अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Monday, July 17, 2017

हाँ पता है...(feat. जूता) - सामाजिक कहानी


सज्जन - "मोहित जी आपको पता है फिलिस्तीन के लोगो पर इजराइल कितना ज़ुल्म कर रहा है? म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय का क्या हाल किया है वहाँ के बहुसंख्यक बौद्ध समाज ने?"
"हाँ जी! पता है...और मुझे नाइजीरिया में बोको हराम द्वारा सरकार से युद्ध और स्थानीय लोगो का नरसंहार पता है, दशकों से इराक़ और तुर्की द्वारा लगातार कुर्द, यज़ीदी समुदाय की एथनिक क्लेंज़िंग पता है, पाकिस्तान, ईरान के विरुद्ध बलूचिस्तान के लोगो संघर्ष पता है, अंगोला में चल रही कबीना लड़ाई पता है, रूस-चेचेन्या क्राइसिस पता है, रूस-यूक्रेन युद्ध पता है, इंडोनेशिया और पपुआ निवासियों के कुछ वर्गों की लड़ाई पता है, कोलंबिया, मेक्सिको और दक्षिण अमेरिकी देशों में नशे के व्यापार में चल रहे संघर्ष पता हैं, इतना ही नहीं माली, सूडान, दक्षिण सूडान, सीरिया, कांगो, सोमालिया, यमन, फिलीपींस, अफगानिस्तान, केंद्रीय अफ्रीका गणराज्य में चल रहे गृह युद्धों के बारे में पता है। बाकी दुनियाभर में कई छोटे-बड़े समुदाय आपस में या स्थानीय सरकारों से संघर्ष कर रहे हैं और अनेकों समुदाय संघर्ष करते-करते लुप्त हो गए।
मुझे एक बात और पता है, तुम मिडिल क्लास परिवार से हो जिनका जीवन खुद में एक जंग है। पहले अपनेआप को इतना काबिल बनाओ कि किसी गलत को सही कर सको, अपने परिवार से बाहर भी लोगो की मदद कर सको। अगर ऐसा ना कर पाओ तो गलत को गलत ज़रूर कहो पर फिर हर तरह के गलत को गलत कहो पर तुम तो मज़हब के हिसाब से ज़ुल्म देख रहे हो जो गलत है। अगर तुम्हे हर ज़ुल्म पर एक जैसा दर्द नहीं होता तो थू है तुम्हारी सोच पर! अब आगे क्या करना है पता है ना?"
सज्जन - "हाँ मोहित जी! मैं जूता उठाकर अपने मुँह पर मार लेता हूँ।"
"अरे नहीं भाई, मेरा मतलब था कि अब काम पर ध्यान दो और तरक्की करो...ताकि जिन बातों पर परेशान होते हो उन्हें बदलने की कोशिश करने लायक बन सको।"
कुछ देर बाद - 
सज्जन - "समझ गया! मैं चलता हूँ।"
"रुको! मुँह इधर करो, जूता तो खाते जाओ।"
समाप्त!
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- #मोहित_शर्मा_ज़हन
Artwork - Neil Wilson
#mohitness #civilwars #crisis #selectiveoutrage #media

Thursday, February 16, 2017

सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी) #ट्रेंडस्टर

अपने छोटे कस्बे से दूर सपनो के सागर में गोते लगाता एक रीमा और मनोज का जोड़ा बड़े शहर के कबूतरखाना स्टाइल अपार्टमेंट में आ बसा। जितना व्यक्ति ईश्वर से मांगता है उतना उसे कभी मिलता नहीं या यूँ कहें की अगर मिलता है तो माँगने वाले की नई इच्छाएं बढ़ जाती है। कुछ ऐसा ही इस दम्पति के साथ हुआ, सोचा कितना कुछ और हाथ आया ज़रा सा...वैसे यह 'ज़रा सा' भी करोडो के लिए किसी सपने जैसा होता पर कहता हैं ना 99 का फेर मौत तक पीछा नहीं छोड़ता।

