अंतरजाल की दुनिया और जीवन में मोहित शर्मा 'ज़हन' के बिखरे रत्नों में से कुछ...
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Friday, September 6, 2013

मेरे लिए आस्था, तुम्हारे लिए डर.....

मेरठ में घर के पास एक शांत स्थान है जहाँ आस-पास शिव जी-दुर्गा माता का एक मंदिर, शनि देव का मंदिर, हनुमान जी का मंदिर और साईं बाबा की कुटी है। वहाँ सोमवार को शिव भक्तो का जमावड़ा रहता है, मंगल को बजरंग बलि महाराज के भक्तो का गुरूवार को साईं बाबा को मानने वालो की भीड़ रहती है और शनिवार को शनि देव और हनुमान जी के भक्तो की। 



तो एक शनिवार मेरा एक नास्तिक दोस्त मेरे साथ था और हमे थोडा समय लग गया सड़क पर भक्तो की भीड़ से निकलने मे। दोस्त ने कहा की सब नौटंकी है, ये लोग आस्था या श्रद्धा से नहीं आते बल्कि डर से आते है की शनि देव सब भला करें इनका या शिव भगवान, बजरंग बलि इनके किये पापो से छुटकारा दे दें इनको। उसने मुझसे पूछा इस सबमे कोई भी सकारात्मक बात है या सब पाखण्ड है। 

अब आजकल एक तो फेशन बन गया है भगवान की बेईज्ज़ती करना और खुद को नास्तिक बताना। उसको भगवान के बारे मे समझाना व्यर्थ था इसलिए मैंने इस भीड़-जमावड़े से जुडी सकारात्मक बात बताई उसको।

मैंने कहा यहाँ रास्ते मे दर्जनों गरीब परिवारों को ये भक्त लोग (चाहे भगवान के डर से या आस्था से) खाना, प्रसाद और पैसे देते है, जिस से इतने सारे गरीबों का जीवन चलता है सिर्फ यहाँ ही नहीं देश भर मे। उसने तुरंत कहा की ऐसा तो हफ्ते के 3-4 दिन ही रहता है बाकी के दिनों का क्या? अगर भक्ति करनी ही है तो उसके लिए कोई दिन या समय निश्चित करने से क्या फायदा? जब मन आये तब करो पूजा, भक्ति। इसपर गृह-नक्षत्रो की बात करता तो फिर वो प्रूफ मांगता इसलिए मैंने यहाँ भी उसी की जुबां मे बोलना ठीक समझा।

मैंने कहा तुम्हारी बात सही है बिना दिन-समय देखे भी भक्ति करने वाले बहुत से लोग है रही आम जनता की बात तो उनका यह डर या नियत समय पर किसी ख़ास देव की पूजा अर्चना करना भी इन गरीबों के हित मे है। कैसे? ये मानवीय सोच है उसका व्यवहार है ...जैसे अधिकतर बच्चे परीक्षा की तिथि आने पर ही पढना शुरू करते है, अगर कुछ नियत न हो तो दिमाग मनुष्य को दिलासा देता रहता है की अभी तो काफी समय है आराम करो। इसी तरह ज़्यादातर लोगो को अगर ये बताया जाए की रोज़ हर बड़े देव या अपने इष्ट देव-देवी की पूजा-आराधना करो तो दिनचर्या समझ कर वो इसको गंभीरता से नहीं लेंगे और जो हफ्ते मे 4 दिन ये गरीब सही से खा-पी लेते है वो भी अनियमित हो जाएगा, और सिर्फ बड़े त्योहारों तक सीमित होकर रह जाएगा। पर जब उनके इष्ट देव के लिए हफ्ते मे एक ख़ास दिन निश्चित होता है तो वो अपने देव को खुश करने के लिए वो सही से पूजा करने के अलावा दान पुण्य भी करते है जिस से इन गरीबो का और आस-पास पूजा से जुडी सामग्री बेचने वालो का भला करते है। कुछ स्थान ऐसे भी है जहाँ हफ्ते के सातो दिन मेला सा लगा रहता है और हर दिन किसी ख़ास भगवान् मे आस्था रखने वाली या तुम्हारी भाषा मे डरने वाली भीड़ इन गरीबो का, दुकानदारों का भला कर जाती है।

