अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Sunday, April 27, 2025

फिक्शन कॉमिक्स पत्रिका के हर अंक में मिलें मेरी रचनाओं से...

 

FC Magazine #1

यह बताते हुए खुशी हो रही है कि Fiction Comics Magazine में मेरे लेख, कहानियाँ और कॉमिक स्ट्रिप्स अब नियमित रूप से प्रकाशित हो रहे हैं।


FC Magazine #2

इस मैगज़ीन में काफी विविधता है, और अलग-अलग फॉर्मेट्स में लिखने का मौका मिल रहा है। इसके पहले चार अंक प्रकाशित हो चुके हैं, और आगे भी यह सिलसिला जारी है। आप सभी पाठकों का साथ और स्नेह बना रहे!


FC Magazine #3


FC Magazine #4

Tuesday, May 26, 2020

Contest: Book "कलरब्लाइंड बालम"


कलरब्लाइंड बालम किताब की कहानियों पर यह प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। जो लोग कहानियां पढ़ चुके हैं उनके लिए आकर्षक इनाम जीतने का मौका। आज प्रतियोगिता का पहला दिन है। यह 4-5 दिन चलेगी।

Kahaniya.com पेज से साभार -

"Kahaniya.com और FlyDreams Publications  की एक्सक्लूसिव सीरीज़ के अंतर्गत लॉन्च हुई मोहित शर्मा जी की किताब 'कलर ब्लाइंड बालम' की कहानियों से आज से अगले पाँच दिनों तक एक क्विज हमारी एप्लिकेशन पर चलाया जायेगा, जिसके लिए विजेता प्रतिभागियों को उपहार दिये जायेंगे। आप सभी इस बेहतरीन सीरीज़ को पढ़ने के लिये नीचे दिये गये लिंक पर जा सकते हैं। यह सीरीज़ आप हमारी एप्लिकेशन पर भी पढ़ सकते हैं। क्विज खेलने के लिए आपको एप्लिकेशन ज़रूर डाउनलोड करनी होगी। इस क्विज में शाम 6 से रात के 9 बजे तक आप हमारी एप्लिकेशन पर भाग ले सकते हैं। आज के प्रश्न शुरु की तीन कहानियों से पूछे जायेंगे।"
पढ़ने के लिए क्लिक करें - https://www.kahaniya.com/s/colour-blind-balam-6eAP45
एप्लिकेशन डाउनलोड करने के लिए लिंक - https://play.google.com/store/apps/details?id=com.viven.android.kahaniyaofficial

Saturday, May 23, 2020

Book Promo - Kuch Meter par Zindagi


एक नई किताब | नई कहानियां
कुछ मीटर पर ज़िन्दगी
FlyDreams Publications
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"पिछले कई सालों से ब्लॉग और कई फैन फिक्शन लिख चुके मोहित शर्मा का नाम पाठकों के लिए किताबी दुनिया मे नया जरूर होगा, लेकिन हिंदी लेखन में कोई नया नहीं है। इंटरनेट के इस युग में शार्ट फिल्म्स से लेकर, कॉमिक्स, ब्लॉग हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं। मोहित शर्मा कहानियों को नई तरह से देखना जानते हैं साथ ही यह कहानियों को खास मुकाम पर पहुंचाना जानते हैं। इनकी कहानियां अलग-अलग विषय में होती है। तो तैयार रहिए, क्योंकि जल्द ही आप पढ़ेंगे इनकी कहानियां इनकी नई किताब "कुछ मीटर पर ज़िन्दगी" में।"
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#ज़हन

Sunday, August 11, 2019

झूठी शान (बच्चों को नैतिक संदेश देती कहानी)

 बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानी - झूठी शान
पीडीएफ के अलावा ड्राफ्ट मिल नहीं रहा। वहाँ से कहानी यहाँ लाने पर corrupt characters/font दिख रहे हैं. इस वजह से स्क्रीनशॉट साझा कर रहा हूँ। कहानी गौरी अर्द्धवार्षिक पत्रिका में प्रकाशित।

#ज़हन

Saturday, April 7, 2018

तन-मन का वहम (कहानी) #ज़हन

Art - Azika H.

एक अंधेरे गलियारे में विजय बेचैनी से घूम रहा था। दूर अपनी पत्नी जीवा की परछाई देख उसकी उलझन कुछ कम हुई। 
"बड़ी देर लगा दी इस बार?"

जीवा - "हाँ, अमीर लोगों में रिश्तेदार तो कम होते हैं पर उनके चेले-चपाटो की भीड़ इतनी रहती है कि समय लग गया।"

जीवा अपनी पहचान बदल कर एक निजी अस्पताल से जुड़वाँ बच्चे चोरी कर लायी थी। दोनों की अपेक्षा से उलट काम जल्दी और आसानी से हो गया। कुछ दिन शांत रहने के बाद डीलर से एकसाथ दो बच्चों का बढ़िया दाम मिलने की उम्मीद थी। 

उसी रात जीवा ने विजय को जगाया। 

"सुनो मेरा मन कुछ अजीब सा हो रहा है। तबियत ख़राब लग रही है। तुम्हे पूरे शरीर में खुजली नहीं हो रही?"

विजय - "हाँ, हरारत सी तो लग रही है। मैं तुझसे पूछने ही वाला था।"

जीवा ने संकोच से पूछा - "कहीं किसी ने बददुआ तो नहीं दे दी? कोई छाया-प्रेत ना छोड़ दिया हो..."

