अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...

Wednesday, February 22, 2017

Anik Planet #04 Magazine Update


...Wrote an article "Pyaar se Parhez" (Superheroes and their complicated love life) for Anik Planet #04 (February 2017 Issue), Publisher: Comics Our Passion Community


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#Backcover remark on horror novella Woh Bhayanak Raat by Mithilesh Gupta.

Thursday, February 16, 2017

सुविधानुसार न्यूक्लीयर परिवार (कहानी) #ट्रेंडस्टर

अपने छोटे कस्बे से दूर सपनो के सागर में गोते लगाता एक रीमा और मनोज का जोड़ा बड़े शहर के कबूतरखाना स्टाइल अपार्टमेंट में आ बसा। जितना व्यक्ति ईश्वर से मांगता है उतना उसे कभी मिलता नहीं या यूँ कहें की अगर मिलता है तो माँगने वाले की नई इच्छाएं बढ़ जाती है। कुछ ऐसा ही इस दम्पति के साथ हुआ, सोचा कितना कुछ और हाथ आया ज़रा सा...वैसे यह 'ज़रा सा' भी करोडो के लिए किसी सपने जैसा होता पर कहता हैं ना 99 का फेर मौत तक पीछा नहीं छोड़ता।

दोनों को ही अपने बड़े संयुक्त परिवारों से परहेज था। तीज-त्यौहार पर घर जाना या घर से किसी का इनसे मिलने आना इन्हें हफ़्तों पहले ही चिंता में डाल देता था। मनोज के घर को दोनों सर्कस कहते थे और रीमा के घर को बाराबंकी बाजार। इन दोनों को लगता था कि परिवार के लोग इनके कभी काम नहीं आते जबकि ये हर महीने - महीने में उनका कोई छोटा-मोटा काम कर देते थे। जबकि ऐसा था नहीं, बस सुविधानुसार जब इनसे जुड़ा कोई काम जैसे मकान की रजिस्ट्री, गाडी फंसने पर थाने फ़ोन कर छुड़वाना आदि किसी घरवाले द्वारा किया जाता था तो ये दोनों उसे काम मानते ही नहीं थे।

ऑफिस की तरफ से वनकल वन्य अभयारण्य में घूम रहे रीमा-मनोज का उनके गाइड और ड्राइवर समेत एक उग्रवादी संघठन द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। उस संघठन ने हाल ही में अपनी माँगो के लिए कुछ हत्याएं की थी। बंधक अपने भाग्य को कोस ही रहें होते हैं कि तभी एक आवाज़ आती है....

"अरे फूफा जी! चरण स्पर्श, कैसे हो आप?"
मनोज की फ्रीज़ मुद्रा अभी टूटने में समय लगता तो रीमा बोल पड़ी - "जीता रह कुन्नू बेटे! कितना बड़ा हो गया तू...16 साल का!"
कुन्नू - "आप लोग यहाँ कैसे?"
मनोज - "बेटा तेरी बुआ जी ने पता नहीं कौन सी सरिता-गृहशोभा में सेकंड हनीमून का पढ़ लिया तबसे मेरे कान खा लिए। फिर ऑफिस से यह टूर मिला तो आ गए। तू इस सब में...."

रीमा ने अपने पति को इतनी जोर की कोहनी मारी कि उसके मुँह से आगे की बात निकली ही नहीं। ज़्यादा बात होती उस से पहले ही वहाँ नक्सल विरोधी फ़ोर्स का हमला हो गया। डिप्टी कमांडर कुन्नू ने अपनी बुआ जी और फूफा जी को खतरे से अपनी जान पर खेल कर निकलवाया। इस गोलाबारी में रीमा घायल हो गयी, घायलो को लाया गया शहर के अस्पताल। यहाँ डॉक्टर मनोज के कजिन निकले जिस वजह से इलाज में रीमा को प्राथमिकता मिली। गोली के असर से रीमा की किडनी फेल हो गई और उसे नई किडनी की ज़रुरत थी। अब रीमा के 'बाराबंकी बाजार' से उसकी चाची जी काम आयीं और रीमा को समय पर किडनी मिल गयी।