- मोहित शर्मा (ट्रेंडस्टर / ट्रेंडी बाबा)

Tuesday, June 25, 2013

देश की कमज़ोर दूर की नज़र




सबसे पहले तो उत्तराखंड त्रासदी में निस्वार्थ और निरंतर लगे सेना के जवानों, अर्धसैनिक बलो और जुडी एजेंसियों को नमन और धन्यवाद। अब मुद्दे पर आते है।

देश में आम लोगो की एक ख़ास आदत है। किसी आपदा, या राष्ट्रीय सुर्खियों में आयी घटना, अपराध से हर चीज़ अतार्किक रूप से जोड़कर देखी जाने लगती है तब तक जब तक कोई अलग, नयी घटना उन सुर्ख़ियों में ना आ जाये। अक्सर ऐसे मामलो मे पता चलता है की जनता के एक बड़े हिस्से की दूर की नज़र कमज़ोर है। हाँ ये दुर्भाग्यपूर्ण है की एक त्रासदी घटी पर उसके कारको को हटाने पर काम की बजाये दोषारोपण, हर बात मे उस दुखद घटना को घुसा देना कितना सही है?

जैसे एक कॉमिक फैन ने बाइस हज़ार की कॉमिक्स खरीदी तो उसे ऑनलाइन ये नसीहतें/ताने दिये गये की उत्तराखंड त्रासदी मे दान करना चाहिये था। क्या जो कलाकार अपने घरों से इतनी दूर आकर मेहनत कर रहे है उन्हें और उनके परिवारों को जीने के लिए पैसो की ज़रुरत नहीं? उस त्रासदी के अलावा कहीं कश्मीर मे जवानों के काफिले पर आतंकी हमले में 8 जवान मारे गए और कुछ घायल हुए ...इसी तरह और छोटी-बड़ी दुखद घटनायें हुयी .....क्या उन घटनाओ के पीड़ितों को मदद की ज़रुरत नहीं? बिल्कुल है पर आपको तो महीनो एक घटना के तले जो काटने की आदत है।

देश एक मशीन की तरह है जिसकी इकाइयाँ अपने क्षेत्र के काम करने में माहिर है, सब रुक कर एक दिशा मे जायेंगे तो देश रुक जाएगा जिस से और अधिक पीड़ित होंगे। वैसे कहने वाले कह बड़ी आसानी से देते है पर अगर देखा जाए तो उस दिशा में सबसे कम योगदान ऐसे ही लोगो का होता है। प्रकृति पर किसी का बस नहीं चलता पर खुद को व्यतिगत रूप से बदलकर अपने आस-पास के समाज को बदलने की कोशिश कीजिये, सही लोक उम्मीदवार चुनिए। इस से ज्यादा करना चाहते है तो पहले उस स्तर तक पहुँचिये जहाँ से लोगो की मदद कर पायें आप। नीचे से कोसना या बंदर घुड़की देना कुछ न करने के समान है।

- Mohit

Friday, May 24, 2013

कर्नाटक का नाटक






 ज़रा सोचिये कोई नयी सरकार जब सत्ता पर काबिज़ हो तो पहले वो जनहित प्राथमिकता के हिसाब से फैसले लेगी की ग्राम पंचायतों और ब्लॉक्स के साथ मिलकर बुनियादी ढांचे का विकास, रुकी हुई योजनाओं का क्रियान्वयन, जो वायदे किये थे सत्ता मे आने से पहले किये थे उनमे से कुछ की कम से कम दिखाने भर के लिए शुरुआत।

अब कर्नाटक मे जो नयी सरकार आयी उसके सबसे पहले फैसलों मे से एक था गाय काटने वाले रुके हुए क़त्लखानों को दोबारा खुलवाना। धार्मिक बात तो चलिए बाद मे पर एक तार्किक बात सोचिये, सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार को इतने फैसले लेने होते है, उनमे से ये फैसला सेकुलर होने की आड़ मे अगर 4-5 महीने बाद आता तो समझ आता पर बदलते ही शुरुआती फैसलों मे से एक ये ......वाह! क्या ये जनता की जिंदगी और मौत का सवाल था जो इसको इतनी प्राथमिकता दी गयी बाकी सभी मुद्दों से।

इस से पहले सरकार मे भी तो जनता अपना जीवन यापन यथास्थिति मे कर रही थी, तो अब क्या हुआ? क्या यह किसी तरह का बदला लिया गया?