विजय - "हाँ! 2 दर्जन बच्चे उठाने के बाद तो जैसे तुझे बड़ी दुआएं मिली होंगी। शायद मौसम बदलने का असर होगा। अभी गोली ले लेते हैं...सुबह देखेंगे।"

सुबह दोनों के हाल ख़राब हो गये थे। जगह-जगह चकत्ते पड़ गये थे, तेज़ बुखार और हरी-नीली नसें बाहर आने को थी।

जीवा - "देखो मैंने कहा था ये किसी ऊपरी आत्मा का प्रकोप है। दोनों बच्चे एकदम ठीक हैं। अभी भी समय है, हम बच्चे लौटाकर माफ़ी मांग आते हैं।"

हर पल बिगड़ती हालत में विजय और जीवा को यही सबसे सही उपाय लगा। बच्चा चोर व्यापार चैन के दोनों मज़दूर, बच्चों को लेकर अस्पताल गये। जल्द ही पुलिस के साथ बच्चों के घरवाले आ गये। जीवा और विजय बच्चों के अभिभावकों से अपने कर्मों की माफ़ी मांगने लगे और खुद से ऊपरी छाया हटाने की विनती करने लगे। तब हवलदार ने उन्हें बताया - "तुमपर कोई प्रेत-व्रत नहीं है। यह युगल अफ्रीका के देश घाना से लौटा हैं। जहाँ से लौटते हुए इन्हे वहाँ फैल रहा रोटोला रोग हो गया है। स्त्री के गर्भवती होने, शुरुआती लक्षण गंभीर होने के कारण दंपत्ति इस अस्पताल में भर्ती हो गया और संयोग से उसी दिन ये दो बच्चे हो गये। माँ से यह संक्रमण बच्चों में आ गया। अगले दिन रोटोला के सही इलाज के लिए इन्हे शहर के बड़े हॉस्पिटल भेजा जाना था कि उस से पहले ही तुमने बच्चे उठा लिये।"

विजय ने अपनी चुसी हुई काया की शक्ति जुटाकर पूछा - "...तो ये बच्चे कैसे ठीक थे?"

हवलदार - "ठीक नहीं थे, उनपर दवाई की भारी डोज़ का असर था इसलिए पूरे लक्षण पता नहीं चल रहे थे।"

 वैसे गलती दोनों की थी पर खीजते विजय का मन जीवा को थप्पड़ मारने का था...उसमें अब शक्ति कहाँ थी।

समाप्त!
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Friday, December 8, 2017

Ishq Baklol (Hindi Novel) Review


"इश्क़ बकलोल", नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि खुद में एक बड़ा बाज़ार बन चुकी फूहड़ता का फायदा उठाने को एक पुस्तक और लिख दी गयी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसी रोलरकॉस्टर राइड सी भारतीय परिवेश में भावनाओं की गुत्थमगुत्था है इश्क़ बकलोल। 2012 में देवेन पाण्डेय जी ने अपने अनुभवों, इनके साथ घटी बातों पर लिखना शुरू किया तब लगा कि कई शौकिया लेखकों की तरह ये कुछ समय बाद लेखन को टाटा कर देंगे। नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां संभालते हुए इन्होने लेखन जारी रखा और कम समय में काफी सुधार किया। एक दिन इनका मैसेज आया कि इन्होने एक उपन्यास लिखा है और मैं उपन्यास की इंट्रो पोएम लिखूं। उपन्यास का संक्षिप्त आईडिया जो सुना उसके अनुसार एक नज़्म भेज दी। सूरज पॉकेट बुक्स के सौजन्य से इश्क़ बकलोल अब बाजार में उपलब्ध है, जिसकी अच्छी बिक्री हो रही है। 

कवर पेज इंटरनेट से किसी स्टॉक तस्वीर को ना लेकर आकर्षक चित्रांकन रखा गया। सूरज पॉकेट बुक्स की ये पहल मुझे बढ़िया लगी। कहानी के विस्तार में ना जाकर इतना कहूँगा कि इसे रोमांटिक के बजाय एक सामाजिक उपन्यास कहना उचित होगा। भारतीय समाज के अंदर बसी विविधता को बड़ी सुंदरता से दर्शाया है। जीवन की घटनाओं - दुर्घटनाओं के बीच किस तरह हम बिना सोचे कितना कुछ कर जाते हैं (या असमंजस में कुछ नहीं करते) जिनके दूरगामी परिणाम जीवन की दिशा बदल देते हैं। कहानी के दौरान पात्रों की प्रवृत्ति -नज़रिये में आये बदलाव अच्छे लगे। अक्सर ज़बरदस्ती करैक्टर आर्क दिखाने के चक्कर में घटक जोड़ दिए जाते हैं वो यहाँ नहीं हुआ। मनोरंजन की दुनिया में मार्केटिंग जुमला बन चुके फ़र्जी देसीपन की जगह यहाँ किरदारों में असली देसीपन पढ़ने को मिला। कुछ जगह भाषा शैली, कथा के प्रवाह और दृश्य परिवर्तन में सुधार की सम्भावना है, जिसे पहले प्रयास के हिसाब से अनदेखा किया जा सकता है। ये देवेन जी का स्नेह है कि कहानी में एक किरदार मेरा भी है। मुझे पता चला कि मेरा किरदार बड़ा था पर कहानी के लिए उसे छोटा करना पड़ा (इस कारण रेटिंग में आधा अंक काट लेता हूँ....हाहा)। आशा है आगामी उपन्यास और भी धमाकेदार हो। शुभकामनाएं!

उपन्यास के संसार में देवेन पाण्डेय के पदार्पण को मैं रेट करता हूँ - 7.5/10

P.S. मुझे नहीं पता कि मैं रात के डेढ़ बजे अपनी रसोई में धूप का चश्मा लगाकर सेल्फी क्यों ले रहा हूँ।

Saturday, July 29, 2017

सीमा समाप्त! (हिन्दी हॉरर कहानी) #ज़हन

रात के 3 बजे सरोर पुलिस थाने से सटे कमरे में सोते दीवान जी की किवाड़ ज़ोर से धड़धड़ाई। यकायक हुई तेज़ आवाज़ से दीवान जी उठ बैठे। उन्होंने तो जूनियर मुंशी को थाने पर किसी इमरजेंसी के लिए बैठाया था फिर ऐसा क्या हो गया जो उनकी ज़रुरत आन पड़ी? शायद कहीं रोड होल्डअप या डकैती पड़ गई। असल में 62 वर्ष और कागज़ पर साढ़े 59 साल की उम्र में रिटायरमेंट के करीब दीवान जी को किसी झंझट में पड़ना पसंद नहीं था इसलिए वो नौकरी में कम से कम जोखिम चाहते थे। आजकल लोग पुलिस पर केस भी बहुत करने लगे थे। उन्होंने मन बनाया कि अगर संभव होगा तो वो अपनी जगह जूनियर मुंशी को भेज देंगे। 

जब किवाड़ धड़-धड़ कर टूटने को हुई तो दीवान जी चिल्लाये। 

"अरे! रुको यार आ रहा हूँ। ऐसा कौनसा मंत्री मर गया यहाँ छोटे से सरोर में....वो भी आधी रात को?"

