अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Saturday, January 27, 2024

Journeyman to World Champion Quote

....Want to share an inspirational quote I wrote today.

 "Just hang in there, be a relentless journeyman, for every journeyman's path lies the potential to emerge as a champion." - #mohit_trendster 

#mohitness #PerseverancePaysOff #Inspiration #NeverGiveUp

Saturday, January 20, 2018

Tuesday, December 12, 2017

सामाजिक समस्याओं में अंतर (लेख)

Art - Mari Bobghiashvili‎
समस्या जीवन का अभिन्न अंग है। कुछ पाना है, कुछ करना है...सांस तक लेते रहना है तो भी कोई ना कोई समस्या मुँह बाये तैयार रहती है। हाँ, वीडियो गेम के लेवल की तरह कोई समस्या आसानी से निपट जाती है और कोई समस्या कितने ही संसाधन और समय व्यर्थ करवाती है। कुछ बड़ी समस्याएं जटिल होती हैं और सामाजिक परतों में अंदर तक फैली होती हैं। इन समस्याओं में ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपराध, भेदभाव, बाल शोषण, अशिक्षा, ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण आदि शामिल हैं। बचपन से इन समस्याओं के बारे में पढ़ाया जाता है और हर रोज़ इनसे जुड़े पहलुओं पर दुनियाभर में ख़बरें, वार्ता होती रहती हैं। एक समय बाद समाज इन समस्याओं का इतना अभ्यस्त हो जाता है कि अगर कोई बड़ी खबर ना हो तो इनकी तरफ ध्यान नहीं जाता। ये बातें सामने होकर भी अनदेखी सी होने लगती हैं। सरकार और लोगो की जागरूकता से स्थिति बेहतर हो सकती है पर पूरी तरह ठीक होना असंभव है। वहीं दूसरी तरफ कुछ मुद्दे छोटे स्तर, छोटे क्षेत्र-लोगों और कम समय वाले होते हैं। 

कुछ नये को सामान्य से बहुत अधिक प्रतिक्रिया मिलती है इसलिए आम जनता और सभी तरह का मीडिया 1 दिन, 2 दिन या कुछ हफ़्तों तक उस खबर को प्राथमिकता से देखते-दिखाते हैं। इसी क्रम में कभी-कभार किसी घटना पर जनता के बड़े हिस्से की नकारात्मक प्रतिक्रिया आती है और देश-दुनियाभर में प्रदर्शन, मांगें, विरोध और यहाँ तक की हिंसा भी हो जाती है। किसी के लिए छोटी सी बात किसी अन्य समूह के लिए उनकी पहचान पर सवाल या अपमान की तरह देखी जाती है। अगर ध्यान दें तो ये "छोटी" बातें उन बड़े मुद्दों का ही वेरिएशन होती हैं जो हम अनदेखा कर देते हैं। ये कुछ ऐसा है जैसे किसी फिल्म की थीम प्रेम कहानी, एक्शन, एनिमेशन या यात्रा वृतांत हो सकती है पर दर्शक उस फिल्म को इन थीम के वेरिएशन के लिए देखने जाते हैं यानी इस प्रेम कहानी में क्या नया हुआ, नयी कलाकार मण्डली कैसे साथ आयी। नयी चीज़ का "नॉवल्टी" होना कुछ समय के लिए जिज्ञासा जगाता है और जब लोग बात से ऊब जाते हैं तो उसकी जगह ताज़ी बातें ले लेती हैं। 

ऊपर समझाया गया संदर्भ बिना जाने, एक बात लोग अक्सर कहते हैं कि देश में जघन्य अपराध, ग़रीबी जैसे मुद्दों पर तो कुछ नहीं होता! उनपर किसी को कोई धरना, विरोध प्रदर्शन आदि नहीं करते नहीं देखा...पर देखो इन नासमझ लोगों को जो छोटी बात या ज़रा से स्थानीय मुद्दे पर तिल का ताड़ बना रहे हैं। पहली बात, बिना उस पक्ष की पूरी बात जाने एकतरफा नरेटिव पर कभी प्रतिक्रिया ना दें। मानव के सामने चुनौती रहे हज़ारों-लाखों वर्षों वाले मुद्दों की तुलना 4-6 दिन की अस्थाई बात से ना करें। ये एक दुखद सच्चाई है कि अन्याय, बुराई कम किये जा सकते हैं पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सकते। कितनी आसानी से कह दिया "कोई कुछ नहीं करता!" जिन बड़ी समस्याओं की आप बात कर रहे हैं देश-दुनिया में अनगिनत स्कूलों, विश्वविद्यालयों में उनपर अलग से सर्टिफिकेट, डिग्री पाठ्यक्रम तक पढ़ाये जाते हैं। रोज़ जगह-जगह हज़ारों जागरूकता एवम मदद प्रोग्राम, सेमिनार, कैंपेन आयोजित किये जाते हैं। कितने ही सरकारी विभाग, निजी संस्थाएं उन समस्याओं पर अनुसंधान और उनके निवारण (उन्हें कम करना बेहतर शब्द होगा) के लिए मौजूद हैं। हाँ, मैं मानता हूँ कि लोगों को और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है, साथ ही विभागों, संस्थाओं की कार्यप्रणाली और कार्यान्वयन को बेहतर किया जा सकता है पर ऐसी फ़िल्मी डायलॉगबाज़ी से बचें कि कोई कुछ नहीं करता। कोई नहीं बल्कि करोड़ों लोग करते हैं इसलिए सामान्य बात नज़रों में आते हुए भी बच जाती है। वो करोड़ों लोग इस सामान्य से काम को करना छोड़ दें तो दुनिया की बैंड बज जायेगी। इस वजह से जेनेरिक (व्यापक) समस्याओं को स्पेसिफिक (छोटी पर नयापन लिए अलग) घटनाओं के बराबर रखना जायज़ नहीं है। समाज सेवा के अनेकों अवसर ठीक आपके सामने होंगे, कोसने के अलावा उन अवसरों को चुनने की हिम्मत भी रखें। 

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#ज़हन 

Wednesday, November 22, 2017

ग्राहक ज़रा बचके (लेख)