दोनों को ही अपने बड़े संयुक्त परिवारों से परहेज था। तीज-त्यौहार पर घर जाना या घर से किसी का इनसे मिलने आना इन्हें हफ़्तों पहले ही चिंता में डाल देता था। मनोज के घर को दोनों सर्कस कहते थे और रीमा के घर को बाराबंकी बाजार। इन दोनों को लगता था कि परिवार के लोग इनके कभी काम नहीं आते जबकि ये हर महीने - महीने में उनका कोई छोटा-मोटा काम कर देते थे। जबकि ऐसा था नहीं, बस सुविधानुसार जब इनसे जुड़ा कोई काम जैसे मकान की रजिस्ट्री, गाडी फंसने पर थाने फ़ोन कर छुड़वाना आदि किसी घरवाले द्वारा किया जाता था तो ये दोनों उसे काम मानते ही नहीं थे।

ऑफिस की तरफ से वनकल वन्य अभयारण्य में घूम रहे रीमा-मनोज का उनके गाइड और ड्राइवर समेत एक उग्रवादी संघठन द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। उस संघठन ने हाल ही में अपनी माँगो के लिए कुछ हत्याएं की थी। बंधक अपने भाग्य को कोस ही रहें होते हैं कि तभी एक आवाज़ आती है....

"अरे फूफा जी! चरण स्पर्श, कैसे हो आप?"
मनोज की फ्रीज़ मुद्रा अभी टूटने में समय लगता तो रीमा बोल पड़ी - "जीता रह कुन्नू बेटे! कितना बड़ा हो गया तू...16 साल का!"
कुन्नू - "आप लोग यहाँ कैसे?"
मनोज - "बेटा तेरी बुआ जी ने पता नहीं कौन सी सरिता-गृहशोभा में सेकंड हनीमून का पढ़ लिया तबसे मेरे कान खा लिए। फिर ऑफिस से यह टूर मिला तो आ गए। तू इस सब में...."

रीमा ने अपने पति को इतनी जोर की कोहनी मारी कि उसके मुँह से आगे की बात निकली ही नहीं। ज़्यादा बात होती उस से पहले ही वहाँ नक्सल विरोधी फ़ोर्स का हमला हो गया। डिप्टी कमांडर कुन्नू ने अपनी बुआ जी और फूफा जी को खतरे से अपनी जान पर खेल कर निकलवाया। इस गोलाबारी में रीमा घायल हो गयी, घायलो को लाया गया शहर के अस्पताल। यहाँ डॉक्टर मनोज के कजिन निकले जिस वजह से इलाज में रीमा को प्राथमिकता मिली। गोली के असर से रीमा की किडनी फेल हो गई और उसे नई किडनी की ज़रुरत थी। अब रीमा के 'बाराबंकी बाजार' से उसकी चाची जी काम आयीं और रीमा को समय पर किडनी मिल गयी।

एक दिन आराम से अपने कबूतरखाने की निन्नी सी बालकनी में चाय पीते हुए दोनों ने आँखों में ही एक-दूसरे से जैसे कहा हमारे 'सर्कस' या 'बाराबंकी बाजार' से हमे कितना कुछ मिलता है पर सुविधानुसार हम अपनी तरफ से किये गए काम याद रखते हैं और वहाँ से मिला सहारा हम कभी देखना ही नहीं चाहते। अब दोनों फिजियोथेरेपी और स्ट्रेस, डिप्रेशन कम करने के लिए साइकैट्री इलाज करवा रहें हैं....हाँ, वो डॉक्टर भी परिवार वाले या उनकी जान पहचान के निकल आये हैं।

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Yasni Database
Read छूटी डोर (कहानी)

Tuesday, January 10, 2017

कैशलेस रिश्वत (Cashless Bribe)


एक सरकारी दफ्तर में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, सौरभ घुसता है। सौरभ अपना झोला लेकर अंदर आता है और अपने विभाग से जुड़े एक बाबू (क्लर्क) के बारे में पूछता है। उसकी डेस्क पर जाकर वो अपना दुखड़ा रखता है।

"सर मेरा कई सालों का ट्रेवल अलाउंस, पेट्रोल अलाउंस, नच बलिये अलाउंस कुछ नहीं आया है, अब आप ही कुछ कीजिये।"

बाबू - "कर तो दें पर उसके लिए आपको भी कुछ करना होगा ना। इस हाथ दे, उस हाथ ले....नहीं तो लात ले।"

सौरभ - "हाँ झोला वामपंथी फोटोशूट के लिए थोड़े ही लाया हूँ!" (सौरभ झोले में हाथ डालता है)

बाबू - "एक तो नाड़े को झोले की डोरी बना रखा है....जी कर रहा है इसी का फंदा सा बना के झूला दूँ तुझे बदतमीज़!"