अँधेरे में दीवान जी को अपने थाना इंचार्ज दरोगा जी की झलक सी दिखी और उनके पीछे बनल थाने के इंचार्ज इंस्पेक्टर साहब थे, जिनके थाने की सीमा सरोर से मिलती थी। 

"ओह जय हिन्द साहब! किसी हमराह सिपाही को भेज दिया होता आपने। मैं वर्दी पहन कर अभी आया।"

मुँह-हाथ धोकर वर्दी पहनने में दीवान जी को 6-7 मिनट लगे, उन्हें अजीब लगा कि इस बीच थाने में बैठने के बजाए के बजाये दोनों अफसर उनके निवास के बाहर अँधेरे में खड़े रहे। 

इंस्पेक्टर साहब खरखराती आवाज़ में बोले - "हमारे साथ एक मौके पर चलना है।"

दोनों तेज़ कदमों से कुछ लंगड़ाते हुए से चलने लगे। आधी नींद से जगे दीवान जी को लगा कि या तो कोई पैसे की बात है या कहीं हाथ से निकली वारदात पर लिखा-पढ़ी कैसे की जाए इसलिए पूरे थाने में बिना किसी सिपाही को बुलाये सिर्फ उन्हें उठाया गया। जीप में दोनों अधिकारी आगे बैठ गए और दीवान जी पीछे आ गए। बैठने पर उन्हें एक व्यक्ति बंधा हुआ दिखा जिसके मुँह में कपडा ठूँसा हुआ था। उसे देखकर लगा किसी अपराधी का फर्जी एनकाउंटर होने वाला है। 

सीनियर अफसरों के सामने दीवान जी ने लिहाज़ में कुछ पूछना उचित नहीं समझा। बिजली की किल्लत वाले कसबे में अमावस की रात का अँधेरा ऊपर से जीप की जर्जर बैटरी से मोमबत्ती सी जलती हेडलाइट्स में कुछ देखना मुश्किल था। जीप तेज़ गति से बनल थाने की ओर बढ़ रही थी। बँधे हुए व्यक्ति को हिलते हुए देख इंचार्ज के सामने पॉइंट बनाने को आतुर दीवान जी बोले। 

"सर आपको तो ड्राइवर की ज़रुरत ही नहीं! एकदम एक्सपर्ट! और तू भाई नीचे पड़ा रह शान्ति से....अब हिलने उं-उं करने का क्या फायदा? जो पाप तूने किये होंगे साहब लोग उसी की सज़ा दे रहे हैं तुझे। मरने से पहले क्यों तकलीफ दे रहा है अपने-आप को?"

जीप दोनों थानों की सीमा पर एक सुनसान मोड़ पर आकर रुकी। 

दीवान जी ने कुछ नोटिस किया। 

"सर आप दोनों की वर्दी से खून टपक रहा है। कुछ किया था क्या इस बदमाश ने?"

जवाब में जीप की बैटरी में जाने कैसे जान सी आ गयी और दीवान जी को सब साफ़ दिखने लगा। उं-उं करके हिल रहा व्यक्ति कोई अपराधी नहीं बल्कि बनल थाने का दीवान था। दोनों अफसरों की वर्दी से खून इसलिए रिस रहा था क्योकि दोनों के शरीर को बीच में से आधा काटा गया था और अब बनल थाना इंचार्ज का आधा दांया भाग सरोर के दरोगा के बायें भाग से जुड़ा था और सरोर दरोगा का दायां हिस्सा बनल इंचार्ज इंस्पेक्टर के बायें हिस्से से जुड़ा था। इस कारण ही ये दोनों शरीर लंगड़ा कर चल रहे थे और इनकी आवाज़ें भी सामान्य से अलग थीं। 

भयावह मुस्कान बिखेरते चेहरों को देख डर से गिर पड़े और दूर घिसटने की कोशिश कर रहे दीवान जी के पास आकर दोनों शरीर बैठ गए और बोले - "पिछले हफ्ते यहाँ पड़ी डकैती तो याद होगी दीवान जी? डकैत यहाँ एक एस.यू.वी. गाडी रोक एक परिवार के 8 लोग लूट कर सबको गोली मार गए थे। यहाँ से गुज़र रहे राहगीरों ने 100 नंबर कण्ट्रोल रूम फोन किया तो सूचना दोनों थानों पर गई। अब चूँकि यह इलाका दोनों थानों की सीमा है तो दोनों ने मामला काफी देर तक एक-दूसरे पर टाल दिया और तड़पता हुआ परिवार मदद की देरी में दम तोड़ गया। वो बेचारी आत्माएं लौटी और ना इसका ना मेरा करके हम दोनों को आधा-आधा काट गई जैसे हम अपनी ज़िम्मदारी को काट गए थे। पुलिस कण्ट्रोल रूम ने फ़ोन किया आपको और बनल के दीवान जी को और दोनों ने अपने-अपने थाना इंचार्ज को ये आईडिया दिया कि क्यों झंझट में पड़ना। वो आत्माएं उन डकैतों को निपटाने गई हैं हम दो जिस्म, दो जानों को एक काम सौंप कर... जैसे हम अधकटे एक-दूसरे से चिपके हैं, वैसे ही तुम दोनों दीवान के शरीर हमें काट कर, अलग-अलग जोड़ने हैं एकदम जैसे हम दोनों के शरीर जोड़े उन आत्माओं ने। 

फिर उन दोनों लंगड़ाते शरीरों ने बनल के दीवान और सरोर के दीवान जी के शरीर बीच से फाड़ने शुरू किये जिस से आस-पास का समां मौत से पहले की चीखों से भर गया। दोनों मृत शरीर को एक-दूसरे के आधे हिस्सों से जोड़ दिया गया। अगले दिन उस सीमांत मोड़ पर लोगो को चार लाशें मिली। हर लाश में 2 अलग-अलग इंसानो की आधी लाशें थी। 

समाप्त!
 - मोहित शर्मा ज़हन
Artwork - Thanh Tuan
#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents #trendybaba 