सामान, सेवा बेचने वाले व्यापारियों की एक श्रेणी अधिक पैसा कमाने के लिए कई ग़लत तरीके आज़माती है। आज उनमे से एक तरीके पर बात करते हैं। हर व्यक्ति के लिए अपनी पहचान, अहं का कुछ मोल होता है। जैसे अगर आप किसी बड़े होटल में खाना खा रहे हों तो आप अपने घर जैसे इत्मीनान, मौज से नहीं खायेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि आप वहाँ भोजन कर रहे अन्य लोगो के सामने शालीन बने रहने चाहते हैं। हालांकि, उनमे कोई आपको जानता नहीं और शायद आगे कभी जीवन में सामने भी ना आये पर फिर भी असहज ना लगे और इस आधे-एक घंटे अपनी अच्छी छवि बनी रहे इसलिए थोड़ा एडजस्ट करना चलता है। ये जो ईगो-इमेज वाली असहजता है कुछ दुकानदार इसका फायदा उठाते हैं। मान लीजिये आपको एक ख़ास तरह का टूथपेस्ट पसंद है जो आस-पास नहीं मिलता। जब तक आपका उस टूथपेस्ट लेने वाली जगह जाना नहीं होता तब तक काम चलाने के लिए आप कोई और टूथपेस्ट लेने जाते हो। अब वो दुकानदार आपको 150 रुपये का टूथपेस्ट उठाकर दे देता है। आप सोचते हो कि मेरे वाला प्रोडक्ट जल्द लेना ही है तो क्यों ना छोटा, सस्ता टूथपेस्ट ले लूँ। झिझक के साथ आप मना करने को बड़बड़ाते हो तो दुकानदार झूठी हँसी, या तंज भरे स्वर में 'भोला' सवाल करता है कि अन्य ग्राहक, दुकानकर्मियों का ध्यान आप दोनों पर जाता है। 

अब "ज़रा सी बात" पर आपको ताकते लोगो के सामने झेंपकर आप कहते हो कि "लाओ ये ही दे दो!" या फिर आप मन ही मन दुकानदार की ट्रिक समझ उसे कोसते हुए कहीं और से टूथपेस्ट खरीदने निकल जाते हो। अधिकतर पहली स्थिति होती है इसलिए दुकानदार ये रिस्क ले लेता है। थोड़ा वह आपके हावभाव, आदत के अनुसार अपनी बात रखता है। केवल कुछ अधिक बेचने में ही नहीं उत्पाद से सम्बंधित ग्राहक के सवालों को ख़त्म करने के लिए भी "ये बचकाने सवाल हैं" की हँसी या बर्ताव का स्वांग करता है। 

तीसरा और दुर्लभ तरीका है दुकानदार पर पलटवार - "घर में फलाना (काफी महँगे) टूथपेस्ट के बॉक्स पड़े हैं। वो तो ख़ास डीलर पर मिलता है आपके यहाँ होगा नहीं तो सोचा एक बार के इस्तेमाल के लिए फलाना छोटा साइज ले लूँ...टीवी पर इसके बड़े एड देखे हैं। ये बड़ा साइज जो आप दे रहे हो ये तो पड़ा-पड़ा ख़राब होगा! है क्या आपके पास फलाना प्रोडक्ट? (तंज वाली हँसी जोड़ें)" यह बस एक उदाहरण भर है। स्थिति अनुसार ऐसे जवाब देने और व्यापारी को इस तरह फायदा ना देने के लिए हमेशा तैयार रहें। 
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#ज़हन

Monday, November 13, 2017

केस स्टडी: बदलते दौर में ढलता स्टारडम


इंटरनेट (अंतरजाल) जो पहले मिलने-जुलने, कोडिंग, हल्के मनोरंजन और जानकारी का साधन था वो धीरे-धीरे दुनियाभर के कलाकारों के लिए एक अथाह मंच बन गया। हालाँकि, इस मंच में कई कमियाँ हैं पर फिर भी इसका लाभ करोड़ों लोगो को मिला है। आज अंतरजाल की दुनिया से एक रोचक केस अध्ययन। इंटरनेट सर्फ करते हुए श्रद्धा शर्मा के यूट्यूब चैनल पर जाना हुआ। अप्रैल 2011, 15 साल की उम्र में इस लड़की ने बॉलीवुड गानों के कवर यूट्यूब पर डालने शुरू किये जो उस समय भारत में अनसुनी तो नहीं पर एक नयी बात थी। कुछ समय बाद श्रद्धा के गाये चौथे अपलोड "हाल ए दिल" गाने के कवर को कम समय में 10 लाख से अधिक व्यूज़ मिले और रातों-रात श्रद्धा का नाम हो गया। स्थानीय , राष्ट्रीय अखबारों-पत्रिकाओं ने उसपर सुर्खियाँ बनायीं, कई कॉलेज फेस्ट से न्यौते आने लगे। जहाँ उसके प्रशंसकों की कमी नहीं थी वहीं आलोचक भी बढ़ रहे थे। जिनका मत था कि श्रद्धा टैलेंट के बदले नोवेल्टी के कारण चल रही है, नहीं तो लाखों भारतीय गायक-गायिकाएँ जो यूट्यूब पर नहीं हैं या जिन्हे एडिटिंग आदि का ज्ञान नहीं है इस प्रसिद्ध गायिका से कहीं बेहतर हैं। उसके बाद 2013-14 की खबर थी कि श्रद्धा की डेब्यू एल्बम आ रही है जिसका निर्माण और संगीत निर्देशन लेस्ली लुईस कर रहे हैं। 2014 में एल्बम आने के बाद से श्रद्धा शर्मा के कुछ वेब विज्ञापन, कोलैबोरेशन आये पर कोई बड़ी अपडेट नहीं मिली। 

हैरानी की बात यह है कि अब 6-7 वर्ष बाद श्रद्धा के यूट्यूब चैनल के सब्सक्राइबर्स 2 लाख 34 हज़ार हैं यानी शुरुआती बूम के बाद बहुत कम लोग श्रद्धा के चैनल से जुड़े। उस दौर में जो बड़ी बात थी अब हज़ारों भारतीय चैनल्स, तरह-तरह के कलाकारों को श्रद्धा की तुलना में कहीं अधिक प्रशंसक और प्रतिक्रिया मिलती हैं। कभी अग्रिम पंक्ति में खड़ी श्रद्धा कंटेंट क्रिएटर्स की भीड़ में कहीं गुम सी हो गयी। ऐसा क्यों हुआ? इसपर कुछ बातें -

*) - जहाँ इंटरनेट ने सबको मंच दिया वहीं बढ़ती प्रतिभावान भीड़ के साथ प्रतिस्पर्धा का स्तर भी बढ़ गया है। जो बातें आज से कुछ वर्ष पहले चल जाती थी उनका आज के परिवेश में हिट होना काफी मुश्किल है। हर क्षेत्र में गिने चुने लोग ही चोटी पर बने रह सकते हैं। उनके अलावा आम जनता का ध्यान उस क्षेत्र में सक्रीय अन्य कलाकारों पर कम जाता है। एक शैली अगर लोग पसंद करेंगे तो कुछ ही दिनों में उस से ऊबकर कंटेंट क्रियेटर से कुछ नया करने की मांग करेंगे। अगर कलाकार कुछ नया नहीं कर पाता तो लोग अन्य विकल्पों की तरफ बढ़ जाते हैं। 

