अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Wednesday, August 19, 2015

मोहित ट्रेंडी बाबा - "अब पछताय क्या होत है जब...ऊपर वाले की बेआवाज़ लाठी पड़ी"

मैंने लोगो को मलाल करते देखा है कि वो किन्ही कारणवश औरों के सामने अपना पक्ष ठीक से नहीं रख पाये, या अपनी बात नहीं समझा पाये और सामने वाला अपनी गलत सोच, बात, कुतर्क, उदाहरण आदि पर खुश होते हुए, यह सोचता हुआ आगे निकल गया कि वह सही था  और उसे समझाने वाले या उसके विरोध में खड़े लोग गलत। अगर ऐसा कुछ दफ़े हो जाये तो अपने अभिमान में लोग यह तक मान बैठते है कि वो हमेशा सही होते है जिस कारण अक्सर वो विषय को पूरा समझना ही नहीं चाहते। ऑनलाइन जगत का जैसे-जैसे प्रभाव मानवीय जीवन पर बढ़ा है उसमे ऐसी बातें रोज़मर्रा की सी हो गयी है। बात यहाँ ख़त्म नहीं होती, वह व्यक्ति जो किसी विषय/विषयों पर अपनी सोच अनेक वर्षो से सही मानता और अमल में लाता आ रहा है उसको अगर कोई समझा नहीं पाता, या वह किसी की नहीं सुनता तो भी उसे समय द्वारा गहरा सबक मिलता है। अगर बात बड़ी है जिस से उसका लाभ या मतलब जुड़ा है तो सबक और बुरी चोट करके जाता है। 

जैसे मेरे एक रिश्तेदार को लगता था कि संयुक्त परिवार में स्वर्ग है बिलकुल हम साथ-साथ है, हम आपके है कौन वाली छवि, साथ ही आजकल कि न्युक्लीअर फैमिलीज़ (एकल परिवार) कलियुग! लोगो ने समझाया कि जल्दबाज़ी ना करें थोड़ा और देख-समझ कर रिश्ता करें पर आँखें चकाचौंध तो लगी रही गौंद, और जल्दबाज़ी में उनकी लड़की का रिश्ता एक संयुक्त परिवार में हुआ। अब उस परिवार में भाइयों-उनकी पत्नियों और माता-पिता में छोटी-छोटी बातों में क्लेश, पैसो-संपत्ति पर विवाद, घर की मरम्मत से लेकर राशन की खरीद तक कोई पैसे नहीं खर्चना चाहता क्योकि वो तो "पब्लिक प्रॉपर्टी" हो जायेगी जो सब इस्तेमाल करेंगे। जिस स्तर पर उनकी पुत्री उनके साथ रह रही थी वह अब उस से काफी दयनीय हालत में किसी तरह समझौता करके रह रही है। इस दौर में सपनो के (या टेलीविजन, फिल्मो वाले) संयुक्त परिवार तब होते है जब आपकी आय और संपत्ति अच्छी-खासी हो ताकि ऐसी छोटी बातों पर रोज़ की झिक-झिक ना हो इसका मतलब यह नहीं कि बाकी संयुक्त परिवार सब बेकार और एकल परिवार बेहतर, यहाँ तात्पर्य यह है कि एक बँधे दायरे कि सोच में बड़े फैसले ना लें। चाहे मेरे रिश्तेदार अपने अहं के चलते खुद को अब भी सही कहें पर अंदर ही अंदर वो सच जानते है, उन्हें गहरी चोट के साथ सबक  मिला जो अब उनके किसी काम का नहीं। 

यह सिर्फ एक उदाहरण था जीवन में ऐसे छोटे-बड़े सबक लोगो को मिलते रहते है, कोशिश यह रहनी चाहिए कि हम ऐसी सीख मिलने से पहले संभल जाएँ। किसी के हित में उसे समझाने कि कोशिश करें अगर वह अड़ा रहे तो वक़्त और ईश्वर पर छोड़ दें और बाद में उसे चिढ़ाएं... :p :) (kidding)

- मोहित ट्रेंडी बाबा 

Thursday, February 12, 2015

ऊँचे लोग - मोहित ट्रेंडी बाबा

Pic - Dehradun, India

FB Group Post Excerpt
"Social media par ek observation hai....Majority aam janta aapki-mere jaisi hoti hai ki jo update, vyakti, page, group saamne dikha, sahi laga, mazaa aaya-mauka mila to like-comment kar diya unless koi pehle ka issue na ho us group, individual etc se. Hum ye nahi dekhte ki saamne wala banda reputation, paise mey ya kisi aur cheez mey humse neeche hai to like nahi karenge.

Kai logo ke paas time nahi hota zyada to wo sirf apne close circle ki activity par respond karte hai, kai logo ko like-comment awkward lagta hai ya koi aur issue hota hai isliye kum karte hai activity, unki habit bhi time ke saath pata chal jaati hai par Kuch log maine social media aur public circles mey note kiye kaafi pehle se hi wo alag hi category ke hai.

Is category ke log social media par kaafi active rehte hai, Jis field mey hote hai usme kuch rules bana lete hai ki unse upar jo log honge, ya jinse unka kaam nikal raha hoga kisi bhi tarah ka sirf unhi se interact karenge mainly. Baaki sab par almost no activity policy chahe FB, Twitter, Instagram par baithe rahen ghanto khaali...kyu? kyoki baaki to unse neeche ki janta hai...time aur efforts waste karvaane waali.

