अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Monday, August 22, 2016

निर्णय (लघुकथा)

प्रांप्ट - "टूटती शाखें" प्रतियोगिता के लिए

शोल कबीले के सरदार का निर्णय सभी सदस्यों के लिए एक झटका था। उनका प्रमुख जिसने दशकों इस कबीले का नेतृत्व किया, हर सदस्य को जीने के गुर सिखाये...आज उनके द्वीप पर 7 जहाज़ों से आये बाहरी लोगो का प्रस्ताव मान रहा था। सरदार ने स्थिति भांप अपना पक्ष रखा - "मेरा तो जीवन कट गया, पर अपने गार्सिया द्वीप के बदले बाहर ये विदेशी आप सबको बेहतर जीवन और ठिकाना देंगे..."

सरदार की बात एक युवक ने काटी - "...पर अपना सब कुछ छोड़कर उनकी शर्तों पर जीना कहाँ का इंसाफ है? इतने साल आपसे युद्ध कौशल सीखने का क्या लाभ? धिक्कार है ऐसी कायरता पर!"

सरदार - "एक बार मेरे बचपन में कुछ विदेशीयों ने ऐसी शर्त मेरे जन्मस्थान द्वीप टाइगा पर रखी थी। 450 से अधिक कबीलेवासी शर्त न मान कर लड़े और क्या खूब लड़े। उनमे मेरे परिवार समेत सिर्फ 8 परिवार टाइगा से पलायन कर बच पाए। तब जहाज़ 2 थे और इन जहाज़ों से बहुत छोटे थे। उस समय विशाल वृक्ष से टूटी धूलधूसरित शाखें किसी तरह फिर से कोपल सींच पाईं पर ज़रूरी नहीं हर बार ऐसा हो। बाहर जाओ और शोल वृक्ष को समृद्ध करो, इतना की आज उनकी शर्त पर जियो और कल सक्षम बन उनको अपनी शर्त पर झुकाओ। आज ख़ाक हो जाओगे तो कल कभी नही आएगा।"

- मोहित शर्मा ज़हन

Saturday, July 2, 2016

2 अंत (लघुकथा) - मोहित शर्मा ज़हन

एक निजी कंपनी के 2 सहकर्मी दोपहर का भोजन साथ कर रहे थे। 

अनिरुद्ध - "मुझे पता चला कि आप हवाई यात्रा नहीं करते। अफवाह है या विमान में बैठने से डर लगता है?"

रोनित - "सही सुना है आपने। हवाई यात्रा से डर नहीं लगता, पहले कई बार बैठ चुका हूँ।"

अनिरुद्ध - "अरे...आपको कंपनी के काम से देश में कहाँ-कहाँ जाना पड़ता है। ऐसे तो बहुत समय बर्बाद होता होगा...आखिर विमान यात्रा से बचने का क्या कारण है?"

रोनित - "हमारे घर के एक पुराने पंडित जी हैं, आज तक उनकी बताई हर बात सच हुई है। उन्होंने बताया कि मेरी मृत्यु एक विमान दुर्घटना में होगी तो मैंने सोचा जब तक सिर पे कोई आपात स्थिति न पड़े तब तक तो विमान यात्रा से बचने का प्रयास करूं।"

अनिरुद्ध - "हम्म...जैसा आप अपने पंडित जी के बारे में बता रहे हैं फिर तो इतनी सावधानी सही है।"

उसी रात रोनित को अनिरुद्ध का फोन आया। 

अनिरुद्ध - "माफ कीजिए अब कॉल कर रहा हूँ, रोनित जी। एक विचार मन में आया सोचा आपसे साझा करूं। यह भी तो हो सकता है कि विमान दुर्घटना में विमान जिस जगह पर क्रैश हो वहाँ आप मौजूद हों।"

अंत 1) - रोनित को उस रात के बाद से कभी चैन की नींद नहीं आई। 

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अंत 2) - अनिरुद्ध की बात सुनकर रोनित कुछ बोल पाता उस से पहले ही कॉल कट गई और कुछ देर बाद ही अनिरुद्ध को पता चला कि रोनित के घर पर एक यात्री विमान गिरा है जिसमे सभी यात्रियों समेत रोनित की मृत्यु हो गई है। 

समाप्त!