*) - अगर आर्टिस्ट के काम में मौलिकता की कमी हो और वह अधिकांश अन्य कलाकारों के काम को आधार बनाकर कुछ करता हो तो एक समय बाद उसका काम आकर्षण खोने लगता है। ऐसे में अगर उसके मौलिक काम का स्तर औसत या उस से नीचे हो तो ना सिर्फ उसके प्रशंसक बल्कि वह खुद अपने आप में विश्वास खोने लगता है। अगर ऐसा हो रहा है तो उसे अपनी कमियों को पहचान कर उनपर काम शुरू कर देना चाहिए और ऐसे तरीकों पर काम करना चाहिए जिनका पालन कर उसके मौलिक काम का स्तर स्वीकार्य स्तर तक आ सके। 

*) - एक महत्वपूर्ण बात ये है कि किसी व्यक्ति के लिए सफलता और उस स्तर पर बने रहने का मोल क्या है? अगर जीवन में सफलता जल्दी मिल जाये तो उसका मोल आसान लगने लगता है जबकि बड़े स्तर पर बने रहने के लिए निरंतर पापड़ बेलते रहने पड़ते हैं। थोड़ा बहुत आलस्य या ब्रेक अपनी जगह ठीक है पर मेहनत के विकल्प या काल्पनिक दिलासे ढूँढ लेने से आप एक भूला-बिसरा नाम बनकर रह जाते हैं। 

*) - जगह और माहौल बदलने के बाद आर्टिस्ट को अपने क्षेत्र से जुड़े कई घटक पता चलते हैं। उसे लगता है कि अभी कुछ बनाने से पहले कितना कुछ सीखना बाकी है। इस कारण जिस खुलेपन से कलाकार पहले काम करता था वो बरक़रार नहीं रहता। लोगों के साथ-साथ उसकी खुद की अपेक्षा होती है कि हर बार वह पहले से बेहतर करे और अगर किसी वजह से ऐसा नहीं हो पाता तो वह अपने सीमित दायरे में बँध जाता है। इस घेरे से निकलने के लिए ज़रूरी है कि धीमी ही सही पर कुछ रचनात्मक गति बनी रहे, प्रयोग होते रहें। 

भविष्य में क्या होगा ये कहा नहीं जा सकता पर अगर श्रद्धा गायन की अन्य विधाओं, शैलियों को सीखकर नये प्रयोग करें तो स्थिति में काफी सुधार हो सकता है। आशा है ऐसा ही हो!
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#ज़हन

Saturday, November 5, 2016

सेलेब्रिटी पी.आर. का घपला (लेख) - मोहित शर्मा ज़हन

पैसा और सफलता अक्सर अपने साथ कुछ बुरी आदते लाते हैं। कुछ लोग इनसे पार पाकर अपने क्षेत्र में और समाज में ज़बरदस्त योगदान देते हैं वहीं कई शुरुआती सफलता के बाद भटक जाते हैं। एक बड़े स्तर पर आने के बाद प्रतिष्ठित व्यक्ति पर इमेज, ब्रांड मैनेजमेंट की ज़िम्मेदारी आ जाती है लोगो पर, अब या तो आप मेहनत और साफ़-सुथरे तरीके से ये काम करे या फिर अपनी मन-मर्ज़ी का जीवन जीते हुए बाद मे अपने कृत्यों को सही ठहराने की कोशिश करें। इन्ही में कुछ विख्यात लोग लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अपने पीआर एजेंट या नेटवर्क का सहारा लेते हैं। जैसे अगर कोई सेलिब्रिटी कोई गलत बात, काम करता पकड़ा जाए या उसकी वजह से जनता, समाज को कोई नुक्सान हो तो अपनी टीम की मदद से वो ये बातें प्रचारित करने की कोशिश करेगा कि उसका ये मतलब नहीं था वो तो इस काम से समाज की मानसिकता दिखाना चाहता/चाहती थी या उसे सेलिब्रिटी होने की सज़ा मिल रही है। ये सही है....सेलिब्रिटी होने के मज़े तक सब ठीक पर उस लाइफ में एडजस्ट करने वाले हिस्सो में शिकायत करो। 

उदाहरण के लिए किसी सेलिब्रिटी ने एक मुद्दे पर बिना जानकारी के कोई बेवकूफी भरी बात कही अब उसका सोशल मीडिया आदि जगह मज़ाक उड़ा। तो उसकी बेवकूफी गयी एक तरफ और उसने निकाल लिया अपने अल्पसंख्यक, महिला या किसी अन्य मजबूरी का कार्ड, फिर क्या मीडिया, जनता का ध्यान कहीं और गया। यानी अगर उस बात की तारीफ़ होती तब कोई दिक्कत नहीं थी, जहाँ एक वर्ग ने मज़ाक उडा दिया तो घुमा-फिरा कर बात अपने ऊपर मत आने दो। 

साथ ही ये लोग समय, स्थिति के अनुसार नए-नए स्टंट सोचते हैं। जैसे अपने बीते जीवन में किसी दुखद काल्पनिक घटना को जोड़ देना या किसी बीमारी (खासकर मानसिक) से जूझकर उस से जीतना दिखाना। क्या यार....आपके एक जीवन में घटनाओ का घनत्व कुछ अधिक नहीं हो गया? मैं यह नहीं कह रहा कि सब बड़े लोग ऐसा दिखावा करते है पर ऐसा करने वाले लोगो का अनुपात बहुत ज़्यादा है। आम जन - ख़ास लोग सबका जीवन चुनौतियों, संघर्षो वाला होता है पर ज़बरदस्ती के पीआर स्टंट कर के कम से कम खुद से झूठ मत बोलिये। इस नौटंकी के बिना भी आप लोकप्रिय और महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर जनता का ध्यान ला सकते हैं (बशर्ते आप वैसा करना चाहें ना की केवल अपनी पब्लिसिटी के चक्कर में पड़े रहे)। हालांकि, पैसे के पीछे भागते मीडिया को नैतिक-अनैतिक से कोई मतलब नहीं होता। हर दिन कुछ नया वायरल करने की होड़ में मीडिया के लिए कुछ नैतिकता की सोचना पाप है। वैसे व्यक्ति के बारे में थोड़ी रिसर्च और पहले का रिकॉर्ड देख कर आप जान सकते हैं कि कौन सही दावा कर रहा है और कौन पीआर के रथ पर सवार है। 

