अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...

Tuesday, December 12, 2017

सामाजिक समस्याओं में अंतर (लेख)

Art - Mari Bobghiashvili‎
समस्या जीवन का अभिन्न अंग है। कुछ पाना है, कुछ करना है...सांस तक लेते रहना है तो भी कोई ना कोई समस्या मुँह बाये तैयार रहती है। हाँ, वीडियो गेम के लेवल की तरह कोई समस्या आसानी से निपट जाती है और कोई समस्या कितने ही संसाधन और समय व्यर्थ करवाती है। कुछ बड़ी समस्याएं जटिल होती हैं और सामाजिक परतों में अंदर तक फैली होती हैं। इन समस्याओं में ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपराध, भेदभाव, बाल शोषण, अशिक्षा, ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण आदि शामिल हैं। बचपन से इन समस्याओं के बारे में पढ़ाया जाता है और हर रोज़ इनसे जुड़े पहलुओं पर दुनियाभर में ख़बरें, वार्ता होती रहती हैं। एक समय बाद समाज इन समस्याओं का इतना अभ्यस्त हो जाता है कि अगर कोई बड़ी खबर ना हो तो इनकी तरफ ध्यान नहीं जाता। ये बातें सामने होकर भी अनदेखी सी होने लगती हैं। सरकार और लोगो की जागरूकता से स्थिति बेहतर हो सकती है पर पूरी तरह ठीक होना असंभव है। वहीं दूसरी तरफ कुछ मुद्दे छोटे स्तर, छोटे क्षेत्र-लोगों और कम समय वाले होते हैं। 

कुछ नये को सामान्य से बहुत अधिक प्रतिक्रिया मिलती है इसलिए आम जनता और सभी तरह का मीडिया 1 दिन, 2 दिन या कुछ हफ़्तों तक उस खबर को प्राथमिकता से देखते-दिखाते हैं। इसी क्रम में कभी-कभार किसी घटना पर जनता के बड़े हिस्से की नकारात्मक प्रतिक्रिया आती है और देश-दुनियाभर में प्रदर्शन, मांगें, विरोध और यहाँ तक की हिंसा भी हो जाती है। किसी के लिए छोटी सी बात किसी अन्य समूह के लिए उनकी पहचान पर सवाल या अपमान की तरह देखी जाती है। अगर ध्यान दें तो ये "छोटी" बातें उन बड़े मुद्दों का ही वेरिएशन होती हैं जो हम अनदेखा कर देते हैं। ये कुछ ऐसा है जैसे किसी फिल्म की थीम प्रेम कहानी, एक्शन, एनिमेशन या यात्रा वृतांत हो सकती है पर दर्शक उस फिल्म को इन थीम के वेरिएशन के लिए देखने जाते हैं यानी इस प्रेम कहानी में क्या नया हुआ, नयी कलाकार मण्डली कैसे साथ आयी। नयी चीज़ का "नॉवल्टी" होना कुछ समय के लिए जिज्ञासा जगाता है और जब लोग बात से ऊब जाते हैं तो उसकी जगह ताज़ी बातें ले लेती हैं। 