सौरभ - "मैंने क्या किया? बदतमीज़ी का तो मौका ही नहीं मिला अभी तक 30 सेकंडस में?

बाबू - "अरे जब पूरा देश डिजिटल इंडिया के नारे लगा रहा है और तुम अभी तक झोले में घुसे हो। तुम जैसे लोगो की वजह से ही देश तरक्की नहीं कर पाता। भक! नहीं करनी तुमसे बात।"

सौरभ - "बात नहीं करनी? बाबू हो पर गर्लफ्रेंड की तरह क्यों बिहेव कर रहे हो? अच्छा तो आप ही कुछ उपाय बताओ।"

बाबू - "कैशलेस सरकाओ हौले से...."

सौरभ - "ओह! हाँ जी अपना मोबाइल नंबर दो।"

बाबू - "मेरी इस महीने की लिमिट पूरी हो गयी है।"

सौरभ - "तभी मूड ख़राब है आपका! तो क्या इस महीने काम नहीं होगा मेरा?"

बाबू - "अरे क्यों नहीं होगा, देश को आगे बढ़ने से रोकने वाले भला हम कौन होते हैं? मेरे चपरासी का नम्बर नोट करो। उसकी भी लिमिट हो गयी हो तो बाहर बैठे नत्थू भिखारी के मोबाइल में 15% उसकी कमीशन जोड़ के डाल देना। बड़ा ईमानदार बंदा है! पिछले महीने का एक ट्रांसक्शन मैं भूल गया था वो भी हिसाब के साथ देकर गया है लौंडा। सारा काम छोड़ के, जय हिन्द बोल के उसके माथे की चुम्मी ली मैंने तुरंत... "

समाप्त!

Saturday, June 11, 2016

दुग्गी ऑफ़ ऑल ट्रेड्स


नमस्ते! :) अक्सर किसी क्षेत्र में सफल या अच्छी जगह पहुंचे लोगो को किस्मत को कोसते, कहते देखता हूँ कि हम यहाँ तो सफल हैं पर इस चक्कर में जिस दूसरे क्षेत्र में भी रूचि थी उसमे कुछ न कर पाने या कम कर पाने का मलाल है। मतलब आपको विराट कोहली भी बनना है और सुनीता विलियम्स भी? या मोहम्मद अली तो बनेंगे ही पर साथ में नेताजी बोस वाला तमगा भी चाहिए? एक जगह समय दिया, मेहनत की तो फल भी उसी में मिलना चाहिए न? आपका ऐसा बोलना इन क्षेत्रों में कर्म की तपस्या से सफल हुए, अपना पूरा जीवन एक दिशा में लगा चुके लोगो का अपमान है। अंधो में काणा राजा होना और वाकई में विलक्षण प्रतिभा होना दो अलग बातें है। जैसे संभव है आप अपने परिवार और दोस्तों के बीच सबसे अच्छी स्केचिंग करते हों पर असल दुनिया में जिन्हे पेशेवर कहा जाता है वो लोग वर्षो-दशकों तक दिन पर दिन, तिल-तिल संघर्ष कर अपना हुनर निखारते हैं, तो अपने गाहे-बगाहे के काम पर ज़बरदस्ती की आहें न भरें। 

अब या तो आप अरबों में एक हों और जन्मजात एक से अधिक क्षेत्रों में
ख्याति पाने लायक हों (ज़्यादा खुश न हों अरबों में एक लिखा है....चले गुलाबी मोर बनने :p) या आपने वाकई अपने मुख्य क्षेत्र के साथ-साथ अन्य क्षेत्रो में कई वर्षों या दशकों तक काम किया हो तब सोचा जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी रचनाकार का यह कहना कि भगवान् ने इतना दिमाग दिया है, मैं चाहता तो ये आई.टी., कोडिंग फलाना क्या मुश्किल था मेरे लिए? क्या भैया? किसी की स्किल, कला, प्रतिभा का सम्मान करना इतना मुश्किल भी नहीं है! भाग्य, परिस्थिति और रूचि के चक्कर से अगर वह आपकी तरह किसी कलात्मक क्षेत्र में होता तो आपका डीम्ड पापा/मम्मी होता। आपके क्लोज सर्किल में लोगो ने तारीफ कर दी तो आप तो दिल पर ही ले बैठे। यह वेरीफाई ज़रूर करें कि आप मास्टर ऑफ़ ऑल ट्रेड्स हैं की जगह दुग्गी ऑफ़ ऑल ट्रेड्स तो नहीं हैं? ऐसा करने से आप खुद को कमाल आर. खान या वो एक्टर-डायरेक्टर-सिंगर-वाइब्रेटर बाबा जैसो की राह पर चलने से रोक सकते हैं।