Monday, July 17, 2017

हाँ पता है...(feat. जूता) - सामाजिक कहानी


सज्जन - "मोहित जी आपको पता है फिलिस्तीन के लोगो पर इजराइल कितना ज़ुल्म कर रहा है? म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय का क्या हाल किया है वहाँ के बहुसंख्यक बौद्ध समाज ने?"
"हाँ जी! पता है...और मुझे नाइजीरिया में बोको हराम द्वारा सरकार से युद्ध और स्थानीय लोगो का नरसंहार पता है, दशकों से इराक़ और तुर्की द्वारा लगातार कुर्द, यज़ीदी समुदाय की एथनिक क्लेंज़िंग पता है, पाकिस्तान, ईरान के विरुद्ध बलूचिस्तान के लोगो संघर्ष पता है, अंगोला में चल रही कबीना लड़ाई पता है, रूस-चेचेन्या क्राइसिस पता है, रूस-यूक्रेन युद्ध पता है, इंडोनेशिया और पपुआ निवासियों के कुछ वर्गों की लड़ाई पता है, कोलंबिया, मेक्सिको और दक्षिण अमेरिकी देशों में नशे के व्यापार में चल रहे संघर्ष पता हैं, इतना ही नहीं माली, सूडान, दक्षिण सूडान, सीरिया, कांगो, सोमालिया, यमन, फिलीपींस, अफगानिस्तान, केंद्रीय अफ्रीका गणराज्य में चल रहे गृह युद्धों के बारे में पता है। बाकी दुनियाभर में कई छोटे-बड़े समुदाय आपस में या स्थानीय सरकारों से संघर्ष कर रहे हैं और अनेकों समुदाय संघर्ष करते-करते लुप्त हो गए।
मुझे एक बात और पता है, तुम मिडिल क्लास परिवार से हो जिनका जीवन खुद में एक जंग है। पहले अपनेआप को इतना काबिल बनाओ कि किसी गलत को सही कर सको, अपने परिवार से बाहर भी लोगो की मदद कर सको। अगर ऐसा ना कर पाओ तो गलत को गलत ज़रूर कहो पर फिर हर तरह के गलत को गलत कहो पर तुम तो मज़हब के हिसाब से ज़ुल्म देख रहे हो जो गलत है। अगर तुम्हे हर ज़ुल्म पर एक जैसा दर्द नहीं होता तो थू है तुम्हारी सोच पर! अब आगे क्या करना है पता है ना?"
सज्जन - "हाँ मोहित जी! मैं जूता उठाकर अपने मुँह पर मार लेता हूँ।"
"अरे नहीं भाई, मेरा मतलब था कि अब काम पर ध्यान दो और तरक्की करो...ताकि जिन बातों पर परेशान होते हो उन्हें बदलने की कोशिश करने लायक बन सको।"
कुछ देर बाद - 
सज्जन - "समझ गया! मैं चलता हूँ।"
"रुको! मुँह इधर करो, जूता तो खाते जाओ।"
समाप्त!
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- #मोहित_शर्मा_ज़हन
Artwork - Neil Wilson
#mohitness #civilwars #crisis #selectiveoutrage #media

Saturday, March 18, 2017

Acid Attack Painting with Artist Jyoti Singh


Painting Theme: Acid Attack with Artist Jyoti Singh, 30x30 inch, Oil on Canvas. 
#concept #art #painting #brainstorming #acidattacks #canvas #oilpainting

Thursday, February 16, 2017

सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी) #ट्रेंडस्टर

अपने छोटे कस्बे से दूर सपनो के सागर में गोते लगाता एक रीमा और मनोज का जोड़ा बड़े शहर के कबूतरखाना स्टाइल अपार्टमेंट में आ बसा। जितना व्यक्ति ईश्वर से मांगता है उतना उसे कभी मिलता नहीं या यूँ कहें की अगर मिलता है तो माँगने वाले की नई इच्छाएं बढ़ जाती है। कुछ ऐसा ही इस दम्पति के साथ हुआ, सोचा कितना कुछ और हाथ आया ज़रा सा...वैसे यह 'ज़रा सा' भी करोडो के लिए किसी सपने जैसा होता पर कहता हैं ना 99 का फेर मौत तक पीछा नहीं छोड़ता।

दोनों को ही अपने बड़े संयुक्त परिवारों से परहेज था। तीज-त्यौहार पर घर जाना या घर से किसी का इनसे मिलने आना इन्हें हफ़्तों पहले ही चिंता में डाल देता था। मनोज के घर को दोनों सर्कस कहते थे और रीमा के घर को बाराबंकी बाजार। इन दोनों को लगता था कि परिवार के लोग इनके कभी काम नहीं आते जबकि ये हर महीने - महीने में उनका कोई छोटा-मोटा काम कर देते थे। जबकि ऐसा था नहीं, बस सुविधानुसार जब इनसे जुड़ा कोई काम जैसे मकान की रजिस्ट्री, गाडी फंसने पर थाने फ़ोन कर छुड़वाना आदि किसी घरवाले द्वारा किया जाता था तो ये दोनों उसे काम मानते ही नहीं थे।

ऑफिस की तरफ से वनकल वन्य अभयारण्य में घूम रहे रीमा-मनोज का उनके गाइड और ड्राइवर समेत एक उग्रवादी संघठन द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। उस संघठन ने हाल ही में अपनी माँगो के लिए कुछ हत्याएं की थी। बंधक अपने भाग्य को कोस ही रहें होते हैं कि तभी एक आवाज़ आती है....

"अरे फूफा जी! चरण स्पर्श, कैसे हो आप?"
मनोज की फ्रीज़ मुद्रा अभी टूटने में समय लगता तो रीमा बोल पड़ी - "जीता रह कुन्नू बेटे! कितना बड़ा हो गया तू...16 साल का!"
कुन्नू - "आप लोग यहाँ कैसे?"
मनोज - "बेटा तेरी बुआ जी ने पता नहीं कौन सी सरिता-गृहशोभा में सेकंड हनीमून का पढ़ लिया तबसे मेरे कान खा लिए। फिर ऑफिस से यह टूर मिला तो आ गए। तू इस सब में...."