ऊपर समझाया गया संदर्भ बिना जाने, एक बात लोग अक्सर कहते हैं कि देश में जघन्य अपराध, ग़रीबी जैसे मुद्दों पर तो कुछ नहीं होता! उनपर किसी को कोई धरना, विरोध प्रदर्शन आदि नहीं करते नहीं देखा...पर देखो इन नासमझ लोगों को जो छोटी बात या ज़रा से स्थानीय मुद्दे पर तिल का ताड़ बना रहे हैं। पहली बात, बिना उस पक्ष की पूरी बात जाने एकतरफा नरेटिव पर कभी प्रतिक्रिया ना दें। मानव के सामने चुनौती रहे हज़ारों-लाखों वर्षों वाले मुद्दों की तुलना 4-6 दिन की अस्थाई बात से ना करें। ये एक दुखद सच्चाई है कि अन्याय, बुराई कम किये जा सकते हैं पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सकते। कितनी आसानी से कह दिया "कोई कुछ नहीं करता!" जिन बड़ी समस्याओं की आप बात कर रहे हैं देश-दुनिया में अनगिनत स्कूलों, विश्वविद्यालयों में उनपर अलग से सर्टिफिकेट, डिग्री पाठ्यक्रम तक पढ़ाये जाते हैं। रोज़ जगह-जगह हज़ारों जागरूकता एवम मदद प्रोग्राम, सेमिनार, कैंपेन आयोजित किये जाते हैं। कितने ही सरकारी विभाग, निजी संस्थाएं उन समस्याओं पर अनुसंधान और उनके निवारण (उन्हें कम करना बेहतर शब्द होगा) के लिए मौजूद हैं। हाँ, मैं मानता हूँ कि लोगों को और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है, साथ ही विभागों, संस्थाओं की कार्यप्रणाली और कार्यान्वयन को बेहतर किया जा सकता है पर ऐसी फ़िल्मी डायलॉगबाज़ी से बचें कि कोई कुछ नहीं करता। कोई नहीं बल्कि करोड़ों लोग करते हैं इसलिए सामान्य बात नज़रों में आते हुए भी बच जाती है। वो करोड़ों लोग इस सामान्य से काम को करना छोड़ दें तो दुनिया की बैंड बज जायेगी। इस वजह से जेनेरिक (व्यापक) समस्याओं को स्पेसिफिक (छोटी पर नयापन लिए अलग) घटनाओं के बराबर रखना जायज़ नहीं है। समाज सेवा के अनेकों अवसर ठीक आपके सामने होंगे, कोसने के अलावा उन अवसरों को चुनने की हिम्मत भी रखें। 

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#ज़हन 

पहचान की कमान (लेख)


अपनी पहचान पर दाग ना पड़े इसके लिए लोग क्या कुछ नहीं करते! अब सोचें कितने ही देश, विचारधारा, धर्म, प्रदेश बहुत विस्तृत और स्वयं में एक संसार समेटे हुए हैं वो क्या-क्या करते होंगे? चेहरा बचाने की कुछ कोशिशें और थोड़ी बहुत सेंसरशिप झेली जा सकती है। समस्या तब आती है जब एक पहचान से जुड़े लोगों को बचपन से सिखाया जाये कि उनकी पहचान कभी ग़लत हो ही नहीं सकती और वो दुनिया में सबसे बेहतर हैं। इस सोच को मन में बैठाने के लिए हास्यास्पद कहानियां, स्टंट से लेकर किसी भी विरोधाभासी आवाज़ का दमन करना अब आम बात है। आपके जीने का तरीका आपको सर्वश्रेष्ठ इसलिए लगता है क्योंकि आप उसके अभ्यस्त हो चुके हैं ना कि वो वाकई सर्वश्रेष्ठ है। हाँ, अगर मान लें जीने के तरीके में 50 बातें हों तो संभव है आपके कुछ घटक बेहतर हों पर ये मानना की 50 में से 50 ही सही हैं तो आपको बाकी दुनिया के तौर तरीके देखने की आवश्यकता है। 

विचारधारा को ज़बरदस्ती बेहतर दिखाना कुछ ऐसा लगता है जैसे कोई 50-55 वर्षीय महिला या पुरुष मेकअप, सर्जरी आदि जतन से 25 की लगने की कोशिश करें। इस तरह वो अपने मन को दिलासा तो दे देते हैं क्योंकि उन्होंने पैसा खर्च किया है और बदलाव देखा है। वहीं उनसे अनजान व्यक्ति उन्हें 25 वर्ष का नहीं बतायेगा। अपनी सोच अनुसार कोई 40 वर्ष बोल देगा तो कोई 45 वर्ष। क्या मिला? संसार की सहमति की लीज़ बढ़ गयी कुछ और वर्षों के लिए....बस? सच्चाई तो सात-आठ सालों में फ़िर मुँह उठा लेगी। कमियों को छुपाने से वो फफूंद की तरह बढ़ती हैं क्योंकि मन को झूठा दिलासा रहता है कि कमी तो है ही नहीं तो इलाज कैसा? जबकि कमी को मानकर एक तरह से हम खामियों को अपना लेते हैं। अपनायी हुई कमियां आँखों के सामने रहती हैं जिस से उनके इलाज की सम्भावना अधिक हो जाती है। इसका मतलब ये नहीं कि अबतक जिया जीवन कमतर था बल्कि जो पहचान थी वो अब और बेहतर हो गयी। गलतियां मानना वो भी बड़ी विचारधारा, देश आदि के लिए काफी हिम्मत की बात है और दुर्भाग्य से ऐसी हिम्मत ना के बराबर देखने को मिलती हैं। सीखी हुई मान्यताओं के लिए संघर्ष करना अच्छा है पर कभी-कभी मान्यताओं से आंतरिक संघर्ष और भी अच्छी बात है। एवोल्यूशन केवल प्रकृति के भरोसे ना छोड़ें क्योंकि संभव है आगे बदले समीकरण, प्रकृति आपके लिए कोई विकल्प ना छोड़ें। 
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Art - Caroline B.