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Saturday, February 20, 2016

मुनीम रोबोट - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)

आर्यन और उसके जूनियर्स की टीम ने आखिरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक के ऐसे उन्नत रोबोट्स बना लिए थे, जो दुर्गम से दुर्गम स्थान पर पहुँच कर कठिन कामो को करने में सक्षम थे। रोबोटिक ऐड नामक 48 रोबोट्स की पहली टुकड़ी आपातकालीन स्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के समय बचाव कार्यों के लिए तैयार की गयी। इन रोबोट्स की ख़ास बात यह थी कि इनमे अन्य निर्देशों के साथ-साथ इंसानो की तरह तर्कशक्ति भरी गयी थी। 

बड़े देश में उनकी ज़रुरत तीसरे दिन ही पड़ गयी। पहाड़ी क्षेत्र में भूकंप के असर से हुए भूस्खलन और बाढ़ से काफी नुक्सान हुआ था और कई लोग  मदद का इंतज़ार कर रहे थे। रोबोटिक ऐड ने हज़ारो लोगो को बचाया भी पर उन्होंने कई लोगो को मरता छोड़ कुछ अन्य लोगो को बचा लिया। उनके तर्क में कुछ बड़ी खराबी थी। कुछ जगह न्यूज़ कवरेज और सीसीटीवी फुटेज पर गौर करने पर पाया गया कि रोबोट सबसे अधिक प्राथमिकता साधन संपन्न लोगो को दे रहे थे। उसके बाद मध्यम वर्गीय लोगो को बचाया जा रहा था। मदद की गुहार लगाते मरते हुए गरीब लोगो को रोबोट्स देख कर भी अनदेखा कर रहे थे। 

बाद में इस घटना की जांच होने पर मिशन मे रोबोटिक ऐड के ऐसे व्यवहार का कारण टीम लीडर ने खुद बताया। 

"हमने उन लोगो को बचाया जो बचाये जाने के बाद, खुद को और अपने बच्चो को अच्छे स्तर का लंबा जीवन देने में सक्षम थे या जिनमे हमें ऐसा करने की ज़्यादा उम्मीद दिखी। ऐसे  लोगो को बचा कर क्या फायदा जिन्हे घिसट-घिसट के औसतन 10-15 साल जीना है और अपनी अगली पीढ़ी को भी वैसा भविष्य देना है? बाकी लोगो को बचाने के लिए समय कम था इसलिए गरीबों को नहीं बचाया।"

यह रोबोट की अपनी सोच नहीं थी। इसमें इंसानी तर्क और पूर्वभासों की मिलावट थी, जिसमे फायदे को सही और नुक्सान को गलत माना जाता है। यहाँ फायदा हुआ या नुक्सान? रोबोट्स का तर्क अच्छा था पर भावनाओं बिना तर्क में अर्थ नहीं था। 

समाप्त!

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Read New Story - फिरोज़ी अनानास

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Wednesday, November 11, 2015

पैरानॉयड मीडिया - मोहित ट्रेंडस्टर

Y - "आखिर हम मीडिया वालो से समस्या क्या है आपको? जो हो रहा है देश में वही तो दिखाया जाता है।"

Z - "तो भाई साधारण लेंस इस्तेमाल क्यों नहीं होता? मैग्नीफाइंग ग्लास क्यों उपयोग करते है आप मीडिया वाले?"

Y - "मैं समझा नहीं!"