Important Issue -  



"आखिरकार लंबे इंतजार के बाद केंद्र ने कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले की अधिसूचना जारी कर दी।

इस पर जहां तमिलनाडु में खुशी जाहिर की जा रही है, कर्नाटक में विरोध शुरू हो गया है। करीब पंद्रह दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी कि वह इस फैसले की अधिसूचना जारी करने में देर क्यों कर रही है। तब तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार के मुख्य सचिवों ने अदालत के सामने कहा था कि न्यायाधिकरण के फैसले की अधिसूचना जारी करने पर उन्हें आपत्ति नहीं है। मगर बाद में कर्नाटक ने केंद्र सरकार से कहा कि जब तक राज्य सरकार की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में दायर अपील पर फैसला नहीं आ जाता, अधिसूचना जारी न की जाए। वही बात कर्नाटक अब भी दोहरा रहा है कि फैसला आने तक कावेरी प्रबंधन बोर्ड का गठन न किया जाए। जाहिर है, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण की अधिसूचना जारी होने से इस नदी के पानी को लेकर समय-समय पर उठ खड़े होते विवाद का कानूनी और तकनीकी हल तो निकल आया है, मगर इस पर अमल कराना अब भी आसान नहीं होगा। कर्नाटक कभी सहज ढंग से तमिलनाडु के हिस्से का पानी छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। तमिलनाडु बार-बार सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाता और उसके निर्देश के मुताबिक ही कर्नाटक कुछ समय के लिए पानी छोड़ता रहा है। इस विवाद को सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कावेरी नदी प्राधिकरण और कावेरी निगरानी समिति का गठन किया गया था। मगर तमिलनाडु के अड़ियल रवैए के चलते इस मसले का निपटारा नहीं हो पाया। दरअसल, कावेरी जल बंटवारे का मुद्दा तमिलनाडु और कर्नाटक में बहुत पहले से राजनीतिक रंग ले चुका है।

कई बार यह काफी तूल पकड़ लेता है। दोनों तरफ विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इन राज्यों में चाहे जिन दलों की सरकारें रही हों, कोई व्यावहारिक उपाय तलाशने के बजाय, उन्हें अपने राजनीतिक लाभ की चिंता अधिक सताती रही है। कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण का फैसला अधिसूचित होने के नब्बे दिनों के भीतर कावेरी प्रबंधन बोर्ड और कावेरी जल नियामक समिति का गठन हो जाएगा। इनमें संबंधित राज्यों के प्रतिनिधि और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल होंगे। मगर अब तक के अनुभवों को देखते हुए कर्नाटक इसे आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। दरअसल, अभी तक वह कावेरी का सारा पानी इस्तेमाल करता रहा है। न्यायाधिकरण के फैसले के मुताबिक उसे तमिलनाडु के लिए चार सौ उन्नीस टीएमसी और पुदुचेरी के लिए तीस टीएमसी पानी छोड़ना पड़ेगा। इस तरह उसे सिर्फ दो सौ सत्तर टीएमसी पानी मिल पाएगा। जाहिर है, उसके सामने परेशानियां बढ़ जाएंगी और किसी न किसी बहाने वह अदालत की शरण में जाने की कोशिश करेगा। हालांकि वह अपनी सिंचाई और पेयजल संबंधी योजनाओं को नए सिरे से व्यवस्थित करे तो इस समस्या से काफी हद तक पार पाया जा सकता है। दरअसल, यह समस्या उन सभी राज्यों में है जहां कोई नदी एक से अधिक राज्यों से होकर बहती है। जिस राज्य से नदी पहले गुजरती है, वह उसका पानी रोक लेता है। इन विवादों के मद्देनजर नदी जोड़ योजना की रूपरेखा तैयार की गई थी, मगर कुछ अड़चनों के चलते वह आगे नहीं बढ़ पाई। कावेरी जल बंटवारे से जुड़े विवाद पर भले अब कुछ विराम लग जाए, मगर दूसरे राज्यों में अब भी सिंचाई और पेयजल आपूर्ति संबंधी योजनाओं को सुचारु बनाने के लिए व्यावहारिक नीति की दरकार है।"

Saturday, May 11, 2013

दिमाग को उल्लू बनायें....आकर्षक ईनाम पायें!