Friday, December 8, 2017

Ishq Baklol (Hindi Novel) Review


"इश्क़ बकलोल", नाम पढ़कर आपको लगा होगा कि खुद में एक बड़ा बाज़ार बन चुकी फूहड़ता का फायदा उठाने को एक पुस्तक और लिख दी गयी। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। किसी रोलरकॉस्टर राइड सी भारतीय परिवेश में भावनाओं की गुत्थमगुत्था है इश्क़ बकलोल। 2012 में देवेन पाण्डेय जी ने अपने अनुभवों, इनके साथ घटी बातों पर लिखना शुरू किया तब लगा कि कई शौकिया लेखकों की तरह ये कुछ समय बाद लेखन को टाटा कर देंगे। नौकरी, पारिवारिक ज़िम्मेदारियां संभालते हुए इन्होने लेखन जारी रखा और कम समय में काफी सुधार किया। एक दिन इनका मैसेज आया कि इन्होने एक उपन्यास लिखा है और मैं उपन्यास की इंट्रो पोएम लिखूं। उपन्यास का संक्षिप्त आईडिया जो सुना उसके अनुसार एक नज़्म भेज दी। सूरज पॉकेट बुक्स के सौजन्य से इश्क़ बकलोल अब बाजार में उपलब्ध है, जिसकी अच्छी बिक्री हो रही है। 

कवर पेज इंटरनेट से किसी स्टॉक तस्वीर को ना लेकर आकर्षक चित्रांकन रखा गया। सूरज पॉकेट बुक्स की ये पहल मुझे बढ़िया लगी। कहानी के विस्तार में ना जाकर इतना कहूँगा कि इसे रोमांटिक के बजाय एक सामाजिक उपन्यास कहना उचित होगा। भारतीय समाज के अंदर बसी विविधता को बड़ी सुंदरता से दर्शाया है। जीवन की घटनाओं - दुर्घटनाओं के बीच किस तरह हम बिना सोचे कितना कुछ कर जाते हैं (या असमंजस में कुछ नहीं करते) जिनके दूरगामी परिणाम जीवन की दिशा बदल देते हैं। कहानी के दौरान पात्रों की प्रवृत्ति -नज़रिये में आये बदलाव अच्छे लगे। अक्सर ज़बरदस्ती करैक्टर आर्क दिखाने के चक्कर में घटक जोड़ दिए जाते हैं वो यहाँ नहीं हुआ। मनोरंजन की दुनिया में मार्केटिंग जुमला बन चुके फ़र्जी देसीपन की जगह यहाँ किरदारों में असली देसीपन पढ़ने को मिला। कुछ जगह भाषा शैली, कथा के प्रवाह और दृश्य परिवर्तन में सुधार की सम्भावना है, जिसे पहले प्रयास के हिसाब से अनदेखा किया जा सकता है। ये देवेन जी का स्नेह है कि कहानी में एक किरदार मेरा भी है। मुझे पता चला कि मेरा किरदार बड़ा था पर कहानी के लिए उसे छोटा करना पड़ा (इस कारण रेटिंग में आधा अंक काट लेता हूँ....हाहा)। आशा है आगामी उपन्यास और भी धमाकेदार हो। शुभकामनाएं!

