोसते हुए कहीं और से टूथपेस्ट खरीदने निकल जाते हो। अधिकतर पहली स्थिति होती है इसलिए दुकानदार ये रिस्क ले लेता है। थोड़ा वह आपके हावभाव, आदत के अनुसार अपनी बात रखता है। केवल कुछ अधिक बेचने में ही नहीं उत्पाद से सम्बंधित ग्राहक के सवालों को ख़त्म करने के लिए भी "ये बचकाने सवाल हैं" की हँसी या बर्ताव का स्वांग करता है। 

तीसरा और दुर्लभ तरीका है दुकानदार पर पलटवार - "घर में फलाना (काफी महँगे) टूथपेस्ट के बॉक्स पड़े हैं। वो तो ख़ास डीलर पर मिलता है आपके यहाँ होगा नहीं तो सोचा एक बार के इस्तेमाल के लिए फलाना छोटा साइज ले लूँ...टीवी पर इसके बड़े एड देखे हैं। ये बड़ा साइज जो आप दे रहे हो ये तो पड़ा-पड़ा ख़राब होगा! है क्या आपके पास फलाना प्रोडक्ट? (तंज वाली हँसी जोड़ें)" यह बस एक उदाहरण भर है। स्थिति अनुसार ऐसे जवाब देने और व्यापारी को इस तरह फायदा ना देने के लिए हमेशा तैयार रहें। 
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#ज़हन

Monday, November 13, 2017

केस स्टडी: बदलते दौर में ढलता स्टारडम


इंटरनेट (अंतरजाल) जो पहले मिलने-जुलने, कोडिंग, हल्के मनोरंजन और जानकारी का साधन था वो धीरे-धीरे दुनियाभर के कलाकारों के लिए एक अथाह मंच बन गया। हालाँकि, इस मंच में कई कमियाँ हैं पर फिर भी इसका लाभ करोड़ों लोगो को मिला है। आज अंतरजाल की दुनिया से एक रोचक केस अध्ययन। इंटरनेट सर्फ करते हुए श्रद्धा शर्मा के यूट्यूब चैनल पर जाना हुआ। अप्रैल 2011, 15 साल की उम्र में इस लड़की ने बॉलीवुड गानों के कवर यूट्यूब पर डालने शुरू किये जो उस समय भारत में अनसुनी तो नहीं पर एक नयी बात थी। कुछ समय बाद श्रद्धा के गाये चौथे अपलोड "हाल ए दिल" गाने के कवर को कम समय में 10 लाख से अधिक व्यूज़ मिले और रातों-रात श्रद्धा का नाम हो गया। स्थानीय , राष्ट्रीय अखबारों-पत्रिकाओं ने उसपर सुर्खियाँ बनायीं, कई कॉलेज फेस्ट से न्यौते आने लगे। जहाँ उसके प्रशंसकों की कमी नहीं थी वहीं आलोचक भी बढ़ रहे थे। जिनका मत था कि श्रद्धा टैलेंट के बदले नोवेल्टी के कारण चल रही है, नहीं तो लाखों भारतीय गायक-गायिकाएँ जो यूट्यूब पर नहीं हैं या जिन्हे एडिटिंग आदि का ज्ञान नहीं है इस प्रसिद्ध गायिका से कहीं बेहतर हैं। उसके बाद 2013-14 की खबर थी कि श्रद्धा की डेब्यू एल्बम आ रही है जिसका निर्माण और संगीत निर्देशन लेस्ली लुईस कर रहे हैं। 2014 में एल्बम आने के बाद से श्रद्धा शर्मा के कुछ वेब विज्ञापन, कोलैबोरेशन आये पर कोई बड़ी अपडेट नहीं मिली। 

हैरानी की बात यह है कि अब 6-7 वर्ष बाद श्रद्धा के यूट्यूब चैनल के सब्सक्राइबर्स 2 लाख 34 हज़ार हैं यानी शुरुआती बूम के बाद बहुत कम लोग श्रद्धा के चैनल से जुड़े। उस दौर में जो बड़ी बात थी अब हज़ारों भारतीय चैनल्स, तरह-तरह के कलाकारों को श्रद्धा की तुलना में कहीं अधिक प्रशंसक और प्रतिक्रिया मिलती हैं। कभी अग्रिम पंक्ति में खड़ी श्रद्धा कंटेंट क्रिएटर्स की भीड़ में कहीं गुम सी हो गयी। ऐसा क्यों हुआ? इसपर कुछ बातें -

*) - जहाँ इंटरनेट ने सबको मंच दिया वहीं बढ़ती प्रतिभावान भीड़ के साथ प्रतिस्पर्धा का स्तर भी बढ़ गया है। जो बातें आज से कुछ वर्ष पहले चल जाती थी उनका आज के परिवेश में हिट होना काफी मुश्किल है। हर क्षेत्र में गिने चुने लोग ही चोटी पर बने रह सकते हैं। उनके अलावा आम जनता का ध्यान उस क्षेत्र में सक्रीय अन्य कलाकारों पर कम जाता है। एक शैली अगर लोग पसंद करेंगे तो कुछ ही दिनों में उस से ऊबकर कंटेंट क्रियेटर से कुछ नया करने की मांग करेंगे। अगर कलाकार कुछ नया नहीं कर पाता तो लोग अन्य विकल्पों की तरफ बढ़ जाते हैं। 