** दिमाग को उल्लू बनाये....आकर्षक ईनाम पायें! **



कहते है भगवान परीक्षा लेते है हमे नयी, अलग और कठिन परिस्थितियों में डाल कर। इन परीक्षाओं का सबसे बड़ा घटक होता है मानव मस्तिक्ष, बाहरी बातें एवम परिपेक्ष तो झेली जा सकती है पर विपरीत बहाव से लड़ते हुए लगातार नकारात्मक विचार के जनक दिमाग को काबू मे रखना और अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना मुश्किल काम है।

पहला काम जो दिमाग करता है वो आपकी सरहदें तय कर देता है। की आप अपने जीवन में इतना ही पा सकते हो क्योकि आप इतने ही काबिल हो, फिर भी आप अगर उस सरहद के बंधन से कभी छूटने की कोशिश करो तो पुराने कुछ बुरे अनुभवों का हवाला देकर आपकी फूटी किस्मत को आपका दिमाग आपको समय-समय पर याद दिलाता रहता है। सबसे बड़ी गलती हम किसी काम को एकसाथ देखकर उसका आंकलन करने मे करते है अगर एक बड़े काम को उसकी इकाइयों मे बाँट कर देखा और किया जाए तो वो इतना बड़ा हौवा नहीं लगता जितना एकसाथ देखने पर प्रतीत होता है।

दूसरी बात हमारा दिमाग बड़ा चूज़ी नेचर का होता है। देखिये ख़बरें आपको तब मिलती है किसी के बारे में जब वो काम पूरे कर लेता है या कुछ हासिल कर लेता है। बीच मे उसका संघर्ष या जो कुछ घटनाएँ हुई उनसे सरोकार रखना तो जैसे दिमाग ने सीखा ही नहीं। वो सफलतायें, जीत देख कर और हीन भावना भरने की कोशिश होती है आपके दिमाग की पर खुद को आप उस "सफल" व्यक्ति की काम शुरू करने की स्टेज से अपनी तुलना करोगे तो कई बार आप खुद आश्चर्यचकित हो जाओगे की आपने अपने अन्दर क्या सागर छुपा रखा है। अब आखरी दिमागी अड़चन जो जैसा चल रहा है उसके बदलने का डर, गुस्सा ....नयी बातों, चीज़ों और बदलावों को अक्सर दिमाग अनचाहा मानता है। उनसे आपको भी डरा देता है की आगे अगर कुछ बदला तो नकारात्मक ही होगा। हाँ, कुछ बातों मे आपको समझौता करना पद सकता है पर शायद ये समझौतें आगे आपकी मदद करें एक बेहतर जीवन के लिये।

कुछ गंभीर बिमारियों मे मरीजो को बताया गया की कुछ दवाईयाँ इस बिमारी का इलाज है। कुछ समय तक दवाईयाँ लेने के बाद उनमे बड़े सुधार देखे गए जो अन्यथा किसी इलाज, दवा से संभव नहीं थे। असलियत ये थी की वो बस नाम की दवाई थी पर दिमाग को उल्लू बनाकर शरीर ठीक हो गया। नहीं तो दिमाग फिर एक दायरा बांध देता की ये तुम्हारी बिमारी है और तुम ठीक नहीं हो सकते। इसी तरह अपने आज की स्थिति की परवाह किये बगैर दिल से कोशिशें कीजिये क्या पता दिमाग को उल्लू बनाकर आप अपनी किस्मत ठीक कर लें।
अगला लेख यारी-दोस्ती पर ....

Badhna Zaroori Hai!