उपन्यास के संसार में देवेन पाण्डेय के पदार्पण को मैं रेट करता हूँ - 7.5/10

P.S. मुझे नहीं पता कि मैं रात के डेढ़ बजे अपनी रसोई में धूप का चश्मा लगाकर सेल्फी क्यों ले रहा हूँ।

Monday, December 4, 2017

Eternally ill (Genre - Romance)


"Eternally ill", free short comic script for artists, writers and comic fans in simple language (English and Hindi). Genre: Romance, Hindi title - "रेडियोधर्मी प्रेम कहानी"
Read Online or Download - Google Books, Issuu, Slideshare, Scribd, Mediafire, 4Shared (also available - Drive, PDF Archives, Ebook360 etc)
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Bonus Poetry :)

बता तो सही...

बता इस कहानी को क्या मोड़ दूँ?
तेरा हाथ पकड़ूँ या दुनिया छोड़ दूँ...
बता इस रवानी का क्या नाम रखूँ?
टीस बनने दूँ या आज़ाद छोड़ दूँ...
बता इस दीवानी से क्या काम लूँ?
पर्दा कर दूँ या तख्ता पलट दूँ...
...या रहने दे! ज़रुरत पर पूछ लूँगी,
मैं तो तेरे साथ ही हूँ,
हर पल, हर-सू... 

#ज़हन
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Wednesday, November 22, 2017

ग्राहक ज़रा बचके (लेख)


सामान, सेवा बेचने वाले व्यापारियों की एक श्रेणी अधिक पैसा कमाने के लिए कई ग़लत तरीके आज़माती है। आज उनमे से एक तरीके पर बात करते हैं। हर व्यक्ति के लिए अपनी पहचान, अहं का कुछ मोल होता है। जैसे अगर आप किसी बड़े होटल में खाना खा रहे हों तो आप अपने घर जैसे इत्मीनान, मौज से नहीं खायेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि आप वहाँ भोजन कर रहे अन्य लोगो के सामने शालीन बने रहने चाहते हैं। हालांकि, उनमे कोई आपको जानता नहीं और शायद आगे कभी जीवन में सामने भी ना आये पर फिर भी असहज ना लगे और इस आधे-एक घंटे अपनी अच्छी छवि बनी रहे इसलिए थोड़ा एडजस्ट करना चलता है। ये जो ईगो-इमेज वाली असहजता है कुछ दुकानदार इसका फायदा उठाते हैं। मान लीजिये आपको एक ख़ास तरह का टूथपेस्ट पसंद है जो आस-पास नहीं मिलता। जब तक आपका उस टूथपेस्ट लेने वाली जगह जाना नहीं होता तब तक काम चलाने के लिए आप कोई और टूथपेस्ट लेने जाते हो। अब वो दुकानदार आपको 150 रुपये का टूथपेस्ट उठाकर दे देता है। आप सोचते हो कि मेरे वाला प्रोडक्ट जल्द लेना ही है तो क्यों ना छोटा, सस्ता टूथपेस्ट ले लूँ। झिझक के साथ आप मना करने को बड़बड़ाते हो तो दुकानदार झूठी हँसी, या तंज भरे स्वर में 'भोला' सवाल करता है कि अन्य ग्राहक, दुकानकर्मियों का ध्यान आप दोनों पर जाता है। 

अब "ज़रा सी बात" पर आपको ताकते लोगो के सामने झेंपकर आप कहते हो कि "लाओ ये ही दे दो!" या फिर आप मन ही मन दुकानदार की ट्रिक समझ उसे कोसते हुए कहीं और से टूथपेस्ट खरीदने निकल जाते हो। अधिकतर पहली स्थिति होती है इसलिए दुकानदार ये रिस्क ले लेता है। थोड़ा वह आपके हावभाव, आदत के अनुसार अपनी बात रखता है। केवल कुछ अधिक बेचने में ही नहीं उत्पाद से सम्बंधित ग्राहक के सवालों को ख़त्म करने के लिए भी "ये बचकाने सवाल हैं" की हँसी या बर्ताव का स्वांग करता है। 