Haan, agar aap kabhi famous hue, koi national award mile, aapki painting exhibition lag jaaye, music album aa jaaye, book publish ho jaaye, bade model ban jao....tab aapko tag zaroor karenge time-time par....neechi janta ko dikhaane ke liye ki "Dekho gaon waalo...mai inhe bhi jaanta hun." 
smile emoticon
 Mera bada mann kar raha hai is category ke kuch examples dene ka par dunga nahi. (Aap sab aese nahi hai, achchhe bachche hai)"

Friday, October 17, 2014

मोहित शर्मा (ट्रेंडी बाबा) October 2014 Logs # 3

1) - माता-पिता का नजरिया

एक सिनेमा टिकट खिड़की पर माध्यम वर्गीय एक दंपत्ति और उनके किशोर लड़का, लड़की थोड़ा दूरी पर थे। उन्होंने कुछ स्वाभाविक सवाल पूछे बच्चो और आज के हिसाब से जैसे बेटे प्लैटिनम वाला लें या गोल्ड? या ये कूपन लें लें, पॉपकॉर्न वाला-कोल्ड ड्रिंक वाला? आदि ऐसे सवालो पर बच्चे बड़े रूखे और थोड़े गुस्से वाले जवाब दे रहे थे। जैसे ये सवाल पूछ कर उनके माता-पिता आस-पास के लोगो के सामने बेइज़्ज़ती कर रहे है।
ये वाकये अक्सर देखने में आते है जब बच्चे खासकर किशोरावस्था में माँ-बाप को अपने विरुद्ध मानते है या ज़माने से पीछे मोटी बुद्धि वाले। पर उनका यह व्यवहार रोटी कमाने से लेकर, जीवन की छोटी-बड़ी मुश्किलों का सामना करने के बाद बनता है। पीढ़ियां और ज़माना बदलने के बाद कुछ बातें उनके लिए नयी, अनजान होती है इस वजह से वो कुछ करने से पहले वो अपने निकटतम लोग यानी अपने बच्चो से उन बातों के बारे में जानकार निश्चिन्त होना चाहते है जैसा ऊपर के उदाहरण में वो माँ-बाप सिनेमा की सीट्स आदि की बातें एक बार बस कन्फर्म कर रहे थे अपनी संतानो से। क्योकि जीवन में कई बार उन्होंने बिना पूरी बात जाने कदम उठाये और उन्हें नुक्सान हुआ जिस कारण ये उनकी आदत में आ गया, एक आदत और बनती है उनकी वो यह की काम आसानी से हो या बिना पैसे हो तो उन्हें शक होता ही है, ये गुण भी जीवन के ज़िन्दगी की ठोकरों ने उन्हें सिखाया। उन्हें अपने नज़रिये से बात दिखाने के बजाये उनके नज़रिये को भी ध्यान में रखें, याद रहे वो आपकी उम्र का पड़ाव देख चुके है…आप नहीं।
तो अगली बार उनके स्वाभाविक सवालो पर खीज या गुस्सा ना दिखाएँ। नहीं तो कहीं फिर माता-पिता आपसे सवाल या बात करने में ही कतराने लगें। उन्हें इज़्ज़त दें, प्यार दें और उनके तजुर्बे से सीख लेते रहे क्योकि आपकी तरक्की से पूरी दुनिया ज़्यादा या कम जलेगी ज़रूर सिवाए आपके माता-पिता के।
- मोहित शर्मा (ज़हन) #mohitness #trendster #trendybaba #freelancetalents #421brandbeedifed
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2) - कुछ बड़ी मल्टीनेशनल देसी कंपनियों जैसे अमूल, पतंजलि फर्म्स, विक्को, डाबर, बजाज, विप्रो आदि का मार्किट शेयर अपने ही देश मे चिंताजनक है। मैं ये नहीं कह रहा की घरवाले केट्बरी, हैंको, यूनिलीवर के उत्पाद लें आएं तो उनका सामान वाला थैला उठाकर बाहर फेंक दें (ही ही ही…वैसे ऐसा करेंगे तो मज़ा आएगा) पर ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय कंपनियों के बारे में पढ़े और जानकारी रखें ताकि जब आप टूथपेस्ट मांगने जाओ और दुकानदार पूछे कौनसा तो कोलगेट, पेप्सोडेंट की जगह पतंजलि मेडिकेटिड, विक्को हर्बल आदि नाम निकले। साथ ही केमिकल बेस्ड प्रोडक्ट्स की जगह हर्बल-आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स को तरजीह दें, जिनकी पैकिंग-लेबलिंग तो उतनी चमक दमक वाली नहीं होती पर अंदर का माल सेहत को नुक्सान नहीं पहुँचाता।
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3) - वैसे तो रियलिटी शोज़ अब सिर्फ नाम के रियलिटी शो रह गए है पर इस सीरीज़ की बड़ी (और अंतर्राष्ट्रीय) फोल्लोविंग को देखते हुए लिख रहा हूँ। कौन बनेगा करोड़पति के इस सीजन (2014) में देख रहा हूँ की कई सामाजिक बुराईयों, शारीरिक कठिनाइयों का सामना कर चुके लोग हॉट सीट पर आ रहे है और लगभग हमेशा ऐसे वाक्यों में 25 लाख से ऊपर की धनराशि ही जीत रहे है। एक सीजन में इतने सारे ऐसे सर्वाइवर कंटेस्टेंट्स, यह असंभव है। मुझे अच्छा लगा स्टार प्लस का यह अप्रोच जो ज़रूरतमंदों को पैसा दिया जा रहा है पर फिर सीरीज़ का प्रारूप बदलें इसको रियलिटी शो ना रखकर थोड़ा सेमी-रियल बतायें, जहाँ फाइनलिस्टस का चयन ऐसी मुश्किलों से झूझें हुए लोग हों। जब यह थीम कम TRP देने लगे तो अगले सीजन में कुछ नया प्रयोग।
- मोहित ज़हन