इस स्थिति में एक अपवाद है अगर कोई अन्य विधा, स्किल आपके क्षेत्र से जुडी हो तो समय के साथ आप उसमे अच्छे हो सकते हैं। जैसे एक लेखक के लिए समीक्षक होना, किसी खेल के पूर्व खिलाडी के लिए उस खेल का कोच या रेफरी बन जाना थोड़ा आसान होता है। हालांकि, इस बदलाव के भी अच्छे होने की गारंटी नहीं है। जीवन में आपने जो राह चुनी है, जो निर्णय लिए हैं, उनकी अच्छी-बुरी बातें स्वीकार करें। साथ ही अपने चुनाव, निर्णय के सही होने पर जैसे कूद कर पूरा श्रेय आप लेते हैं उसी तरह गलत होने पर वैसे ही कूद कर नहीं आ सकते कोई बात नहीं पर, ज़िम्मेदारी लेने से न बचें। परिवार या अन्य किसी व्यक्ति, बात पर दोष डालना उचित नहीं क्योकि आप कोई 7 साल के बच्चे नहीं हैं!

- मोहित शर्मा ज़हन
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Friday, March 4, 2016

"Aap karen to hunar...humare liye guzar-basar" (Toon with Tadam Gyadu)


"Aap karen to hunar...humare liye guzar-basar"
Old unpublished toon (2013)....Pencils - Tadam Gyadu, Letters - Youdhveer Singh

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  Comics Reel 
"Satirical Comics by emerging artist Tadam Gyadu and writer Mohit Trendster.
Tadam Gyadu was also recently credited as the penciler in ADRISHYA SHADYANTRA along with Hemant Kumar.
We wish him luck and success for his career and hope to see many great comics in future."

Sunday, September 6, 2015

नशीले शेड्स - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


"क्या हुआ चौबे साहब, कुछ चिंतित लग रहे है?" तहसीलदार ने शहर के दानी उद्योगपति श्री लोमेश चौबे से पूछा। 

चौबे जी ने गंभीर स्वर में कहा, "कुछ लोगो को शहर के रैनबसेरे, धार्मिक स्थलों आदि कहीं पर भी ठोर ठिकाना नहीं दिया जाता था उनके चाल-चलन की वजह से, ऐसे बेसहारा लोगो के लिए शहर में कुछ जगह शेड्स लगवाये थे।"

तहसीलदार उनके सामने अपने पॉइंट्स बनाते हुए बोला, "वाह! धर्मात्मा हो तो आपसा, जिनको सबने दुत्कार दिया उनके लिए आपने सोचा। वैसे कौन अभागे लोग हैं वो?"

लोमेश चौबे - "स्मैकिया-नशेड़ी-चरसी लोग, जो शेड्स लगवाये थे वहां लगे बाकी सामान के साथ बेच कर उन गधो ने उसका भी नशा कर लिया।"

 यह बात सुनकर सहमे खड़े तहसीलदार की हँसी नहीं छूटी बल्कि पूरा ठहाका निकल गया। जो पॉइंट्स उसने चौबे जी की तारीफ़ करके बनाये थे उनसे ज़्यादा कट कर उसका अकाउंट माइनस मे चला गया। इधर चौबे जी की ज़मीन पर खुले आकाश के नीचे नशेड़ी लोट लगा रहे थे, ऐसी लोट लोग अपने बाप के यहाँ भी नहीं लगाते। 

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents #india #satire #story

Friday, September 4, 2015

मुदित चोर नहीं है! - लेखक मोहित शर्मा (ज़हन)


"गलती आपकी है जो 150 की जगह 1500 का रिचार्ज कर दिया।" मन ही मन खुश होते मुदित ने दुकानदार से कहा। 

दुकानदार - "कभी-कबार जीरो की गलती हो जाती है, आँखें कमज़ोर हो गयी है। अभी सब देने को नहीं कह रहा बाद में जब इस्तेमाल कर लो तब दे देना, या धीरे-धीरे लौटा देना। अब बुढ़ापे में ऐसा तो...."