*) - अगर आर्टिस्ट के काम में मौलिकता की कमी हो और वह अधिकांश अन्य कलाकारों के काम को आधार बनाकर कुछ करता हो तो एक समय बाद उसका काम आकर्षण खोने लगता है। ऐसे में अगर उसके मौलिक काम का स्तर औसत या उस से नीचे हो तो ना सिर्फ उसके प्रशंसक बल्कि वह खुद अपने आप में विश्वास खोने लगता है। अगर ऐसा हो रहा है तो उसे अपनी कमियों को पहचान कर उनपर काम शुरू कर देना चाहिए और ऐसे तरीकों पर काम करना चाहिए जिनका पालन कर उसके मौलिक काम का स्तर स्वीकार्य स्तर तक आ सके। 

*) - एक महत्वपूर्ण बात ये है कि किसी व्यक्ति के लिए सफलता और उस स्तर पर बने रहने का मोल क्या है? अगर जीवन में सफलता जल्दी मिल जाये तो उसका मोल आसान लगने लगता है जबकि बड़े स्तर पर बने रहने के लिए निरंतर पापड़ बेलते रहने पड़ते हैं। थोड़ा बहुत आलस्य या ब्रेक अपनी जगह ठीक है पर मेहनत के विकल्प या काल्पनिक दिलासे ढूँढ लेने से आप एक भूला-बिसरा नाम बनकर रह जाते हैं। 

*) - जगह और माहौल बदलने के बाद आर्टिस्ट को अपने क्षेत्र से जुड़े कई घटक पता चलते हैं। उसे लगता है कि अभी कुछ बनाने से पहले कितना कुछ सीखना बाकी है। इस कारण जिस खुलेपन से कलाकार पहले काम करता था वो बरक़रार नहीं रहता। लोगों के साथ-साथ उसकी खुद की अपेक्षा होती है कि हर बार वह पहले से बेहतर करे और अगर किसी वजह से ऐसा नहीं हो पाता तो वह अपने सीमित दायरे में बँध जाता है। इस घेरे से निकलने के लिए ज़रूरी है कि धीमी ही सही पर कुछ रचनात्मक गति बनी रहे, प्रयोग होते रहें। 

भविष्य में क्या होगा ये कहा नहीं जा सकता पर अगर श्रद्धा गायन की अन्य विधाओं, शैलियों को सीखकर नये प्रयोग करें तो स्थिति में काफी सुधार हो सकता है। आशा है ऐसा ही हो!
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#ज़हन

Sunday, October 22, 2017

Updates

*) - Chosen as one of the top writer by Dawriter website. 
*) - My article about Sooraj Pocket Books and Novelist Shubhanand (Jagran Junction)
*) - Over 900 points now, Google Maps Local Guides Program
*) - DD Birthday Wish :)
*) – 6 new podcasts on lyrical comedy, noise pollution and art. – SoundCloud Profile
*) – Retired from MMO The Wrestling Game S3 World #39 (August 2017) 😦
*) – Kavya Comics series featured by Nazariya Now
*) – COP Exclusive Interview

Friday, October 13, 2017

ध्वनि प्रदूषण का घातक प्रभाव (Hindi Educational Podcast) #ज़हन

New Podcast (224 Seconds)
Also on Soundcloud and Vimeo
ध्वनि प्रदूषण के एक अनछुए पहलु से रूबरू करवाती रूबरू दुनिया की पहली ऑडियो पॉडकास्ट। जल्द ही रूबरू दुनिया एप पर आपको ऐसी कई पॉडकास्ट सुनने को मिलेंगी।
 - मोहित शर्मा ज़हन #mohitness #mohit_trendster

Friday, September 29, 2017

जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख) #ज़हन


कॉमिक्स लेखन में एक कहावत है, "विलेन भी अपनी नज़रों में हीरो होता है।" खलनायक अपनी छोटी भूल से लेकर जघन्य अपराधों तक का इतनी चपलता से स्पष्टीकरण देता है कि लगे उस स्थिति में सबसे ठीक विकल्प वही था। बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं? जवाब उस कॉमिक विलेन वाला है, 'अपनी पिक्चर में हर कोई नायक होता है।' दुनिया में ना कोई पूरी तरह अच्छा है और ना ही कोई बुराई का पुतला है। फिर भी खलनायक ढूँढने, बनाने की आदत हम सबके अंदर है। ये आदत कहाँ से जन्मी? शायद मानव मन को एक सांत्वना सी मिल जाती है और अपनी बुराइयों, कमियों से ध्यान हट जाता है। कभी-कभार परिवेश और घटनाओं के आधार पर किसी को डीमनाइज़ करना समझा जा सकता है पर जब यह आदत लोग अपने निजी जीवन के हर पहलु में लगाने लगें तो समस्याओं का जाल बन जाता है। 