तीसरा और दुर्लभ तरीका है दुकानदार पर पलटवार - "घर में फलाना (काफी महँगे) टूथपेस्ट के बॉक्स पड़े हैं। वो तो ख़ास डीलर पर मिलता है आपके यहाँ होगा नहीं तो सोचा एक बार के इस्तेमाल के लिए फलाना छोटा साइज ले लूँ...टीवी पर इसके बड़े एड देखे हैं। ये बड़ा साइज जो आप दे रहे हो ये तो पड़ा-पड़ा ख़राब होगा! है क्या आपके पास फलाना प्रोडक्ट? (तंज वाली हँसी जोड़ें)" यह बस एक उदाहरण भर है। स्थिति अनुसार ऐसे जवाब देने और व्यापारी को इस तरह फायदा ना देने के लिए हमेशा तैयार रहें। 
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#ज़हन

Monday, November 13, 2017

केस स्टडी: बदलते दौर में ढलता स्टारडम


इंटरनेट (अंतरजाल) जो पहले मिलने-जुलने, कोडिंग, हल्के मनोरंजन और जानकारी का साधन था वो धीरे-धीरे दुनियाभर के कलाकारों के लिए एक अथाह मंच बन गया। हालाँकि, इस मंच में कई कमियाँ हैं पर फिर भी इसका लाभ करोड़ों लोगो को मिला है। आज अंतरजाल की दुनिया से एक रोचक केस अध्ययन। इंटरनेट सर्फ करते हुए श्रद्धा शर्मा के यूट्यूब चैनल पर जाना हुआ। अप्रैल 2011, 15 साल की उम्र में इस लड़की ने बॉलीवुड गानों के कवर यूट्यूब पर डालने शुरू किये जो उस समय भारत में अनसुनी तो नहीं पर एक नयी बात थी। कुछ समय बाद श्रद्धा के गाये चौथे अपलोड "हाल ए दिल" गाने के कवर को कम समय में 10 लाख से अधिक व्यूज़ मिले और रातों-रात श्रद्धा का नाम हो गया। स्थानीय , राष्ट्रीय अखबारों-पत्रिकाओं ने उसपर सुर्खियाँ बनायीं, कई कॉलेज फेस्ट से न्यौते आने लगे। जहाँ उसके प्रशंसकों की कमी नहीं थी वहीं आलोचक भी बढ़ रहे थे। जिनका मत था कि श्रद्धा टैलेंट के बदले नोवेल्टी के कारण चल रही है, नहीं तो लाखों भारतीय गायक-गायिकाएँ जो यूट्यूब पर नहीं हैं या जिन्हे एडिटिंग आदि का ज्ञान नहीं है इस प्रसिद्ध गायिका से कहीं बेहतर हैं। उसके बाद 2013-14 की खबर थी कि श्रद्धा की डेब्यू एल्बम आ रही है जिसका निर्माण और संगीत निर्देशन लेस्ली लुईस कर रहे हैं। 2014 में एल्बम आने के बाद से श्रद्धा शर्मा के कुछ वेब विज्ञापन, कोलैबोरेशन आये पर कोई बड़ी अपडेट नहीं मिली। 

हैरानी की बात यह है कि अब 6-7 वर्ष बाद श्रद्धा के यूट्यूब चैनल के सब्सक्राइबर्स 2 लाख 34 हज़ार हैं यानी शुरुआती बूम के बाद बहुत कम लोग श्रद्धा के चैनल से जुड़े। उस दौर में जो बड़ी बात थी अब हज़ारों भारतीय चैनल्स, तरह-तरह के कलाकारों को श्रद्धा की तुलना में कहीं अधिक प्रशंसक और प्रतिक्रिया मिलती हैं। कभी अग्रिम पंक्ति में खड़ी श्रद्धा कंटेंट क्रिएटर्स की भीड़ में कहीं गुम सी हो गयी। ऐसा क्यों हुआ? इसपर कुछ बातें -

*) - जहाँ इंटरनेट ने सबको मंच दिया वहीं बढ़ती प्रतिभावान भीड़ के साथ प्रतिस्पर्धा का स्तर भी बढ़ गया है। जो बातें आज से कुछ वर्ष पहले चल जाती थी उनका आज के परिवेश में हिट होना काफी मुश्किल है। हर क्षेत्र में गिने चुने लोग ही चोटी पर बने रह सकते हैं। उनके अलावा आम जनता का ध्यान उस क्षेत्र में सक्रीय अन्य कलाकारों पर कम जाता है। एक शैली अगर लोग पसंद करेंगे तो कुछ ही दिनों में उस से ऊबकर कंटेंट क्रियेटर से कुछ नया करने की मांग करेंगे। अगर कलाकार कुछ नया नहीं कर पाता तो लोग अन्य विकल्पों की तरफ बढ़ जाते हैं। 