मुदित - "बूढ़े हो गए है तो घर पर बैठिये। मैंने डेढ़ सौ बोला था उतने ही दूंगा, बाकी आपने क्या देखा, किया उस से मुझे मतलब नहीं। इतनी चलती है आपकी शॉप, अभी दो-चार घंटो में सब वसूल हो जायेगा।" इतना कहकर वृद्ध दुकानदार की बातें अनसुनी करता हुआ मुदित वहाँ से निकल गया। उसने यह भी सोचा कि अब से वह इस जगह टॉपअप-रिचार्ज करवाने नहीं आएगा। 
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कुछ दिन बाद व्यथित मुदित फ़ोन पर एक डिश कंपनी के कॉलसेंटर कर्मी पर अपना गुस्सा निकाल रहा था। 

मुदित - "अरे ऐसे कैसे काट लिए 75 रुपये मेरे टीवी पैक से?"

कालसेंटर कर्मी - "सर एक महीने के लिए हमारा स्पेशल "महालोलू पैक" फ्री था तब आपने उसका सब्सक्रिप्शन लिया था। समय पूरा होने के बाद भी आपने पैक हटवाया नहीं इसलिए ऑटोमैटिक डिडक्ट हो गए पैसे।"

मुदित - "अच्छा मुझे मत पढ़ा बे! बस लोगो को लूटने के लिए ऑफर्स बना रखें है। हुँह! चोर है सब @#$&% "

समाप्त! 

- मोहित शर्मा (ज़हन)
#mohitness #mohit_trendster #laghukatha #message

Wednesday, September 2, 2015

जुग-जुग मरो बेटा! (कटाक्ष) - कवि मोहित शर्मा (ज़हन)


जून 2015 में एक बार फिर महाराष्ट्र में ज़हरीली शराब पीने के बाद कई लोग मारे गए और कई अन्य अंधे हो गए व कुछ की आंतें फट गयी। परिजनों के विरोध के बाद राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को 1 लाख रुपये देने की घोषणा की। पर जो अंधे हुए या जिसकी आँत फटी उनकी सहायता या पुनर्वास के लिए सरकार द्वारा कुछ नहीं किया गया। मृतकों के परिवारों से मेरी सहानुभूति है कि कुछ नियम, कानून और जागरूकता बढ़ा कर ये मौतें कम की जा सकती थी। इस विषय पर ये कटाक्ष काव्य। शब्द जानबूझ कर तीखें किये है, इनका बुरा मानें, इसको दिल पर ज़रूर लें - आवाज़ उठायें.....पर सही जगह!

जुग-जुग मरो बेटा!

रसमलाई क्या जलेबी भी लगे अब फीकी ,
जो शराब लखपति बनायें....  
वो ज़हर नहीं अमृत सरीखी। 

मलाल है क़ि पूरी क़ि पूरी क्रिकेट टीम को खड़ा क्यों ना किया,
फालतू में "हम दो, हमारे दो" स्लोगन को इतना seriously ले लिया। 
जबसे ट्रेजेडी का मुआवजा बँट गया,
तबसे साला हर शराबी चलती फिरती FD बन गया। 

अजीब देश है, शहीदो की विधवाएं पैसो के लिए कितनी दौड़ लगातीं है,
जबकि शराबियों के घर सरकार खुद चेक लेकर आती है। 

जब लोगो को लाख का चेक मिलते देखा,
चौल का हर बूढा आशीर्वाद देता फिरता - जुग-जुग मरो बेटा!
जनता में अचानक समाजसेवा की जगने लगी है इच्छा,
गोद लेना चाहते है लोग पियक्कड़ यतीम बच्चा। 

दहेज़ में कितना सामान मांग रहा है तेरा जीजा,
बिन आँखों के, फटी आँतों से Installment मे मत जी,
बाउजी कुछ पव्वे ब्लैक में लाएं है गटागट पीजा। 

किसी करमजले का पेट फटा,
तो कोई धरती का बोझ सूरदास बना, 
असली सपूत सिर्फ वो,
जो पिके सीधा शहीद हुआ!

- मोहित शर्मा (ज़हन)

#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents #satire #social #india #message #maharashtra

Monday, August 24, 2015

मोहल्ले का (कु)तर्क गुम हो गया - मोहित शर्मा ज़हन

लघुकथा 
"माना राजनीती में कुछ ऊँच-नीच हो जाती है, पर नेता जी हमारे लिए तो अच्छे है। हम लोगो से तो व्यवहार अच्छा है, छोटे-मोटे काम करवा देते है मोहल्ले के और क्या चाहिए? अब समाज का ठेका थोड़े ही ले रखा है हम लोगो ने!"