रीमा ने अपने पति को इतनी जोर की कोहनी मारी कि उसके मुँह से आगे की बात निकली ही नहीं। ज़्यादा बात होती उस से पहले ही वहाँ नक्सल विरोधी फ़ोर्स का हमला हो गया। डिप्टी कमांडर कुन्नू ने अपनी बुआ जी और फूफा जी को खतरे से अपनी जान पर खेल कर निकलवाया। इस गोलाबारी में रीमा घायल हो गयी, घायलो को लाया गया शहर के अस्पताल। यहाँ डॉक्टर मनोज के कजिन निकले जिस वजह से इलाज में रीमा को प्राथमिकता मिली। गोली के असर से रीमा की किडनी फेल हो गई और उसे नई किडनी की ज़रुरत थी। अब रीमा के 'बाराबंकी बाजार' से उसकी चाची जी काम आयीं और रीमा को समय पर किडनी मिल गयी।

एक दिन आराम से अपने कबूतरखाने की निन्नी सी बालकनी में चाय पीते हुए दोनों ने आँखों में ही एक-दूसरे से जैसे कहा हमारे 'सर्कस' या 'बाराबंकी बाजार' से हमे कितना कुछ मिलता है पर सुविधानुसार हम अपनी तरफ से किये गए काम याद रखते हैं और वहाँ से मिला सहारा हम कभी देखना ही नहीं चाहते। अब दोनों फिजियोथेरेपी और स्ट्रेस, डिप्रेशन कम करने के लिए साइकैट्री इलाज करवा रहें हैं....हाँ, वो डॉक्टर भी परिवार वाले या उनकी जान पहचान के निकल आये हैं।

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Yasni Database
Read छूटी डोर (कहानी)

Sunday, November 20, 2016

अपना उधार ले जाना! (नज़्म) - मोहित शर्मा ज़हन


अपना उधार ले जाना!

तेरी औकात पूछने वालो का जहां, 
सीरत पर ज़ीनत रखने वाले रहते जहाँ, 
अव्वल खूबसूरत होना तेरा गुनाह, 
उसपर पंखो को फड़फड़ाना क्यों चुना?
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!

पत्थर को पिघलाती ज़ख्मी आहें,
आँचल में बच्चो को सहलाती बाहें,
तेरे दामन के दाग का हिसाब माँगती वो चलती-फिरती लाशें। 
किस हक़ से देखा उन्होंने कि चल रही हैं तेरी साँसे?
तसल्ली से उन सबको खरी-खोटी सुना आना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!
माँ-पापा के मन को कुरेदती उसकी यादें धुँधली,
देखो कितनो पर कर्ज़ा छोड़ गई पगली।
ये सब तो ऐसे ही एहसानफरामोश रहेंगे,
पीठ पीछे-मिट्टी ऊपर बातें कहेंगे,
तेरी सादगी को बेवकूफी बताकर हँसेंगे,
बूढे होकर बोर ज़िन्दगी मरेंगे।
इनके कहे पर मत जाना,
अपनी दुनिया में खोई दुनिया को माफ़ कर देना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!

ख्वाबों ने कितना सिखाया, 
और मौके पर आँखें ज़ुबां बन गयीं...
रात दीदार में बही,
हाय! कुछ बोलने चली तो सहरिश रह गई...
अब ख्वाब पूछते हैं....जिनको निकले अरसा हुआ,
उनकी राह तकती तू किस दौर में अटकी रह गई....
कितना सामान काम का नहीं कबसे,
उन यादों से चिपका जो दिल के पास हैं सबसे,
पुराने ठिकाने पर ...ज़िन्दगी से चुरा कर कुछ दिन रखे होंगे,
दोबारा उन्हें चैन से जी लेना...
इस बार अपना जीवन अपने लिए जीना,
अबकी आकर अपना उधार ले जाना!

बेगैरत पति को छोडने पर पड़े थे जिनके ताने, 
अखबारों में शहादत पढ़, 
लगे बेशर्म तेरे किस्से गाने। 
ज़रा से कंधो पर साढ़े तीन सौ लोग लाद लाई,
हम तेरे लायक नहीं,
फिर क्यों यहाँ पर आई?
जैसे कुछ लम्हो के लिए सारे मज़हब मिला दिए तूने,
किसी का बड़ा कर्म होगा जो फ़रिश्ते दुआ लगे सुनने.... 
छूटे सावन की मल्हार पूरी कर आना,
....और हाँ नीरजा! अबकी आकर अपना उधार ले जाना!

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*नीरजा भनोट को नज़्म से श्रद्धांजलि*, कल प्रकाशित हुई ट्रिब्यूट कॉमिक "इंसानी परी" में यह नज़्म शामिल है।

Saturday, November 5, 2016

सेलेब्रिटी पी.आर. का घपला (लेख) - मोहित शर्मा ज़हन

पैसा और सफलता अक्सर अपने साथ कुछ बुरी आदते लाते हैं। कुछ लोग इनसे पार पाकर अपने क्षेत्र में और समाज में ज़बरदस्त योगदान देते हैं वहीं कई शुरुआती सफलता के बाद भटक जाते हैं। एक बड़े स्तर पर आने के बाद प्रतिष्ठित व्यक्ति पर इमेज, ब्रांड मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी आ जाती है लोगो पर, अब या तो आप मेहनत और साफ़-सुथरे तरीके से ये काम करे या फिर अपनी मन-मर्ज़ी का जीवन जीते हुए बाद मे अपने कृत्यों को सही ठहराने की कोशिश करें। इन्ही में कुछ विख्यात लोग लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अपने पीआर एजेंट या नेटवर्क का सहारा लेते हैं। जैसे अगर कोई सेलिब्रिटी कोई गलत बात, काम करता पकड़ा जाए या उसकी वजह से जनता, समाज को कोई नुक्सान हो तो अपनी टीम की मदद से वो ये बातें प्रचारित करने की कोशिश करेगा कि उसका ये मतलब नहीं था वो तो इस काम से समाज की मानसिकता दिखाना चाहता/चाहती थी या उसे सेलिब्रिटी होने की सज़ा मिल रही है। ये सही है....सेलिब्रिटी होने के मज़े तक सब ठीक पर उस लाइफ में एडजस्ट करने वाले हिस्सो में शिकायत करो। 