*) - प्रकृति की कारस्तानी: नेचर का एक नियम होता है कि हर जैविक प्रजाति धरती पर हो रहे बदलाव के अनुसार खुद को ढालते हुए निश्चित विकास के साथ बढ़ती रहे। अब अगर सबसे विकसित दिमाग वाला प्राणी मनुष्य, बात बात पर अंतःकरण की आवाज़ सुनकर खुद पर सवाल करने लगेगा तो उस प्रजाति में अवसाद, हीन भावना आदि मानसिक समस्याओं का औसत काफी बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर मानव प्रजाति के विकास में बाधा आ सकती है। इस कारण से आम इंसान का ध्यान बँटाने के लिए प्रकृति ने उसमे ऐसा तंत्र फिट किया है कि वह दुनियाभर की बुराई को मैग्नीफाई करके खुद को दिलासा देता रहता है कि "मैं तो फिर भी बहुत ठीक हूँ बाकियों से।" इस सोच को बढ़ावा देने में मीडिया का बड़ा योगदान है जिसे किसी नैरेटिव और मसाले के लिए लगभग हर कहानी में किसी ना किसी को खलनायक बनाने का शौक है। 

*) - घटनाओं की नवीनता: ...यानी रीसेन्सी ऑफ़ इवेंट्स का मतलब किसी व्यक्ति द्वारा अपनी सुविधानुसार पास की घटनाओं के हिसाब से मन बनाना। वहीं पहले हुई घटनाएँ जो उसकी याददाश्त के कम्फर्ट जोन से बाहर हों उन्हें सोच में शामिल ना करना। यहाँ सुविधा सिर्फ कुछ याद रखने के दायरे में ही नहीं बल्कि अपने एजेंडे के हिसाब से घटनाओं को रखने और हटाने में भी है। अक्सर सोशल मीडिया पर किसी राजनैतिक बहस पर आप ऐसा देख सकते हैं। किसी असत्यापित खबर पर हम इसी अनुसार सही और गलत पक्ष का निर्णय सुना देते हैं। 

*) - निजी जीवन: बाहरी घटक तो एक बार के लिए फिर भी संभाले जा सकते हैं पर अगर कोई इंसान अपने जीवन में अहम् किरदार लिए लोगो को डीमनाइज़ करना शुरू कर दे तब वह अनजाने में अपना ही नुक्सान करने लगता है। उसके पेशे, रिश्तों पर इसका बुरा असर पड़ता है। बिना किसी ठोस आधार के अपनी कल्पनाओं के अम्बार को आग लगाकर हम अपने जीवन के रावणो को ढूँढ लेते हैं। समय के साथ ये आदत प्रबल हो जाती है पर इतनी प्रत्यक्ष होकर भी हमें दिखाई नहीं देती। 

पूछें खुद से ये सवाल - उसकी जगह मैं होता तो क्या करता? 
क्या कोई ऐसी बात तो नहीं जो मुझसे अनदेखी रह गयी? 
कहीं मैं मन में गढ़ी बातों को असल बातों में मिला तो नहीं रहा?
इस मसले पर बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति की क्या राय होती?
मन के ध्यान बटाऊ टैक्टिस में फँसने के बजाय इन सवालों के ईमानदार जवाब कई मामलों में ग़लतफहमी दूर कर देंगे और शर्तिया 10 में से 8-9 बार आपकी कहानी में बिना बात कोई काल्पनिक खलनायक नहीं रहेगा। 
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Wednesday, June 7, 2017

Book Review: Ramblings of a Madman Vol. 1 (Siddhant Shekhar)


#Trendster_Approves Ramblings of a Madman Vol. 1 by Siddhant Shekhar
Amazon India Link - https://goo.gl/zm1Ih4
Review on Goodreads - https://www.goodreads.com/review/show/2021686435
P.S. Upcoming Book - Wife-beater ka Love letter

Siddhant Shekhar's story collection has been 4 years coming - and is every bit worth the wait. Ramblings of a Madman offers humor, tragedy, raves-rants and interesting human interactions in experimental backdrops in a language that is factual, playful and profound. Author's experience in science, music, literature and procrastination is a lethal mix to create extraordinary story plots. He reminds me of legend artist-author Mr. Bharat Negi. As a result of variety and vibrancy of these 13 tales, one would be hard-pushed to find an underlying theme...from 1984 anti-sikh pogroms to after death dimensions, from uber AI Robots to Mata Parvati, each of the stories collected here explore the boundaries of imagined realities. In fact, it would be ablative to seek a common subject in a book whose major accomplishments involve the awesomesauce spread of topics, dialogues and characters. This is a truly impressive collection, and will entertain and 'enlighten' in equal measure.
Rating - 9/10


Cover by Ajitesh Bohra

Sunday, May 28, 2017

Anik Planet Latest Issues #update


1 Story, 'Bogus Aliens' - Anik Planet science fiction special issue (May 2017).


1 Article - Anik Planet Female Empowerment special issue (March 2017) 
Publisher - Comics Our Passion