Z - "एक उदाहरण, हिंसक अपराधो में भारत का स्थान दुनिया में कहीं बीच में 70-80 रहता है, तो दुनिया को और देशवासियों को ऐसा क्यों लगता है कि ऐसे अपराधों में भारत नंबर एक है? आपकी पैरानॉयड या सेलेक्टिव रिपोर्टिंग के कारण! जैसे एक 800 जनसँख्या वाले इलाके में 50 अपराध होते है और किसी दूसरे 20000 जनसँख्या के इलाके में 500 अपराध होते है। इसका आशय यह नहीं कि 20 हज़ार वाला इलाका ज़्यादा बेकार है बल्कि यह है की 800 लोगो के इलाके में अपराध दर (6.25%) दूसरे इलाके (2.50%) से कहीं अधिक है, ऐसे ही भारत की 130 करोड़ जनता में कम अपराध दर भी दूसरे देशो की तुलना में एक बड़ी संख्या लगती है। पर जब पत्रकारिता नहीं आई तो गणित, अनुपात और तुलनात्मक समझ की क्या उम्मीद करें। आपकी वजह से देश वासियों में बेवजह हीनभावना, गुस्सा और भ्रम की स्थिति रहती है, साथ ही दुनिया भर में भारत से जुड़े सिर्फ नकारात्मक पहलुओं की तस्वीर बनती है। शायद इसी कारण हमसे कहीं छोटे राष्ट्रों में पर्यटन और विदेशी निवेश-व्यापार की स्थिति हमसे बेहतर है। फॉर अ चेंज, औरों पर ज़िम्मेदारी लादने के बजाये खुदपर लादो और सही दिशा में बदलाव लाओ।"

- मोहित शर्मा (ज़हन)

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Tuesday, April 28, 2015

झोलाछाप टैलेंट - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


मेरा नाम है रवि यादव....प्यार से लोग मुझे झोलाछाप लेखक बुलाते है। 

कभी अपने सपनो का पीछा करते-करते मैं मुंबई आया था। रहने के लिए कमरा ढूँढ़ते हुए डीलर ने लोकेश गौतम से मिलवाया, मेरी तरह वह भी मुंबई एक बड़ा राइटर बनने आया था। बड़ा सभ्य और सभी से प्यार से मिलने वाला बंदा था। मैं जैसे तैसे एक अखबार में लगा पर उसका कुछ नहीं हो पाया। उसमे लेखक वाली बात जो नहीं थी, इधर-उधर जोड़कर बनायीं कहानियाँ, आइडियाज कहाँ चलते है? पर उसके मुँह पर यह बात बोलने की हिम्मत नहीं थी मुझमे। शायद इसलिए क्योकि कहीं ना कहीं लोकेश में मुझे अपने बड़े भईया दिखते थे। 

कुछ समय बाद मुझे बेहतर तनख़्वाह पर एक मैगज़ीन में काम मिला तो अपनी जगह मैंने उसको काम पर लगवाया। एक दिन जब घर लौटा तो देखा मेरी कुछ अधूरी स्क्रिप्ट्स गायब थी और साथ ही लोकेश का भी कोई अता-पता नहीं था। लालच में उसने मेरी कहानियां अपने नाम से एक प्रोडक्शन हाउस को बेच दी। मेरी कहानियाँ राइटर्स एसोसिएशन में रजिस्टर्ड थी पर थोड़ा बहुत हेर-फेर कर नक़ल को असल बनाने में उसे महारथ थी इसलिए केस करने पर भी कुछ साबित नहीं होने वाला था। मैंने सोचा चार-पांच स्क्रिप्टस से कितने महीने जी लेगा? मेरा दिमाग तो नहीं चुराया उसने। आखिर टैलेंट के आगे तो नक़ल को हमेशा झुकना पड़ता है। 

तबसे आज 12 बरस हो चुके है। आखिरकार मेरा संघर्ष रंग लाया, मुझे एक महान हस्ती के ऊपर बन रही बड़े बजट की बायोग्राफिकल फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने का काम मिला है। वह महान शख्स जिसके ऊपर यह फिल्म बन रही है....लोकेश गौतम। 
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- मोहित शर्मा (ज़हन)

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