उदाहरण के लिए किसी सेलिब्रिटी ने एक मुद्दे पर बिना जानकारी के कोई बेवकूफी भरी बात कही अब उसका सोशल मीडिया आदि जगह मज़ाक उड़ा। तो उसकी बेवकूफी गयी एक तरफ और उसने निकाल लिया अपने अल्पसंख्यक, महिला या किसी अन्य मजबूरी का कार्ड, फिर क्या मीडिया, जनता का ध्यान कहीं और गया। यानी अगर उस बात की तारीफ़ होती तब कोई दिक्कत नहीं थी, जहाँ एक वर्ग ने मज़ाक उडा दिया तो घुमा-फिरा कर बात अपने ऊपर मत आने दो। 

साथ ही ये लोग समय, स्थिति के अनुसार नए-नए स्टंट सोचते हैं। जैसे अपने बीते जीवन में किसी दुखद काल्पनिक घटना को जोड़ देना या किसी बीमारी (खासकर मानसिक) से जूझकर उस से जीतना दिखाना। क्या यार....आपके एक जीवन में घटनाओ का घनत्व कुछ अधिक नहीं हो गया? मैं यह नहीं कह रहा कि सब बड़े लोग ऐसा दिखावा करते है पर ऐसा करने वाले लोगो का अनुपात बहुत ज़्यादा है। आम जन - ख़ास लोग सबका जीवन चुनौतियों, संघर्षो वाला होता है पर ज़बरदस्ती के पीआर स्टंट कर के कम से कम खुद से झूठ मत बोलिये। इस नौटंकी के बिना भी आप लोकप्रिय और महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर जनता का ध्यान ला सकते हैं (बशर्ते आप वैसा करना चाहें ना की केवल अपनी पब्लिसिटी के चक्कर में पड़े रहे)। हालांकि, पैसे के पीछे भागते मीडिया को नैतिक-अनैतिक से कोई मतलब नहीं होता। हर दिन कुछ नया वायरल करने की होड़ में मीडिया के लिए कुछ नैतिकता की सोचना पाप है। वैसे व्यक्ति के बारे में थोड़ी रिसर्च और पहले का रिकॉर्ड देख कर आप जान सकते हैं कि कौन सही दावा कर रहा है और कौन पीआर के रथ पर सवार है। 

जो पाठक सोच रहे है कि क्या फर्क पड़ता है? बेकार में मुद्दा बनाया जा रहा है! अगर ऐसा करने से किसी को नुक्सान नहीं पहुँच रहा तो क्या गलत है? उन मित्रो से मेरा यह कहना है कि कभी-कभी किसी वर्ग को लंबे समय से छद्म रूप से हो रहा नुक्सान सीधे नुक्सान से बड़ा होता है। जिन लोगो को वाकई मीडिया, जनता के ध्यान-पैसे की आवश्यकता है वो बेचारे तरसते रह जाते हैं और उनका हिस्सा, उनकी फुटेज गलत संस्थाएं, लोग खा लेते हैं। मुश्किल है पर सबसे निवेदन है कि अपरंपरागत न्यूज़ सोर्सेज पर ध्यान दें, सही लोगो-संस्थाओ को आगे बढ़ने मे हर संभव मदद करें। छोटे बदलाव से धीरे-धीरे ही सही पर बड़ा असर पड़ेगा। 

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Monday, August 22, 2016

निर्णय (लघुकथा)

प्रांप्ट - "टूटती शाखें" प्रतियोगिता के लिए

शोल कबीले के सरदार का निर्णय सभी सदस्यों के लिए एक झटका था। उनका प्रमुख जिसने दशकों इस कबीले का नेतृत्व किया, हर सदस्य को जीने के गुर सिखाये...आज उनके द्वीप पर 7 जहाज़ों से आये बाहरी लोगो का प्रस्ताव मान रहा था। सरदार ने स्थिति भांप अपना पक्ष रखा - "मेरा तो जीवन कट गया, पर अपने गार्सिया द्वीप के बदले बाहर ये विदेशी आप सबको बेहतर जीवन और ठिकाना देंगे..."

सरदार की बात एक युवक ने काटी - "...पर अपना सब कुछ छोड़कर उनकी शर्तों पर जीना कहाँ का इंसाफ है? इतने साल आपसे युद्ध कौशल सीखने का क्या लाभ? धिक्कार है ऐसी कायरता पर!"

सरदार - "एक बार मेरे बचपन में कुछ विदेशीयों ने ऐसी शर्त मेरे जन्मस्थान द्वीप टाइगा पर रखी थी। 450 से अधिक कबीलेवासी शर्त न मान कर लड़े और क्या खूब लड़े। उनमे मेरे परिवार समेत सिर्फ 8 परिवार टाइगा से पलायन कर बच पाए। तब जहाज़ 2 थे और इन जहाज़ों से बहुत छोटे थे। उस समय विशाल वृक्ष से टूटी धूलधूसरित शाखें किसी तरह फिर से कोपल सींच पाईं पर ज़रूरी नहीं हर बार ऐसा हो। बाहर जाओ और शोल वृक्ष को समृद्ध करो, इतना की आज उनकी शर्त पर जियो और कल सक्षम बन उनको अपनी शर्त पर झुकाओ। आज ख़ाक हो जाओगे तो कल कभी नही आएगा।"

- मोहित शर्मा ज़हन

Monday, June 27, 2016

शोबाज़ी (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


छात्रों के पास से गुज़रती प्रोफेसर के कानो में कुलदीप की एक बात पड़ी। 

"हमारे पूर्वजो ने तुम्हे बचाया। तुम लोगो के घर-बार और तुम्हारी बहु-बेटियों की इज़्ज़त लुटने से बचाने वाले हम लोग ही थे। अगर हम न होते तो क्या होता तुम्हारे समुदाय का?"

प्रोफेसर के कदम थम गए, ऐसा वाक्य उन्होंने पहली बार नहीं सुना था। वो उन लड़को के समूह के पास गईं और बोलीं। 

"तो क्या अपने पूर्वजो के कामो की अलग से रॉयल्टी चाहिए?" 