जो पाठक सोच रहे है कि क्या फर्क पड़ता है? बेकार में मुद्दा बनाया जा रहा है! अगर ऐसा करने से किसी को नुक्सान नहीं पहुँच रहा तो क्या गलत है? उन मित्रो से मेरा यह कहना है कि कभी-कभी किसी वर्ग को लंबे समय से छद्म रूप से हो रहा नुक्सान सीधे नुक्सान से बड़ा होता है। जिन लोगो को वाकई मीडिया, जनता के ध्यान-पैसे की आवश्यकता है वो बेचारे तरसते रह जाते हैं और उनका हिस्सा, उनकी फुटेज गलत संस्थाएं, लोग खा लेते हैं। मुश्किल है पर सबसे निवेदन है कि अपरंपरागत न्यूज़ सोर्सेज पर ध्यान दें, सही लोगो-संस्थाओ को आगे बढ़ने मे हर संभव मदद करें। छोटे बदलाव से धीरे-धीरे ही सही पर बड़ा असर पड़ेगा। 

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Saturday, July 2, 2016

2 अंत (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन

एक निजी कंपनी के 2 सहकर्मी दोपहर का भोजन साथ कर रहे थे। 

अनिरुद्ध - "मुझे पता चला कि आप हवाई यात्रा नहीं करते। अफवाह है या विमान में बैठने से डर लगता है?"

रोनित - "सही सुना है आपने। हवाई यात्रा से डर नहीं लगता, पहले कई बार बैठ चुका हूँ।"

अनिरुद्ध - "अरे...आपको कंपनी के काम से देश में कहाँ-कहाँ जाना पड़ता है। ऐसे तो बहुत समय बर्बाद होता होगा...आखिर विमान यात्रा से बचने का क्या कारण है?"

रोनित - "हमारे घर के एक पुराने पंडित जी हैं, आज तक उनकी बताई हर बात सच हुई है। उन्होंने बताया कि मेरी मृत्यु एक विमान दुर्घटना में होगी तो मैंने सोचा जब तक सिर पे कोई आपात स्थिति न पड़े तब तक तो विमान यात्रा से बचने का प्रयास करूं।"

अनिरुद्ध - "हम्म...जैसा आप अपने पंडित जी के बारे में बता रहे हैं फिर तो इतनी सावधानी सही है।"

उसी रात रोनित को अनिरुद्ध का फोन आया। 

अनिरुद्ध - "माफ कीजिए अब कॉल कर रहा हूँ, रोनित जी। एक विचार मन में आया सोचा आपसे साझा करूं। यह भी तो हो सकता है कि विमान दुर्घटना में विमान जिस जगह पर क्रैश हो वहाँ आप मौजूद हों।"

अंत 1) - रोनित को उस रात के बाद से कभी चैन की नींद नहीं आई। 

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अंत 2) - अनिरुद्ध की बात सुनकर रोनित कुछ बोल पाता उस से पहले ही कॉल कट गई और कुछ देर बाद ही अनिरुद्ध को पता चला कि रोनित के घर पर एक यात्री विमान गिरा है जिसमे सभी यात्रियों समेत रोनित की मृत्यु हो गई है। 

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #freelancetalents #freelance_talents #trendybaba

Wednesday, September 16, 2015

Indian Superheroes Fake FB Convos


*) - Tiranga, Chacha Chaudhary

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*) - Anthony and Tiranga

#comics #indiancomics #superheroes #convos #mohitness #mohit_trendster #trendybaba 

Wednesday, September 9, 2015

छद्म मुफ्तखोरी - लेखक मोहित शर्मा ट्रेंडस्टर


"जीवन में कुछ भी मुफ्त का खाने वाले मुझे बिलकुल नहीं पसंद ! अरे मेहनत करो, संघर्ष करो दुनिया में, अपनी पहचान बनाओ।" नीतू ने पिकनिक में लंच करते हुए, यूँ ही डिस्कशन कर रही मित्रमण्डली के सामने अपने विचार रखे। 

माहौल हल्का करने के लिए उसकी पुरानी बेस्टी सरिता ने कहा - "देखो मैडम को मुफ्त का खाने वाले नहीं पसंद और बातों-बातों में परांठे के एक कौर में ढक कर मेरा आचार ही गायब कर दिया।"

सबके चेहरों पर मुस्कराहट आ गयी पर बातों को समझने में समय लगाने के कारण ग्रुप की ट्यूबलाइट कही जाने वाली लड़की रीमा अब भी नीतू की बात का विश्लेषण करते हुए बोली - "पर नीतू तुम खुद भी तो कितना मुफ्त का खाती हो! तो दूसरो से शिकायत क्यों?"

सरिता - "लो बहनजी ने सिग्नल लेट तो पकड़ा ही आज गलत भी पकड़ा। तेरा बॉयफ्रेंड निगल लिया क्या नीतू ने फ्री में?"

रीमा ने सरिता को नज़रअंदाज़ करके नीतू से कहा - "देखो नीतू मैं हमेशा तुम्हे किसी समूह की ओट लिये देखती हूँ, उनकी सामूहिक साख या उनके इतिहास का सहारा लिए देखती हूँ। जैसे "मुझे गढ़वाली होने पर गर्व है", "प्राउड टू बी ए गर्ल", "ब्राउन पीपल आर द बेस्ट", "पक्की ठाकुर लड़की हूँ" और भी बहुत कुछ। ऐसा अकेली तुम नहीं करती, ये आम आदत है लोगो में। यह सब क्या है? जिन बातों पर हमारा बस नहीं, केवल हमारे जन्म से हमसे जुड़ गयी...उनपर गर्व या शर्म करने का क्या मतलब? कुछ गिनाना है तो अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियाँ, प्रतिभा, मेहनत से मिली चीज़ें गिनाओ, ऐसे समूह की आड़ लेकर खुद को महान घोषित करना भी अव्वल दर्ज़े की मुफ्तखोरी है। 

कुछ देर के लिए बगले झांकती सहेलियाँ आज "ट्यूबलाइट" की चमक में फ़ीकी पड़ गयीं। 

समाप्त!