 ** बढ़ना ज़रूरी है **


 
अक्सर लोगो को उनकी किस्मत को कोसते हुए देखता हूँ। जिंदगी की बड़ी बातों से लेकर छोटी से छोटी बातों में अपने भाग्य का हवाला देने लगते है। मानता हूँ की किस्मत नाम की चीज़ होती है और इसका जीवन पर असर होता है पर अगर कोई काम करते वक़्त या उस से पहले यह फूटी किस्मत वाली बात सोचेंगे तो जितना अच्छा आप कर सकते है वो भी नहीं कर पायेंगे। किस्मत को मानिए पर इसको मन मे मत बिठाइये।

कहने का मतलब चाहे काबिलियत से कम ही सही पर जीवन मे रफ़्तार ज़रूर होनी चाहिए, मायूसी या हार मानने से काफी बेहतर धीमी रफ़्तार है। शायद जहाँ तक नज़र जाए वहां तक उम्मीद न लगे पर शायद जहाँ तक वो नज़र जाए वहाँ जाकर जब आप देखोगे तो इच्छित सफलता का मार्ग दिख जाये l

- Mohit Sharma ( Trendster)

Thursday, May 9, 2013

चपल चीन, चप्पल भारत

**** चपल चीन, चप्पल भारत ****



यह शीर्षक इसलिए सोचा की भारतीय व्यवस्था मे कई दमदार योजनाएँ पूरी होते होते अपना अर्थ और दिशा ही खो देतीं है। 


चीन के बारे में एक और रोचक बात आप सबके साथ बाँट रहा हूँ। अंतरराष्ट्रीय व्यापार डील्स, प्राकर्तिक सम्पदाओं जैसे तेल के कुओं, समुद्र क्षेत्र आदि का अधिग्रहण जब कोई देश करवाता है तो ऐसे व्यापारिक मामलो में कई देश हिस्सा लेते है और राजनैतिक संबंधो, भौतिक, पैसो, प्लान, कोटेशन आदि मे जो देश आगे रहता है या जिस देश की कंपनी आगे रहती है उसको डील या व्यापर कॉन्ट्रैक्ट मिल जाता है। बस यहीं चीन ने एक नयी कूटनीति अपनाई है जैसे तेल, प्राकर्तिक गैस भण्डारो की डील मे उसकी 8 तेल कंपनियाँ एक साथ मिलकर कोटेशन और बाकी जुड़ा काम करती है एक बैनर तले जिसकी वजह से दूसरे देशो की बड़ी कम्पनियाँ भी उन आठ संयुक्त कंपनियों के सामने बौनी दिखाई पड़ती है। भारत की निजी और सरकारी कंपनियां राष्ट्रीय सम्पदा आवंटन नेल्प योजना पर ही साथ नहीं आ पायीं अब तक वो विदेशो मे ऐसे एकजुट हो पाएंगी ये मुश्किल लग रहा है निकट भविष्य मे।

जैसे अब कुछ समय से अफ्रीका की प्राकर्तिक सम्पदा पर चीन की नज़र है और वो तेज़ी से लम्बे समय के कॉन्ट्रैक्ट्स, डील्स और अधिग्रहण करके अपना रास्ता साफ़ कर रहा है। वहां की सरकार का लोगो और विदेशो को दिखाने भर के लिए सामाजिक रवैया है, न की भारत जैसा लोकतांत्रिक। वैसे लोकतन्त्र एक अच्छी व्यवस्था होती है पर भारतिय राजनेताओ एवम अफसरों की धीमी, डरी सी, ढुल-मुल शैली पर ये जमती नहीं उल्टा उन्हें और आलसी बना देती है।

जब तक इनका बिल पारित होता है, नीतियाँ बनती है, कमेटियाँ बैठती है और बाकी चोचला चलता है तब तक चीन टारगेट क्षेत्रो मे काम शुरू कर भारत की व्यापारिक उम्मीद ही ख़त्म कर देता है। कमी सोचने वालो और उनकी नीतियों मे नहीं है .....कमी करने वालो के संचालन और नीतियों के कार्यान्वयन में है।

- Mohit Sharma Trendster