प्रोफेसर को उग्र देख कुलदीप सहम कर बोला - "ऐसी बात नहीं है मैम...मैं तो बस..."

प्रोफेसर - "देखो कुलदीप, जिन समुदाय-लोगो की तुम बात कर रहे हो उनकी संख्या करोड़ो में थी और इतिहास देखोगे तो हर धर्म के लोगो ने अनेको बार एक दूसरे पर एहसान और अत्याचार किए हैं। यह संभव है जिन पूर्वजो की तुम बात कर रहे हो उनके पूर्वजो या उनसे भी पहले उस मज़हब के लिए किसी और समुदाय ने कुछ अच्छे काम किए हों जिनसे उनके जीवन मे सकारात्मक बदलाव आए हों। इतिहास जानना ज़रूरी है पर पुरखों से शान उधार लेकर अपने नाम पर लगाना गलत है। खुद समाज के लिए कुछ करो फिर यह शोबाज़ी जायज़ लगेगी...हाँ, माता-पिता या दादा आदि की संपत्ति, गुडविल, रॉयल्टी अलग बात है पर 1492 में कुलदीप से ऊपर 32वी पीढ़ी ने क्या तीर मारे वो किताबो तक ही रहने दो, उनका क्रेडिट तुम मत लो...क्योंकि ऐसे हिसाब करोगे तो फिर कभी हिसाब होगा ही नहीं।"

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelancetalents #freelance_talents

Saturday, June 25, 2016

Mail Drafts 2008 Stories

आज 2 पुराने मेल ड्राफ्ट्स दिखे जिनमे ये कहानियां थी। इनसे संतुष्ट तो नहीं हूँ पूरी तरह क्योकि रिसर्च और सही प्रारूप की कमी लग रही है पर फिर भी यहाँ शेयर कर देता हूँ।  


1. मुफ्तखोर

जिला न्यायालय के बाहर एक व्यक्ति को कुछ मीडियाकर्मी घेरे खड़े थे। 

पत्रकार - "जैसा हमने ब्रेक से पहले दर्शकों को बताया कि अभिनेता-कॉमेडियन हरबंस जी ने नामी कॉमेडियन सुखबीर पाल पर अपने 4 चुटकुले चुराने का केस दायर किया है। अब वो हमारे साथ हैं, हरबंस जी सभी जानना चाहते हैं हैं कि सिर्फ 4 चुटकुलों के लिए आपने सुखबीर पाल जी पर केस क्यों डाला। इतना तो आपको उन 4 चुटकुलों से मिलता नहीं जितना आप अब भाग-दौड़ में गंवा देंगे?"

हरबंस - "बात पैसों की न होकर सही-गलत की है। एक सच्चा कलाकार वर्षों तक अपनी विधा में मेहनत कर अलग स्टाइल, कंटेंट खोजता है जबकि सुखबीर पाल जैसे लोग एक ऐसे सॉफ्टवेयर (एग्रीगेटर) की तरह होते हैं जो अपना समय सिर्फ अन्य कलाकारों खासकर छोटे या स्थानीय मंच वाले कलाकारों की कला चुराकर पेश करने का काम करते हैं। केवल मैं ही नहीं उनके शोज़ में अन्य हास्य अभिनेताओं का छिटपुट काम दिख ही जाता है। हम लोग 2-4 शहरों में रोज़ी के लिए बुढ़ापे तक दौड़ते रहते हैं और इन्हे देश-दुनिया में लोग राजा बना देते हैं फिर एक दिन किसी पार्टी में हमारे किसी किस्से या पंच पर पीछे से कोई गाली देते हुए कहता है ये तो फलाने सुपरस्टार का उठा लिया मुफ्तखोर ने! पते की बात यह है कि सब पता होते हुए भी, दुकानदार से मोल-भाव में झूझते हुए, पत्नी-बच्चों को बेहतर जीवन न दे पाने पर उनसे नज़रे चुराने के बाद भी हम लोग सफलता का ऐसा रास्ता नहीं अपनाते क्योकि...दिल नहीं मानता।"

 समाप्त!

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2. सुधार

आज के मुख्य समाचार पर 2 भाइयों की नज़र थी, "वर्षो से पीड़ित AZ वर्ग को फलाना क्षेत्र में 50% कोटा मिला, जहां पहले उनकी भागीदारी केवल 28% थी और XW वर्ग का वर्चस्व था।

भरत - "वाह! यह तो अच्छी खबर है, समान अधिकार सबका हक़ है।"
सुमंत - "खबर तो अच्छी है पर कुछ चिंता का विषय भी हैं।"
भरत - "आप फैसले से खुश नहीं, हम XW वर्ग से हैं कहीं इसलिए तो आप परेशान नहीं?"
सुमंत - "ऐसी बात नहीं है। बात यह है कि एक क्षेत्र में 2 वर्गों के बीच अंतर कई सदियों से बना है जिसको एकदम से अगर बराबर करने की कोशिश की जाएगी तो देश पर और भावी पीढ़ियों पर बहुत दबाव पड़ेगा। दोनों वर्गों में उस काम और क्षेत्र के प्रति जो मानसिकता है उसके कारण AZ वर्ग में उस क्षेत्र से जुड़ी शैक्षिक योग्यता, अनुभव और कौशल काफी कम है। इस आदेश के बाद 50 प्रतिशत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए ज़बरदस्ती कम योग्य लोग लिए जाएंगे जिसका असर ना केवल इस क्षेत्र पर बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। साथ ही XW वर्ग के कई योग्य उम्मीदवार रह जाएंगे, क्योंकि यहाँ हज़ार-डेढ़ हज़ार लोगो की नहीं लाखों-करोड़ों लोगो की बात हो रही है।"

भरत - "तो इसका समाधान क्या होना चाहिए?"
सुमंत - "28 प्रतिशत की वर्तमान भागीदारी में हर सीजन 2-3 प्रतिशत कोटा बढ़ायें ताकि उचित संख्या में भागीदारी होने तक देश पर अतिरिक्त दबाव ना पड़े। नहीं तो यहां वही हाल होगा कि गांव के नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी की बात चली और प्रधान ने सीट छोड़ी तो बेचारी गरीब महिलाओं को किसी ने नहीं पूछा बल्कि प्रधान की पत्नी ही गांव की नई प्रधान बन गई और खानापूर्ति के लिए सरकारी रिकॉर्ड में दिखा दिया कि यह गांव एक महिला के नेतृत्व में है। तो धीरे-धीरे पहले नींव मजबूत हो फिर आगे काम किया जाए।"