मोहित शर्मा (ज़हन)
#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #india #message #story #freelance_talents

Wednesday, August 19, 2015

मोहित ट्रेंडी बाबा - "अब पछताय क्या होत है जब...ऊपर वाले की बेआवाज़ लाठी पड़ी"

मैंने लोगो को मलाल करते देखा है कि वो किन्ही कारणवश औरों के सामने अपना पक्ष ठीक से नहीं रख पाये, या अपनी बात नहीं समझा पाये और सामने वाला अपनी गलत सोच, बात, कुतर्क, उदाहरण आदि पर खुश होते हुए, यह सोचता हुआ आगे निकल गया कि वह सही था  और उसे समझाने वाले या उसके विरोध में खड़े लोग गलत। अगर ऐसा कुछ दफ़े हो जाये तो अपने अभिमान में लोग यह तक मान बैठते है कि वो हमेशा सही होते है जिस कारण अक्सर वो विषय को पूरा समझना ही नहीं चाहते। ऑनलाइन जगत का जैसे-जैसे प्रभाव मानवीय जीवन पर बढ़ा है उसमे ऐसी बातें रोज़मर्रा की सी हो गयी है। बात यहाँ ख़त्म नहीं होती, वह व्यक्ति जो किसी विषय/विषयों पर अपनी सोच अनेक वर्षो से सही मानता और अमल में लाता आ रहा है उसको अगर कोई समझा नहीं पाता, या वह किसी की नहीं सुनता तो भी उसे समय द्वारा गहरा सबक मिलता है। अगर बात बड़ी है जिस से उसका लाभ या मतलब जुड़ा है तो सबक और बुरी चोट करके जाता है। 

जैसे मेरे एक रिश्तेदार को लगता था कि संयुक्त परिवार में स्वर्ग है बिलकुल हम साथ-साथ है, हम आपके है कौन वाली छवि, साथ ही आजकल कि न्युक्लीअर फैमिलीज़ (एकल परिवार) कलियुग! लोगो ने समझाया कि जल्दबाज़ी ना करें थोड़ा और देख-समझ कर रिश्ता करें पर आँखें चकाचौंध तो लगी रही गौंद, और जल्दबाज़ी में उनकी लड़की का रिश्ता एक संयुक्त परिवार में हुआ। अब उस परिवार में भाइयों-उनकी पत्नियों और माता-पिता में छोटी-छोटी बातों में क्लेश, पैसो-संपत्ति पर विवाद, घर की मरम्मत से लेकर राशन की खरीद तक कोई पैसे नहीं खर्चना चाहता क्योकि वो तो "पब्लिक प्रॉपर्टी" हो जायेगी जो सब इस्तेमाल करेंगे। जिस स्तर पर उनकी पुत्री उनके साथ रह रही थी वह अब उस से काफी दयनीय हालत में किसी तरह समझौता करके रह रही है। इस दौर में सपनो के (या टेलीविजन, फिल्मो वाले) संयुक्त परिवार तब होते है जब आपकी आय और संपत्ति अच्छी-खासी हो ताकि ऐसी छोटी बातों पर रोज़ की झिक-झिक ना हो इसका मतलब यह नहीं कि बाकी संयुक्त परिवार सब बेकार और एकल परिवार बेहतर, यहाँ तात्पर्य यह है कि एक बँधे दायरे कि सोच में बड़े फैसले ना लें। चाहे मेरे रिश्तेदार अपने अहं के चलते खुद को अब भी सही कहें पर अंदर ही अंदर वो सच जानते है, उन्हें गहरी चोट के साथ सबक  मिला जो अब उनके किसी काम का नहीं। 

यह सिर्फ एक उदाहरण था जीवन में ऐसे छोटे-बड़े सबक लोगो को मिलते रहते है, कोशिश यह रहनी चाहिए कि हम ऐसी सीख मिलने से पहले संभल जाएँ। किसी के हित में उसे समझाने कि कोशिश करें अगर वह अड़ा रहे तो वक़्त और ईश्वर पर छोड़ दें और बाद में उसे चिढ़ाएं... :p :) (kidding)

- मोहित ट्रेंडी बाबा 

Wednesday, February 25, 2015

भारतीय सेना हमारा गौरव - मोहित शर्मा (ज़हन)


कुछ लोगो अनुसार शांतिकाल (जब देश किसी युद्ध में ना हो) में भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना के सैनिको, अफसरों को ज़रुरत से अधिक पैसे दिए जाते है। यह बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ कि कोई कैसे इतनी सरलता से ऐसे मुद्दे पर ये राय रख सकता है। हाँ, यह मान सकता हूँ कि रक्षा बजट के अंतर्गत विदेशी युद्धक विमानों, हथियारों, पोतों की खरीददारी पर सरकार को समझदारी दिखानी चाहिए, क्योकि पहले ऐसे मामलो में घोटाले और अनियमिततायें देखने को मिली है पर सैनिक का वेतन ज़्यादा क्यों है ये कैसा सवाल है? यह कोई बिजली का बटन नहीं की युद्ध हुआ तो तुरंत रेडी नहीं तो रहने दो। भारत के बाहर और अंदर का माहौल ऐसा है की सेना का स्विच हर समय ऑन रखना मजबूरी है। नहीं तो देश के बाहर बैठे भूखे जानवर या देश के अंदर पनप रहे कुकुरमुत्ते निगल जायेंगे कुछ ही समय में भारत को। खैर, सेना के बारे में कुछ जानकारी मिली मुझे मेरे रिश्तेदारों से जो विभिन्न पदो पर देश सेवा कर रहे है। उसमे से थोड़ी यहाँ आपके साथ साझा कर रहा हूँ। 

8 - 10 वर्ष पूर्व यूरोप और अमरीका के चुने हुए युवा सैनिकों की कुछ टुकड़ियां भारत आयी। उन्हें नेशनल डिफेंस एकेडेमी के कैडेट्स के साथ कुछ हफ्ते ट्रेनिंग करनी थी। पर 3-4 दिनों में ही उनकी बैंड बज गयी और उन्होंने ट्रैनिंग को बर्बर, अमानवीय आदि भारी विशेषण देकर बीच में ही ट्रैनिंग छोड़ दी। समय-समय पर आते अंतर्राष्ट्रीय डेलीगेट्स, अनुसंधानकर्ताओं का भी यही मानना है की भारतीय फ़ौज (थल, जल, वायु) के विभिन्न प्रशिक्षण प्रोग्राम्स दुनिया में कठिनतम ट्रैनिंग्स मे है। शायद यही कारण है जो दशको नाकारा सरकारों के होते हुए भी अब तक ऐसे कुछ राज्य भारत में है जो आसानी से चीन और  उन्नीसों साठ-सत्तर के दौरान अमेरिका समर्थित पाकिस्तान के पास जा सकते थे। 

दुर्गम क्षेत्रो में डटे रहने के साथ-साथ अक्सर आपात स्थितियों, प्राकृतिक विपदाओं में राहत कार्य के लिए सबसे पहले सरकार सेना कि ओर रुख करती है। भारतीय सेना के अनुशासन की मिसालें दी जाती है क्योकि आज़ाद होने के बाद भारत के इतिहास में ऐसे कुछ मौके आये जब सरकार अस्थिर थी और बाहरी ताकतें तख्तापलट की उम्मीदें लगायें बैठी थी सेना से, पर ऐसे सभी नाज़ुक मौको पर सेना ने ना सिर्फ धैर्य बनाये रखा बल्कि स्थिति को सामान्य करने में तत्कालीन सरकारों की मदद की। 

तो अगली बार कोई सैनिक-अफसर मिले तो उसे धन्यवाद करना ना भूलें। जय हिन्द!