*) - अगर आर्टिस्ट के काम में मौलिकता की कमी हो और वह अधिकांश अन्य कलाकारों के काम को आधार बनाकर कुछ करता हो तो एक समय बाद उसका काम आकर्षण खोने लगता है। ऐसे में अगर उसके मौलिक काम का स्तर औसत या उस से नीचे हो तो ना सिर्फ उसके प्रशंसक बल्कि वह खुद अपने आप में विश्वास खोने लगता है। अगर ऐसा हो रहा है तो उसे अपनी कमियों को पहचान कर उनपर काम शुरू कर देना चाहिए और ऐसे तरीकों पर काम करना चाहिए जिनका पालन कर उसके मौलिक काम का स्तर स्वीकार्य स्तर तक आ सके। 

*) - एक महत्वपूर्ण बात ये है कि किसी व्यक्ति के लिए सफलता और उस स्तर पर बने रहने का मोल क्या है? अगर जीवन में सफलता जल्दी मिल जाये तो उसका मोल आसान लगने लगता है जबकि बड़े स्तर पर बने रहने के लिए निरंतर पापड़ बेलते रहने पड़ते हैं। थोड़ा बहुत आलस्य या ब्रेक अपनी जगह ठीक है पर मेहनत के विकल्प या काल्पनिक दिलासे ढूँढ लेने से आप एक भूला-बिसरा नाम बनकर रह जाते हैं। 

*) - जगह और माहौल बदलने के बाद आर्टिस्ट को अपने क्षेत्र से जुड़े कई घटक पता चलते हैं। उसे लगता है कि अभी कुछ बनाने से पहले कितना कुछ सीखना बाकी है। इस कारण जिस खुलेपन से कलाकार पहले काम करता था वो बरक़रार नहीं रहता। लोगों के साथ-साथ उसकी खुद की अपेक्षा होती है कि हर बार वह पहले से बेहतर करे और अगर किसी वजह से ऐसा नहीं हो पाता तो वह अपने सीमित दायरे में बँध जाता है। इस घेरे से निकलने के लिए ज़रूरी है कि धीमी ही सही पर कुछ रचनात्मक गति बनी रहे, प्रयोग होते रहें। 

भविष्य में क्या होगा ये कहा नहीं जा सकता पर अगर श्रद्धा गायन की अन्य विधाओं, शैलियों को सीखकर नये प्रयोग करें तो स्थिति में काफी सुधार हो सकता है। आशा है ऐसा ही हो!
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#ज़हन

Monday, November 6, 2017

खौफ की खाल (नज़्म) #ज़हन - पगली प्रकृति कॉमिक


Poetry and artwork from Pagli Prakriti (Vacuumed Sanctity) Comic

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
...और नदी अपनों को बहा कर ले गयी!
बहानों के फसाने चल गये,
ज़मानों के ज़माने ढल गये...
रुक गये कुछ जड़ों के वास्ते,
बाकी शहर कमाने चल दिये। 

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
गुड़िया फ़िर भूखे पेट सो गयी...
समझाना कहाँ था मुश्किल, 
क्यों समीर को मान बैठे साहिल?
तिनकों को बिखरने दिया,
साये को बिछड़ने दिया?

खौफ की खाल उतारनी रह गयी,
रुदाली अपनी बोली कह गयी...
रौनक कहाँ खो गयी?
तानो को सह लिया,
बानो को बुन लिया। 
कमरे के कोने में खुस-पुस शिकवों को गिन लिया। 

खौफ की खाल उतार दो ना...
तानाशाहों के खेल बिगड़ दो ना!
शायद उतरी खाल देख दुनिया रंग बदले,
एक दुकान में गिरवी रखा हमारा सावन... 
शायद उस दुकान का निज़ाम बदले!
घिसटती ज़िन्दगी में जो ख्वाहिशें आधी रह गयीं,
कुछ पल जीकर उन्हें सुधार दो ना!
खौफ की खाल उतार दो ना...
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#mohitness #mohit_trendster #abhilash_panda #freelance_talents