ऐसे तर्क होते थे वर्धा ब्लॉक मोहल्ले वालो के जब उन्हें शहर और उसके आस-पास के गाँव-देहात में उनके मोहल्ले की भव्य महलनुमा कोठी मे निवास कर रहे नेता जी एवम उनके गुर्गो की गुंडई, मनमानी के किस्से सुनने को मिलते थे। एक दिन नेता जी द्वारा दर्जनो व्यापारियों से की गयी मारपीट, वसूली के बाद शहर के हज़ारो उपद्रवी व्यापारियों और ऐसा कोई मौका ढूँढ रहे नेता जी के विरोधियों  ने मोहल्ले पर धावा बोल, भीड़ का फायदा उठाकर वहाँ के स्थानीय निवासियों से मारपीट, कई गाड़ियों एवम संपत्ति में आगजनी करते हुए  नेता जी के घर पर धावा बोल दिया जिसमे उनके कुछ समर्थको, परिवार समेत बर्बर हत्या कर दी गयी। 

इस घटना में गंभीर रूप से घायल नेता जी के शुभचिंतक पडोसी सिंह साहब ठीक होने के बाद दिवंगत नेता जी के लिए कोई तर्क नहीं रखते। उनके दिमाग के उस हिस्से पर गहरी चोट आई जो तर्क समझता और प्रेषित करता है, इस कारण अब वो किसी भी तरह का तर्क नहीं रख पाते....बाकी मोहल्ले वालो के सर में चोटें नहीं आयीं....पर वो भी अब तर्कों को दूर से नमस्ते करते है!

- मोहित शर्मा ज़हन

Friday, August 14, 2015

Aazadi Poetry - #‎मोहित_ज़हन‬

बिना शिकन वो पूछ रहे "देश बर्बाद है! किस बात की आज़ादी? कैसी आज़ादी?"
कि कॉन्फिडेंस से पूरी क्रिकेट टीम पैदा कर लो.... 
कि सालों-दशको-सदियों पुराने "बदलो" के हिसाब में लड़-मरलो.... 
कि कुतिया में परिवर्तित होकर औरों का हक़ मारने में उसेन बोल्ट का रिकॉर्ड हरलो... 
और ज़िम्मेदारी निभाने में 'पहले आप - पहले आप' करलो...

कि न्यूज़ रिपोर्ट्स से देश को कोसते हुए AC में दूध ठंडा करलो....
अपने गिरेबां में झाँको तो पाओगे तुम हिन्द नहीं सोमालिया डिज़र्व करते हो सालो!

और अजब है अपना भारत भी...
जो इतने कमीनों के होते हुए भी 200 मुल्कों में डेढ़ सौ से बेहतर है अपनी "आज़ादी"
अनगिनत पाप की आज़ादी, आस्तीन के सांप की आज़ादी! 
जय हिन्द! First deserve, then desire...

P.S. Artwork from latest Kavya Comic "Desh Maange Mujhe"
— celebrating Indian Independence

Monday, January 27, 2014

Cartoon on AAP (आप)

AAP – आप Cartoon

“आप ने कहा है वैसी आम चीज़ें सोच कर लाओ, जो गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर ने अभी तक ना कि हों। हाँ अगर… राखी सावंत ने कर रखी हों तो चलेगा।”
Cartoon With Artist Mr. Srijit Sreejith (Thanda Pakouda) Letters – Mr. Youdhveer Singh
Anap Shan AAPiyat
 BOOKMARK THE PERMALINK.EDIT

Saturday, January 5, 2013

The Janta Robots Project :p

llll Janta Robots llll **Black Comedy-Satire** Ye ek satire hai India k adhiktar politicians par jo janta virodhi activities karne k baad bhi press conferences-public appearances mey janta k hiteshi bane rehte hai...doosro k dard, dukh par rajneeti karte hai, bina soche samjhe aag mey ghee daalne jaise bayaan de dete hai....rajneeti mey aane se apni maut tak rajneeti hi karte rehte hai...iska udeshya kisi ko thes pahunchana bilkul nahi hai. - Mohit Sharma (Trendster/Trendy Baba) with artist Dheeraj DK Boss




Saturday, November 3, 2012