समाप्त!
- मोहित शर्मा ज़हन

Tuesday, March 8, 2016

दूसरों का देवता (कहानी) – #मोहित_ट्रेंडस्टर

दो पडोसी बड़े कबीलों नर्मक और पालेसन के पुराने बैर में न जाने कितनी लड़ाइयां, खून हुए थे। मुख्य वजह थी दोनों कबीलों के धर्म और देवताओं का अलग-अलग होना। इसी दुश्मनी की नयी कड़ी में नर्मक के सेनापति और कुछ बलशाली सैनिको की टुकड़ी, रात के अँधेरे में, पालेसन के लोगो का मनोबल गिराने के लिए उनका धार्मिक स्थल तोड़ने और विशालकाय देव की मूर्ति खंडित करने पहुंचे। अमावस रात्रि किसी पालेसन वासी का धार्मिकस्थल के पास ना जाने की प्रथा के रूप में उन्हें मौका मिला था।

नर्मक सेनापति – “यह धार्मिक स्थल ढहा दो। जितना नुक्सान कर सकते हो करो।”

धार्मिकस्थल उम्मीद से अधिक कमज़ोर था इसलिए कुछ ही देर में ढहने लगा। इतनी जल्दी नर्मक दल के किसी सदस्य को स्थल ढहने की अपेक्षा नहीं थी। गिरते विशालकाय पत्थरों में सबको मौत दिखने लगी। सेनापति की वीरता पानी भरने चली गयी। तभी पालेसन देव की प्रतिमा इस कोण पर नर्मक दल पर गिरी की सब स्थल के बीचो बीच दबने के बाद भी बच गए।

पालेसन वासियों ने घायल नर्मक दल को बाहर निकाला और पालेसन प्रमुख ने उन्हें यह कहकर वापस नर्मक जाने दिया।…

“अंतर हम इंसान करते है, भगवान नहीं!”

नर्मक दल ने जाने से पहले पालेसन धार्मिकस्थल के दोबारा निर्माण में अपना श्रम दान दिया और अपनी जनता, प्रमुख को समझाने का वायदा किया।

समाप्त!

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#mohitness #mohit_trendster #freelancetalents

Friday, March 4, 2016

"Aap karen to hunar...humare liye guzar-basar" (Toon with Tadam Gyadu)


"Aap karen to hunar...humare liye guzar-basar"
Old unpublished toon (2013)....Pencils - Tadam Gyadu, Letters - Youdhveer Singh

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  Comics Reel 
"Satirical Comics by emerging artist Tadam Gyadu and writer Mohit Trendster.
Tadam Gyadu was also recently credited as the penciler in ADRISHYA SHADYANTRA along with Hemant Kumar.
We wish him luck and success for his career and hope to see many great comics in future."

Monday, September 14, 2015

इंसानी गिद्ध (कहानी) - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


"क्या अम्मा, कैसे हुआ यह?" सहानुभूति भरे स्वर में इलाके के नेता ने पूछा।"

"बस भईया भगवान की मर्ज़ी थी, उन्हें अपने पास बुला लिया।" बुढ़िया ने सुबकते हुए बताया।  

गाँव में एक वृद्ध की प्राकृतिक मौत के बाद यह नेता और इसके गुर्गे वैसी ही तेज़ी से वृद्धा के पास पहुंचे जैसे किसी ख़ुशी के अवसर पर जाने कहाँ से किन्नर आ जाते है। यह पहला मौका नहीं था, इस से पहले इस गाँव और आस-पास के गाँवो में अनेकों जगह नेता जी ऐसी शोक की घड़ियों का हिस्सा बने थे। 

नेता ने बात बनती देख काम जल्दी निपटाने का फैसला किया। "ओये सुदामा! अम्मा जी को पैसे दे और बॉडी को रखवा गाडी में तरीके से।"

अम्मा को ढाई हज़ार रुपये पकड़ा कर सुदामा एक खरीददार के जैसे हक़ से मृत शरीर की तरफ बढ़ा। 

 अम्मा संकोच से बोली - "बेटा ज़रा..."

नेता ने आदतानुसार बात काटी - "अम्मा, काका जी, मेरे भी पिता सामान थे। पूरी रीति से करेंगे उनका अंतिम संस्कार, अब कहाँ भागती फिरोगी इंतज़ाम के लिए बुढ़ापे में और यह पैसा सरकार दे रही है आपको, रख लो। यह तो आपका हक़ है।"

यह कहकर वृद्धा का आशीर्वाद लेते हुए टोली वहां से निकली। 

नेता - "वाह! आज काम कितनी जल्दी हो गया, इस अम्मा की तरह बाकी सब नहीं मिलते घंटो झिक-झिक करते है। चल अब संभावली को मोड़ गाडी।"

एक जूनियर गुर्गा बोला - "नेता जी वहां लगातार पाँच किये है, किसी और गाँव चलते है।"

फिर इस टोली ने एक अलग गाँव में जगह छाँट कर मृत वृद्ध के गले में फंदा डाल के पेड़ से लटका दिया। अगले दिन तहसीलदार एवम बाकी अधिकारीयों को बताया गया कि एक और कर्ज़े में डूबे किसान ने फसल बर्बाद होने की वजह से आत्महत्या कर ली। वृद्धा के नाम पर मिले एक लाख रुपये का मुआवज़ा कुछ सरकारी अफसरों के साथ बाँट कर नेता एंड पार्टी ने बचे 50 हज़ार गटके और किसी दूर दराज़ इलाके में अगली मौत का इंतज़ार करने लगे। पर नेता अनुसार वो शरीफ था क्योकि कम से कम वो मुआवज़े के लिए लोगो के मरने का इंतज़ार तो करता था, नहीं तो कुछ जगहों पर ऐसे नेता बूढ़े, लाचार और बेसहारा लोगो की हत्या तक कर रहे थे सरकार से राहत राशि पाने के लिए। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा (ज़हन)