#indian_army #mohitness #mohit_trendster #army 

Thursday, February 12, 2015

ऊँचे लोग - मोहित ट्रेंडी बाबा

Pic - Dehradun, India

FB Group Post Excerpt
"Social media par ek observation hai....Majority aam janta aapki-mere jaisi hoti hai ki jo update, vyakti, page, group saamne dikha, sahi laga, mazaa aaya-mauka mila to like-comment kar diya unless koi pehle ka issue na ho us group, individual etc se. Hum ye nahi dekhte ki saamne wala banda reputation, paise mey ya kisi aur cheez mey humse neeche hai to like nahi karenge.

Kai logo ke paas time nahi hota zyada to wo sirf apne close circle ki activity par respond karte hai, kai logo ko like-comment awkward lagta hai ya koi aur issue hota hai isliye kum karte hai activity, unki habit bhi time ke saath pata chal jaati hai par Kuch log maine social media aur public circles mey note kiye kaafi pehle se hi wo alag hi category ke hai.

Is category ke log social media par kaafi active rehte hai, Jis field mey hote hai usme kuch rules bana lete hai ki unse upar jo log honge, ya jinse unka kaam nikal raha hoga kisi bhi tarah ka sirf unhi se interact karenge mainly. Baaki sab par almost no activity policy chahe FB, Twitter, Instagram par baithe rahen ghanto khaali...kyu? kyoki baaki to unse neeche ki janta hai...time aur efforts waste karvaane waali.

Haan, agar aap kabhi famous hue, koi national award mile, aapki painting exhibition lag jaaye, music album aa jaaye, book publish ho jaaye, bade model ban jao....tab aapko tag zaroor karenge time-time par....neechi janta ko dikhaane ke liye ki "Dekho gaon waalo...mai inhe bhi jaanta hun." 
smile emoticon
 Mera bada mann kar raha hai is category ke kuch examples dene ka par dunga nahi. (Aap sab aese nahi hai, achchhe bachche hai)"

Saturday, September 14, 2013

आडवाणी को सत्ता नहीं तो इज्ज़त तो दो...

आडवाणी को सत्ता नहीं तो इज्ज़त तो दो.....

अब जब श्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपने उम्मीदवार के रूप मे चुन लिए गए है तो स्थिति स्पष्ट हो गयी है और प्रचार के लिए महत्वपूर्ण पार्टी के सभी कार्यकर्ताओ, नेताओ को एक नाम मिल गया है। काफी समय से श्री लाल कृष्ण आडवाणी और मोदी, ये नाम थे जिन पर पार्टी कुछ विभाजित दिखी। लोग सवाल करते है की आडवाणी जी को कैसे समर्थन कर सकते है लोग? पर बात यह है की 1942 मे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ने के बाद से 86 वर्ष की उम्र तक उन्होंने 6 दशको से ज्यादा संघ एवम पार्टी के विकास के लिए बड़े योगदान दिए है। अटल जी के कार्यकाल मे उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण पद संभाले और उप-प्रधानमंत्री भी रहे। यह उनकी पार्टी मे स्थिति ही है की अब बहुत से वरिष्ठ नेतागण इस घोषणा के बाद उन्हें मनाने उनके निवास पहुँच रहे है। 
2004 और 2009 के लोकसभा चुनावो मे वो प्रधानमंत्री का पद नहीं पा सके क्योकि भारतीय जनता पार्टी के बाकी कामो को नज़रंदाज़ कर उसपर सांप्रदायिक पार्टी का ठप्पा लगा कर और व्यावसायिक लालच मे बाकी दलों ने हर बार की तरह सत्ता दूसरी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को तोहफे मे दे दी। इस बार जनता मे गुस्सा ज्यादा है कांग्रेस के विरुद्ध और श्री नरेन्द्र मोदी जी ही उन्हें एक उचित विकल्प दिख रहे है जो गुजरात जैसा विकास मॉडल पूरे देश मे लागू करने का दम रखते है। 

तो कहने का तात्पर्य यह है की मोदी जी को चुना जाना सही है पर पार्टी को ध्यान रखना होगा की आडवाणी जी को भी सम्मान सहित मनाया जाये। धीरे-धीरे वो स्वयं स्थिति भांपकर अपने अनुसार कोई वरिष्ठ पद ग्रहण कर लेंगे। ऐसा सिर्फ यहाँ ही नहीं और भी जगह देखने को मिलता है मसलन खेलो मे आज के सुपरस्टार और 15-20 साल पहले के सुपरस्टार की शोहरत मे काफी अंतर होता है।

- मोहित शर्मा

Sunday, May 12, 2013

Book - Potential of Unconventional Sources of Natural Gas in India



100 Page Redacted Project Report : "Potential of Unconventional Sources of Natural Gas in India" 

ISBN: 9781301257324
 
Available - Smashwords, Pothi, Medifire, ISSUU, Minus, Readwhere etc....

http://www.smashwords.com/books/view/315546

- Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba)

 

Thursday, May 9, 2013

चपल चीन, चप्पल भारत

**** चपल चीन, चप्पल भारत ****



यह शीर्षक इसलिए सोचा की भारतीय व्यवस्था मे कई दमदार योजनाएँ पूरी होते होते अपना अर्थ और दिशा ही खो देतीं है। 