एक दिन आराम से अपने कबूतरखाने की निन्नी सी बालकनी में चाय पीते हुए दोनों ने आँखों में ही एक-दूसरे से जैसे कहा हमारे 'सर्कस' या 'बाराबंकी बाजार' से हमे कितना कुछ मिलता है पर सुविधानुसार हम अपनी तरफ से किये गए काम याद रखते हैं और वहाँ से मिला सहारा हम कभी देखना ही नहीं चाहते। अब दोनों फिजियोथेरेपी और स्ट्रेस, डिप्रेशन कम करने के लिए साइकैट्री इलाज करवा रहें हैं....हाँ, वो डॉक्टर भी परिवार वाले या उनकी जान पहचान के निकल आये हैं।

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Yasni Database
Read छूटी डोर (कहानी)

Thursday, January 26, 2017

Republic Day Painting


कलाकार ज्योति सिंह जी के साथ कभी-कभी कुछ विचार, दृश्य साझा कर लेता हूँ, जिनपर वो कलाकृतियां बनाती हैं। इस बार उन्होंने कैनवास पर यह भाव उतारे हैं। 

                                                       Jyoti Singh with Mohit Sharma
"Happy republic day.... (Size: 24"-24", Medium: Acrylic on canvas, Description: es painting mey maa bird mother India ki prateek hai jo har tarah ki paristhiti mey apne bachcho ki raksha karti hai aur apni chaanv mey unhe aasra deti hai. Yahan aakash mey ek saath har tarah k visham mausam tez dhoop, baarish, bijli dikhaye gaye hain.) Concept by our writer friend Mohit Sharma ji"

Tuesday, January 10, 2017

कैशलेस रिश्वत (Cashless Bribe)


एक सरकारी दफ्तर में एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, सौरभ घुसता है। सौरभ अपना झोला लेकर अंदर आता है और अपने विभाग से जुड़े एक बाबू (क्लर्क) के बारे में पूछता है। उसकी डेस्क पर जाकर वो अपना दुखड़ा रखता है।

"सर मेरा कई सालों का ट्रेवल अलाउंस, पेट्रोल अलाउंस, नच बलिये अलाउंस कुछ नहीं आया है, अब आप ही कुछ कीजिये।"

बाबू - "कर तो दें पर उसके लिए आपको भी कुछ करना होगा ना। इस हाथ दे, उस हाथ ले....नहीं तो लात ले।"

सौरभ - "हाँ झोला वामपंथी फोटोशूट के लिए थोड़े ही लाया हूँ!" (सौरभ झोले में हाथ डालता है)

बाबू - "एक तो नाड़े को झोले की डोरी बना रखा है....जी कर रहा है इसी का फंदा सा बना के झूला दूँ तुझे बदतमीज़!"

सौरभ - "मैंने क्या किया? बदतमीज़ी का तो मौका ही नहीं मिला अभी तक 30 सेकंडस में?

बाबू - "अरे जब पूरा देश डिजिटल इंडिया के नारे लगा रहा है और तुम अभी तक झोले में घुसे हो। तुम जैसे लोगो की वजह से ही देश तरक्की नहीं कर पाता। भक! नहीं करनी तुमसे बात।"

सौरभ - "बात नहीं करनी? बाबू हो पर गर्लफ्रेंड की तरह क्यों बिहेव कर रहे हो? अच्छा तो आप ही कुछ उपाय बताओ।"

बाबू - "कैशलेस सरकाओ हौले से...."

सौरभ - "ओह! हाँ जी अपना मोबाइल नंबर दो।"

बाबू - "मेरी इस महीने की लिमिट पूरी हो गयी है।"

सौरभ - "तभी मूड ख़राब है आपका! तो क्या इस महीने काम नहीं होगा मेरा?"

बाबू - "अरे क्यों नहीं होगा, देश को आगे बढ़ने से रोकने वाले भला हम कौन होते हैं? मेरे चपरासी का नम्बर नोट करो। उसकी भी लिमिट हो गयी हो तो बाहर बैठे नत्थू भिखारी के मोबाइल में 15% उसकी कमीशन जोड़ के डाल देना। बड़ा ईमानदार बंदा है! पिछले महीने का एक ट्रांसक्शन मैं भूल गया था वो भी हिसाब के साथ देकर गया है लौंडा। सारा काम छोड़ के, जय हिन्द बोल के उसके माथे की चुम्मी ली मैंने तुरंत... "

समाप्त!