चीन के बारे में एक और रोचक बात आप सबके साथ बाँट रहा हूँ। अंतरराष्ट्रीय व्यापार डील्स, प्राकर्तिक सम्पदाओं जैसे तेल के कुओं, समुद्र क्षेत्र आदि का अधिग्रहण जब कोई देश करवाता है तो ऐसे व्यापारिक मामलो में कई देश हिस्सा लेते है और राजनैतिक संबंधो, भौतिक, पैसो, प्लान, कोटेशन आदि मे जो देश आगे रहता है या जिस देश की कंपनी आगे रहती है उसको डील या व्यापर कॉन्ट्रैक्ट मिल जाता है। बस यहीं चीन ने एक नयी कूटनीति अपनाई है जैसे तेल, प्राकर्तिक गैस भण्डारो की डील मे उसकी 8 तेल कंपनियाँ एक साथ मिलकर कोटेशन और बाकी जुड़ा काम करती है एक बैनर तले जिसकी वजह से दूसरे देशो की बड़ी कम्पनियाँ भी उन आठ संयुक्त कंपनियों के सामने बौनी दिखाई पड़ती है। भारत की निजी और सरकारी कंपनियां राष्ट्रीय सम्पदा आवंटन नेल्प योजना पर ही साथ नहीं आ पायीं अब तक वो विदेशो मे ऐसे एकजुट हो पाएंगी ये मुश्किल लग रहा है निकट भविष्य मे।

जैसे अब कुछ समय से अफ्रीका की प्राकर्तिक सम्पदा पर चीन की नज़र है और वो तेज़ी से लम्बे समय के कॉन्ट्रैक्ट्स, डील्स और अधिग्रहण करके अपना रास्ता साफ़ कर रहा है। वहां की सरकार का लोगो और विदेशो को दिखाने भर के लिए सामाजिक रवैया है, न की भारत जैसा लोकतांत्रिक। वैसे लोकतन्त्र एक अच्छी व्यवस्था होती है पर भारतिय राजनेताओ एवम अफसरों की धीमी, डरी सी, ढुल-मुल शैली पर ये जमती नहीं उल्टा उन्हें और आलसी बना देती है।

जब तक इनका बिल पारित होता है, नीतियाँ बनती है, कमेटियाँ बैठती है और बाकी चोचला चलता है तब तक चीन टारगेट क्षेत्रो मे काम शुरू कर भारत की व्यापारिक उम्मीद ही ख़त्म कर देता है। कमी सोचने वालो और उनकी नीतियों मे नहीं है .....कमी करने वालो के संचालन और नीतियों के कार्यान्वयन में है।

- Mohit Sharma Trendster

Thursday, April 4, 2013

रक्षात्मक भारत



 भारत की विदेश नीतियाँ काफी रक्षात्मक होती है जबकि छोटे-छोटे देश तक अपने नागरिकों, सुरक्षा और व्यापार के मामलो मे आक्रामक रहते है। वैसे तो नीतियाँ सामने पड़ी स्थितियों के हिसाब से बनायीं जानी चाहिए पर भारत के द्वीपक्षीय या बहुपक्षीय मामलो मे ऐसा लगता है कि भारत डरा सा देश है ...मानो हम भारत जैसे विशाल देश न होकर मालदीव या मार्शल आईलैंड जैसे छोटे देश है जिनके आक्रामक होने का कोई फायदा नहीं। बांग्लादेशी प्रवासी या नेपाल-बांग्लादेश द्वारा सीमावर्ती ज़मीने हड़पना, उलटी धोंस जमाना ....अक्साई चीन और कश्मीर का इतना बड़ा हिस्सा पाक अधिकृत होना, श्रीलंका जैसा देश जो भारत के 1/51 वे हिस्से के बराबर है ...अक्सर तमिलों पर अत्याचार, हमारे मछुआरों को कैद कर लेना।

ऐसा नहीं है की हमारी वायु-थल-जल सेना या अर्धसैनिक बल अक्षम है बल्कि भारतीय सेना के स्टैंडर्ड्स, ट्रेनिंग को विश्व की कठिनतम माना जाता है पर इसका क्या किया जाए की हमारे हुक्मरान पंगु बैठे है।

शांति, आपसी संबंध सब सकारात्मक बातें है पर उसके लिए अपने नागरिक एवम व्यापारिक हितों के साथ रक्षात्मक समझौते कर लेना ठीक नहीं? हमारी सरकार को छोटे पर अपने हितो से समझौते न करने वाले देशो से कुछ सीख लेनी चाहिए।

- Mohit Sharma (Trendster)

Monday, April 1, 2013

वो ऐतिहासिक घटना (Must Read)

Mr. Mayank Sharma

**ये है मयंक शर्मा जी। कोई फोटो नहीं मिल रहा था तो इस घटना के एक किरदार की ही फोटो लगा रहा हूँ।**

आज एक अनुभव बाँटना चाहता हूँ। एक कॉमिक पब्लिशर से मेरी अच्छी बात होती थी, एक बार मैंने जो कमियाँ-बातें नोट की थी वो एक शुभचिंतक के नाते उन्हें ईमानदारी से बताई क्योकि वो उम्र, अनुभव मे मुझसे बड़े थे तो काफी संभल कर डिप्लोमेटिक तरीके से समझाया। उन्होंने इसको बे सर-पैर की आलोचना कहा और मुझे बताया की मेरे सर कुछ ख़ास कॉमिक कंपनियों का भूत चढ़ा है। मुझे ये भी हिंट दी कि अब थोडा मेच्योर होकर ही उन्हें कोई सलाह दूँ या बात करूँ।

सच कहूँ मेरा कोई लालच नहीं था, उनसे काफी ज्यादा बुक्स छाप चुका हूँ और अपनी मर्ज़ी से उतना कामर्शियल नहीं हुआ अभी तक। मै बस चाह रहा था की पहले से ही इतनी कम कंपनियाँ है, जो है वो और बेहतर हो जाएँ, काफी टाइम बिताया है इस फ़ील्ड में सबको देखते हुए, सबसे मिलते हुए ....बात करते हुए। उसी बिनाह पर उनसे कुछ कहाl मैंने बुरा नहीं माना पर बाद मे पता चला की इनकी इस तरह की बहस यहाँ तक की लड़ाइयाँ हो चुकी है आर्टिस्ट्स, राइटर्स, फेंस और इंडस्ट्री से जुड़े लोगो से, थोड़ी शान्ति मिली नहीं तो मुझे लगता मैंने कुछ गलती की होगी।

अब 2013 कॉमिक कॉन, दिल्ली गया। वहाँ वो थे (ज्यादा नहीं बताऊंगा नहीं तो ओबवियस हो जाएगा), अच्छा लगा उन्हें देख कर, उन्होंने मुझे पहचान भी लिया। हालाँकि, आई मस्ट एडमिट वो बिजी नहीं थे पर बन रहे थे क्योकि ये मै अक्सर करता हूँ इसलिए पहचान लिया ...ही ही।

मुझे वहाँ मयंक भैया मिले, उनके साथ ही घूमा। सबके साथ फोटोज लेते हुए लगा की एक फोटो तो उन पब्लिशर के साथ भी होना चाहिए उन्होंने पैसा (चाहे पुश्तैनी ही सही), समय और मेहनत दी है इस फील्ड में। मैंने उनसे फोटो कि रिक्वेस्ट की। अब तक सब ठीक था। पर इसके आगे जो हुआ वो पहले नहीं हुआ। मेरी हाईट 6 फीट 1-2 इंच है जो भारतीय एवरेज के हिसाब से ज्यादा है, ये भगवान् की दी हुई चीज़ें है किसी बन्दे को किसी चीज़ या बात मे एडवांटेज है तो किसी बन्दे को किसी और बात मे ....ये कोई शर्म करने वाली या घमंड करने वाली बात नहीं। ये बात मैंने क्यों बताई .....मयंक भाई हमारी फोटो क्लिक करने वाले है और ये हस्ती जो मेरे साथ खडें है वो उचक रहे है .... उनके जूते की हील काफी नहीं थी ....मुझे विशवास ही नहीं हुआ की ये कर क्या रहा है बंदा ...मन तो किया मै भी उचक जाऊं फिर क्या कुर्सी-स्टूल पर चढ़कर खिंचवायेगा?......पर उचकना ताकि एक फोटो भर में आप एक दूसरे बंदे के बराबर आ सको। भक! मर जाओ बे तुम!!! गधे कहीं के ....वो फोटो भी कभी नहीं लगाऊंगा।

- Mohit Sharma (Trendy Baba)

Saturday, March 30, 2013

Comic Con India Criticism


****माफ़ कीजिये यहाँ एक जनरल बात कर रहा हूँ एक कॉमिक इवेंट का उदाहरण देकर। तो कॉमिक की बात करनी पड़ गयी।****

मैं दिल्ली कॉमिक कॉन 2013 के आखरी दिन वहाँ पहुँचा तो कुछ बातें खटकी। वो मज़ा नहीं आया .... वो कॉमिक फीवर कहीं गुम था। कॉमिक कॉन इंडिया का मतलब सब नहीं तो ज़्यादातर इंडियन कॉमिक प्रकाशन रीप्रेजेंट होने (या कम से कम) फीचर होने चाहिए थे। इंडियन कॉमिक्स प्रमोट करने से ज्यादा मुझे एक कॉमर्शियल अप्रोच लगा जैसे कोई आउटसाइडर प्रायोजित कर रहा हो ....कोई इवेंट मैनेजमेंट कंपनी (हालाँकि पॉप कल्चर पब्लिशिंग इनकी ब्रांच है)।

यह बात उनके अवार्ड्स मे भी झलकती है .....एंट्रिज मे बहुत सी बड़ी इंडियन कॉमिक पब्लिकेशंस का नाम ही नहीं तो ये सही मानक कहाँ हुए? कुछ समय पुराने आर्टिस्ट को अवार्ड मिले और इंडसट्री मे 3-4 दशको से एक्टिव क्रिएटिवस नोमिनेशन्स मे तक न हो, अजीब है। जिन कंपनीज की इवेंट मे स्टाल्स है बस उन्ही तक अवार्ड सीमित होना ....ये भी अजीब लगा मुझे। भारत के कॉमिक कॉन मे भारतीयता की कमी लगी मुझे। मुझे पाश्चात्य सभ्यता से कोई दिक्कत नहीं है मै उनका भी आदर करता हूँ बल्कि कॉमिक कॉन का कांसेप्ट उन्ही की देन है पर भारत कॉमिक कॉन का मतलब है की बाहर के देशो का स्टाइल और भारतीय स्टाइल दोनों की झलक मिले यहाँ बाहरी स्टाइल काफी हद तक हावी रहा। भारतीय कॉमिक कॉन मैनेजमेंट को अपना दायरा इंग्लिश से आगे स्थानीय भाषाओ तक बढ़ाना होगा तभी सही मायनों मे ये भारतीय कॉमिक कॉन कहलाया जायेगा (मेरी नज़रों मे)। मै उनको धन्यवाद देता हूँ पर कोमेर्शियल होने की जगह अगर वो कॉमिक कल्चर को प्रोमोट करें तो लोंगर रन मे उनका ही फायदा होगा।

- Mohit Trendster

Sunday, September 30, 2012

Public Service Announcement *Naming Your Baby*

*****Public Service Announcement*****

Internet par dependent hoti duniya mey...Apne bachcho k ya apne near-dear ones k bachcho k naam unique rakhen. Common name aur surname k saath aapka bachcha agar celebrity nahi banta tab tak us "common" name k hazaro-lakho log usko duniya k liye invisible rakhenge. Agar aapka surname unique hai like "Satrona", "Rambujh", "Aritra" tab aapko kaafi edge milegi. Unique naam na hone k kuch ghaate.




*) - Bina kuch kiye, bina kisi mehnat k apne naam k search results mey besharmi se top pages gher lene ki advantage aapke bachche ko nahi milegi. Jo unique naam waale besharm balak-balikaon ko milti hai...he he..

*) - There are 1398 professionals by falana COMMON NAME on linkedin...le lo kaddu. :p

*) - Aapke bachche ko national level award milna aur kisi unique combination waale naam like "Adars Kukku" ka internet k kisi chhote kone mey 8 lines likhna barabar asar karega google aur baaki search engines par. Swaahaa! :p

*) - Approximately 976000000 search results with this name on google with your bachche k works, profiles nowhere in top 736 pages. 

*) - Kaam aapka bachcha karega aur aksar log usko kisi social media par zyada active rehne waale bando se confuse kar jaayenge jinka naam same hai.

*) - Duniya ki to chhodiye ye bhi possibility hai ki aapke bachche ki class mey hi usko uske naam k 5-7 bande mil jaaye. 

Peon - "Madam ji, Rahul k parents aaye hai."

Teacher - "Kiske? Rahul Gupta, Rahul Sharma, Rahul Garg ya Rahul Yadav...."


*) - Domain names aur kai websites ki profiles mey aapke bachche ko uske naam ka domain nahi milega balki itni population aur competition ki wajah se chahe wo hash laga le, underscore laga le, dot laga le...sadak par nanga dance kar le....sabka combination laga le...kuch nahi milne ka...end mey kuch aesa milega - WWW.Ramesh27985491_sharma.638.COM

- Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba)